
वैसे हम समर्थक नहीं हैं कुंवर विजय शाह के जो मध्य प्रदेश के मंत्री हैं जनजाति समाज के हैं और राजवाड़े से हैं जिन्होंने भारत के वीर महिलासैनिकों के खिलाफ राह चलते अभद्र भाषा का उपयोग किया था वह बेहद निंदनीय है इसका कोई भी देशभक्त समर्थन नहीं करेगा किंतु जो राष्ट्रपति ट्रंप जो हमारी आर्थिक साम्राज्य आबादी ताकत का पुरोधा है कई महीनो से इसी सिंदूर ऑपरेशन पर मनमानी टिप्पणी कररहा था उसके खिलाफ हमने क्या किया यह प्रश्न है रही विजय सिंह की बात तो उनका अपना अंदाज है पिछले बार अपने ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की पत्नी साधना सिंह के खिलाफ यूं कहना चाहिए मूर्खतापूर्ण अभद्रता की थी उन्हें बाहरका रास्ता दिखाया गया और फिर वापस से सम्मान बुला लिया गया यानी माफी नाम जारी कर दिया गया क्योंकि वे जनजाति समाज के व्यक्ति हैं कुंवर है तो क्या हुआ तो सुप्रीम कोर्ट को जो करना चाहिए वह कर रहे हैं उनकी ड्यूटी है लेकिन पश्चिम बंगाल के 27 लाख मतदाताओं परजो टिप्पणी की गईथी कि वह अगली बार वोट डाल देंगे संवैधानिक अधिकार की देशभक्ति से कमजोर टिप्पणी नहीं कहा जा सकता उसके लिए तो कोई प्रायश्चित नहीं दीक्षा अब तक। तो गलतियां हैं होती हैं शिवराज ने तो माफी कर दिया कुंवर साहब के पीछे क्यों पड़े हैं क्या वे वह जनजाति समाज से आने वाली राजनीतिक बलि का स्वरूप बनेंगे या फिर उनके साथ एक नया मॉडल तय होगा कि ऐसे मामलों में गुजराती क्या होगा, मंत्री भी रहेंगे मुकदमा भी चलेगा जेल भी चले जाएंगे दंडित हो जाएंगे कुंवर साहब के लिए ऐसे जेल का क्या मायने उन्हें जेल चले जाना चाहिए लाज भी बच जाएगी आदेश का पालन भी हो जाएगा…
( त्रिलोकीनाथ )
कुंवर विजय शाह विवाद: सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख और राजनीतिक सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के जनजातीय कल्याण मंत्री कुंवर विजय शाह के उन आपत्तिजनक बयानों को “अत्यधिक दुर्भाग्यपूर्ण” करार दिया है, जो उन्होंने भारतीय सेना की महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के बारे में दिए थे।ऑपरेशन सिंदूर के ठीक बाद दिए गए इन बयानों ने न केवल सेना की गरिमा को ठेस पहुंचाई, बल्कि पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया। शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमलय बागची की पीठ ने राज्य सरकार को शाह पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने का स्पष्ट निर्देश दिया और कहा- “बहुत हो गया।”
घटना का संक्षिप्त विवरण
कर्नल सोफिया कुरैशी ने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी भूमिका निभाई थी, जिसकी देशव्यापी सराहना हुई। इसी दौरान मंत्री कुंवर विजय शाह ने ऐसी टिप्पणियाँ कीं जिन्हें सेना की महिला सैनिकों के प्रति अभद्र और अपमानजनक माना गया। राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्वीकार किया कि बयान दुर्भाग्यपूर्ण था, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि मंत्री का इरादा शायद प्रशंसा का था, लेकिन शब्दों का चयन गलत हो गया। कोर्ट ने इस बचाव को स्वीकार नहीं किया और साफ कहा कि मंत्री को पछतावा भी नहीं है। कोर्ट ने 19 जनवरी के अपने पूर्व आदेश का हवाला देते हुए राज्य सरकार को चार सप्ताह के अंदर मंजूरी देने का निर्देश दिया। एसआईटी की रिपोर्ट में भी शाह पर मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई थी, जिसके लिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 196 के तहत सरकार की मंजूरी जरूरी है।
राजनीतिक और सामाजिक आयाम
यह मामला केवल एक मंत्री के बयान तक सीमित नहीं है। यह बड़े सवाल उठाता है सेना और महिला सैनिकों का सम्मान, देश की सुरक्षा में तैनात महिलाओं, खासकर अधिकारियों के खिलाफ इस तरह की भाषा किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकती। देशभक्त नागरिक इसे निंदनीय मानते हैं।
जनजातीय कार्ड: कुंवर विजय शाह राजपूत-जनजाति पृष्ठभूमि से आते हैं। विपक्ष और कुछ विश्लेषक इसे “जनजातीय राजनीतिक बलि” के रूप में देख रहे हैं, जबकि सरकार समर्थक इसे “गलती पर कार्रवाई” बता रहे हैं। याद रहे, शाह पहले भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी साधना सिंह के खिलाफ विवादास्पद बयान दे चुके हैं, जिसके बाद उन्हें मंत्रिपरिषद से बाहर किया गया था और बाद में वापस लिया गया।
कानूनी प्रक्रिया और आगे का रास्ता
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को साफ निर्देश दिया है कि वह अपने पिछले आदेश का पालन करे। अब मध्य प्रदेश सरकार के सामने दो विकल्प हैं- या तो मंजूरी दे मुकदमा चलाए, या फिर कोर्ट की नाराजगी झेले। अगर मुकदमा चला तो मंत्री पर सांप्रदायिक घृणा फैलाने जैसे गंभीर आरोप लग सकते हैं। कुछ लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह नया मॉडल बनेगा- मंत्री बने रहेंगे, मुकदमा भी चलेगा, जेल भी जा सकते हैं? या फिर जनजातीय समीकरणों के चलते कोई समझौता हो जाएगा?
कुंवर विजय शाह प्रकरण एक बार फिर याद दिलाता है कि लोकतंत्र में पद और पृष्ठभूमि चाहे जो भी हो, संवैधानिक संस्थाओं और सेना के सम्मान की रक्षा सबसे ऊपर है। सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख स्वागत योग्य है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया में स्थिरता और समानता भी जरूरी है। अगर एक मंत्री की “जुबान फिसलने” पर इतनी तेजी से कार्रवाई होती है, तो अन्य बड़े-बड़े बयानों पर भी उसी नजरिए से देखा जाना चाहिए।देश की सेना की महिला वीरांगनाओं का अपमान कोई भी राजनीतिक हस्ती नहीं कर सकती। साथ ही, राजनीतिक प्रतिशोध या चयनात्मक कार्रवाई भी लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। अब देखना यह है कि मध्य प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश का कितनी जल्दी और निष्पक्षता से पालन करती है।अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा ऑपरेशन सिंदूर पर महीनों तक की गई टिप्पणियों पर भारत ने क्या ठोस कदम उठाया? पश्चिम बंगाल के 27 लाख मतदाताओं पर की गई टिप्पणियों का क्या हुआ? इन दोहरा मापदंड के सवालों पर अभी तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला है।

