
शहडोल कोर्ट ने चाय-पान ठेला संचालकों को बड़ी राहत कोई हस्ताक्षर न करें न करावें
मामला नया गांधी चौक में सरकारी जमीन का
नजूल भूमि पर 30-35 साल से कब्जा, पक्षकारों को हस्तक्षेप से रोका
शहडोल, 19 अप्रैल 2026जिला न्यायालय शहडोल के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश दीपाली शर्मा की अदालत ने विविध व्यवहार अपील क्रमांक 17/2022 में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए चाय-पान ठेला संचालकों को राहत प्रदान की है। कोर्ट ने 25 अगस्त 2022 को प्रथम श्रेणी न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया और ठेला संचालकों के पक्ष में अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कर दी है।मामला रघुराज हायर सेकेंडरी स्कूल के सामने गांधी चौक, शहडोल स्थित नजूल भूमि खसरा नंबर 120/1 का है। अपीलार्थी राजेश गुप्ता , संतोष नामदेव बगैरा लगभग 30-35 वर्षों से यहां चाय-पान का व्यवसाय चला रहे हैं। इनका कहना है कि यह उनका रोजी-रोटी साधन है।
क्या था विवाद?
निजी पक्षकार नेमचंद जैन चंद्रलोक वस्त्रालय, रामावतार गुप्ता और मनमोहन गुप्ता ने ठेलों के पीछे वाली भूमि (खसरा 120/21) पर अपना स्वामित्व बताते हुए दीवार तोड़ने और ठेलों को हटाने की कोशिश की। ठेला संचालकों ने कहा कि निजी पक्षकारों को कोई वैधानिक अधिकार नहीं है क्योंकि मूल पट्टाधारी निहालचंद बड़ेरिया का पट्टा कलेक्टर शहडोल ने शर्तों के उल्लंघन पर निरस्त कर दिया था।
कोर्ट का फैसला
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश दीपाली शर्मा ने अपने 14 पृष्ठीय विस्तृत आदेश में कहा:अपीलार्थियों का नजूल भूमि पर दीर्घकालीन शांतिपूर्ण कब्जा प्रथम दृष्टया सिद्ध है।निजी पक्षकारों (प्रतिवादी क्रमांक 4 नेमचंद, 5 रामावतार एवं मनमोहन गुप्ता (6) को कोई वैधानिक अधिकार नहीं है क्योंकि उनका आधार निरस्त पट्टा था।शासन (कलेक्टर, नजूल अधिकारी) की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हुई थी, इसलिए निजी पक्षकार ठेलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।
रोजी-रोटी पर असर, अपूर्णीय क्षति और सुविधा का संतुलन अपीलार्थियों के पक्ष में है।
आदेश में स्पष्ट कोर्ट ने प्रतिवादी क्रमांक 4, 5 एवं 6 को आदेश दिया कि वे वाद के अंतिम निर्णय तक नजूल भूमि खसरा 120/1 के उस हिस्से में, जहां अपीलार्थी ठेले लगा रहे हैं, स्वयं या किसी के माध्यम से कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
यह आदेश शासन के अधिकारों को किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं करेगा।अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा, “अतिक्रमणकारी का कब्जा भी विधि की सम्यक प्रक्रिया के बिना नहीं छीना जा सकता।” प्रतिवादी क्रमांक 4, 5 एवं 6 को अपील का खर्च भी वहन करना होगा।यह फैसला छोटे व्यवसायियों के दीर्घकालीन कब्जे और रोजी-रोटी के अधिकार को मजबूती देता है। अब मूल मुकदमा (विवाद 171/2021) का अंतिम फैसला होने तक ठेले सुरक्षित रहेंगे।
