
दिल्ली विश्वविद्यालय के पास पेइंग गेस्ट भवन ढहने से सात मौतें: लापरवाही, लालच और व्यवस्था की विफलता
दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास के पेइंग गेस्ट आवासों में भारत के विभिन्न राज्यों से आए छात्र रहते थे। इनमें से एक जर्जर भवन लापरवाही के कारण ढह गया। अभी तक सात लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। इनमें छह विद्यार्थी शामिल हैं, जिनकी उम्र 20 वर्ष से कम थी, और एक 75 वर्षीय मजदूर भी मलबे में दबकर मारा गया। मकान मालकिन उर्मिला गुप्ता (75) और उनके पति पूर्व एयर मार्शल हरिराम गुप्ता (81) गिरफ्तार किए गए हैं। कुछ कर्मचारी और अधिकारी भी निलंबित कर दिए गए हैं।
दैनिक जनसत्ता में लीड समाचार के साथ प्रकाशित फोटो में हरिराम गुप्ता वायुसेना की वर्दी में दिख रहे हैं। पुलिस ने उन्हें इसी परिधान में गिरफ्तार किया। यह दृश्य कई सवाल खड़े करता है। मृतक बच्चों के प्रति संवेदना स्वाभाविक है, लेकिन इन बुजुर्गों के प्रति भी संवेदना का भाव होना चाहिए। बच्चे सस्ते मकान की लालच में फंसे, जबकि बुजुर्ग धन की लालच में। 75 वर्षीय मजदूर संभवतः मजबूरी में दिहाड़ी मजदूरी कर रहा था। 40 घंटे बीत जाने के बावजूद अभी भी पूरे आंकड़े स्पष्ट नहीं हैं कि इस दुर्घटना में कुल कितने लोग मारे गए।
दिल्ली विश्वविद्यालय में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी पढ़ाई की थी। तब वे छात्र नेता थीं और बाद में राजनीति में सक्रिय रहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उन्हें छात्रों की मूलभूत समस्याओं का अंदाजा नहीं था? या राजनीति के जंगल में जाने के बाद वे उन जिम्मेदारियों को भूल गईं, जो छात्र जीवन में उन्हें महसूस होती थीं। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने छात्रावास और सुरक्षित आवास की समस्या को प्राथमिकता क्यों नहीं दी? आंकड़े बताते हैं कि तीन लाख से अधिक विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए पर्याप्त छात्रावास उपलब्ध नहीं हैं। मजबूरी में छात्र इन गलियों के असुरक्षित पेइंग गेस्ट घरों में रहने को विवश हैं—जहाँ न पढ़ने लायक माहौल है, न स्वच्छ हवा, और न ही वे मानक पूरे होते हैं जिनकी एक विद्यार्थी को जरूरत होती है। ऐसी घटनाएँ दिल्ली में आम होती जा रही हैं।
इसी दिन प्रकाशित एक अन्य खबर में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के प्रमुख प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि स्वच्छ हवा विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरत है। उन्होंने प्रत्येक नागरिक का दायित्व बताया कि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण मिले। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा में मजदूरों के सुनियोजित दमन पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने एक छात्र आकृति चौधरी के मामले में भी व्यवस्था पर सख्त टिप्पणी करते हुए उन्हें पाँच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और संबंधित अधिकारियों की सेवा पुस्तिका में न्यायालय के आदेश दर्ज करने को कहा।
इन घटनाओं से क्या सिस्टम कुछ सीखने को तैयार है, या केवल समय बिता रहा है? जंतर मंतर के आंदोलनों में भी अनदेखी का रुझान देखा गया। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से मामले को दबाने के प्रयास हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 15 अगस्त को लाल किले से “दिमागी नक्सल” और दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में “नाराज फूफा” जैसी टिप्पणियाँ भी चर्चा में रहीं। लेकिन दिल्ली में बच्चों और बुजुर्गों की मौत लापरवाही से हो रही है। एक बुजुर्ग दंपत्ति वायुसेना की वर्दी के नकाब में अपराध से बच निकलने का प्रयास करता दिखता है—यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
व्यक्तिगत अनुभव भी इस पीड़ा को गहरा करते हैं। जब मैंने अपने बेटे को कोटा पढ़ने भेजा था, तो राजीव गांधी चौक के पास स्ट्रीट लाइट के खंभे में करंट लगने से बरसात के दिन शहडोल के एक व्यवहारी परिवार के बच्चे की मौत हो गई थी। उस घटना ने अराजकता, कुप्रबंधन और नगरीय विकास की लापरवाही का दहशत भरा अनुभव दिया था। सत्य निकेतन जैसी जगहों पर दबकर मरे बच्चों के परिवार आज लोकतंत्र के भयानक रूप का अनुभव कर रहे होंगे।
दिल्ली सर्वाधिक सुरक्षित क्षेत्र क्यों नहीं होनी चाहिए? नई दिल्ली के महत्वपूर्ण इलाकों—जहाँ मंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति रहते हैं—वहाँ सुरक्षा का इंतजाम है। क्या पूरी सुरक्षा व्यवस्था इन चंद लोगों ने प्राथमिकता क्रम में अपहरण कर ली है? क्या इन घटनाओं में निकलने वाली लाशों के लिए नेता जिम्मेदार नहीं हैं? क्या यही हमारा लोकतंत्र है? सोचने की जरूरत है कि देश की आजादी इन लापरवाह व्यवस्थाओं के हाथ में कैसे चली गई। कोई जिम्मेदार अधिकारी स्वयं आगे आकर इस्तीफा क्यों नहीं देता? भारतीय जनता पार्टी के पार्षद से लेकर प्रधानमंत्री तक, दिल्ली में इन बच्चों की मौत के लिए जवाबदेही क्यों नहीं तय हो रही?मृतक बच्चों के प्रति हार्दिक संवेदनाएँ। लेकिन संवेदना के अलावा भी कुछ करने की जरूरत है। अपनी सुरक्षा हमें स्वयं सुनिश्चित करनी होगी, क्योंकि व्यवस्था बार-बार विफल साबित हो रही है।