ज्ञातव्य है कि नया गांधी चौक शहडोल स्थित चंद्रलोक वस्त्रालय चलने वाला नेमीचंद जैन माफिया की तरह इस जमीन पर अपने साथियों के साथ कब्जा कर लिया पहले उसने इस जमीन को निहालचंद बद्देरिया के आरजी बढ़कर नजूल ऑफिस में भ्रामक स्थितियों में नामांतरण करना चाह जबकि बड़े रिया उसे तथा कथित लिखा पड़ी के कुछ दिन के अंदर ही संदेह परिस्थितियों में मृत्यु हो गए इसके बाद एक सफल भूमिया की तरह नाम चेंज और नगरपालिका के कुछ स्थाई पदाधिकारी भ्रष्ट कर्मचारियों की सहायता से इस रिक्त भूमि पर तीन मंजिला भवन नगर पालिका की अनुमति के बिना ही बना डाला और जब एक अन्य भवन बना रहा था तब एक शिकायत में इसे सही पाते हुए तहसीलदार सोहागपुर के द्वारा 90000 जुर्माना लगाकर भवन गिराये जाने का आदेश पारित किया गया था। किंतु भ्रष्ट सिस्टम और भू माफिया की ताकत उसकी आर्थिक हैसियत के दबाव में सरकारी जमीन को खाली नहीं कराया गया जबकि नेमीचंद जैन शहडोल में आदिवासियों की कई एकड़ जमीन में भी और अन्य कई जगह कई प्लाट इसी तरह से धोखाधड़ी करके कब्जा कर लिया है। व्हाट इस जमीन में भी कब्जा करके अपने सहयोगियों के साथ बंदर बांट कर रहा था तथा स्थाई रूप से बड़ेरिया के किराएदार रहे तीन-तीन दुकानदारों ठेला वालों को वह किसी भी कीमत पर हटाने का षड्यंत्र रच रहा था गुप्ता होटल नामक संचालक मनमोहन गुप्ता को इस जमीन का एक हिस्सा जो खाली था जहां पर ठेला वाले अजीब का चला रहे थे उन्हें हटाकर वह मनमोहन को जमीन दिलाने का काम कर रहा था पहले मनमोहन नेमीचंद चंद्रलोक वस्त्रालय के पास में होटल का धंधा करता था।
कोविड के कार्यकाल में भू माफिया ने षड्यंत्र करके कई दशक पुरानी दीवाल वर्ष पुरानी दीवाल जिसके सामने ठेला वाले अपनी दुकान चला रहे थे तोड़ दी जो आज भी ठेला के ऊपर रखी हुई है। और धीरे-धीरे पूरी दीवार तोड़कर पीछे की सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया गया बड़ेरिया का पत्ता 2017 तक का बताया गया था नेमचंद जैन और उसके सहयोगियों की माफिया गिरी में बड़ेरिया के द्वारा जी तथा कथित भूमि हस्तांतरण के दस्तावेज लिखे गए वह अवैध थे जिससे कलेक्टर ने पट्टा निरस्त कर दिया। अब बताया जाता है कि नेमचंद और मनमोहन ने अपने कब्जे को प्रदर्शित करते हुए इस करोड़ों रुपए की सरकारी जमीन के आधे हिस्से मे धारणाधिकार के तहत पत्ता हासिल कर लिया है जो कि कुछ दिन पहले बड़े एरिया से तथाकथित बिक्री के दस्तावेज पर हस्तांतरण करने के फिराक में थे। जबकि धारणाधिकार के नियमों के अनुसार अगर मामला विवादित है तो धारणाधिकार का पत्ता नहीं दिया जा सकता यदि मन भी लिया जाए की आधी जमीन पर धारण अधिकार मिल गया है तो आधी जमीन जो करोड़ों रुपए की है सरकारी जमीन पर इन भूमाफियाओं का कब्जा बरकरार है क्योंकि संबंधित नजूल विभाग और नगरपालिका के अधिकारी और पदाधिकारी इस भूमिया की आर्थिक हैसियत के सामने नतमस्तक हैं। बहरहाल इस अंधेर करदी के बीच में न्यायालय ने गरीब अजीब का चलाने वालों के लिए वरदान पूर्ण आदेश पारित किया है अब वह निश्चिंत होकर जीवन यापन कर सकेंगे जब तक कि मामले में कोई निराकरण नहीं हो जाता।

