
चिंदी में हिंदी की बिंदी गायब हो गई..
“इक दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा…”
आज हिंदी दिवस है इसलिए विज्ञापन छपा है यादगार गाना है ” इक दिल के टुकड़े हजार हुये कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा…” ओ पी दत्ता के निर्देशित, फिल्म प्यार की जीत के लिए मोहम्मद रफी ने 1948 में फिल्म यह गाना गया था, उसकी शुरुआती लाइन ऐसी ही थी वंदे मातरम की तरह दिलों में बसी है ज्यादा गाना सुनना है तो यूट्यूब में जाकर जरूर सुनना चाहिए, वैसे कोई आवश्यक नहीं है अपने-अपने आनंद का विषय है।बहरहाल दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय ब्रिक्स का सम्मेलन 13 सितंबर को समाप्त हो गया अच्छा हुआ वह 13 सितंबर को समाप्त हो गया अगर 14 सितंबर को समाप्त होता और विज्ञापन जैसा कि दिल्ली सरकार ने छापा है दिल्ली में छपता तो गाने के मुखड़े के तर्ज में हमारी राजभाषा हिंदी के चिंदी हो जाते हैं क्योंकि जिन्होंने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के ब्रिक्स सत्र के समापन समारोह में जिस प्रकार का हिंदी बोला गया है वह हिंदी इंग्लिश की चिंदी में लिपटी समझ में आती है यह कह सकते हैं चिंदी में हिंदी लिपटी दिखती है।मोदी जी ने हिंदी में अपना समापन भाषण क्यों दिया वह तो वही जाने लेकिन अगर हिंदी में ही भाषण देना था तो पूरी हिंदी में देना चाहिए था ताकि भारतीयों को भी समझ में आ जाए उन्हें डिक्शनरी खोज कर अर्थ ना समझाना पड़े। हो सकता है जब चीनी भाषा में वहां के राष्ट्रपति या रूसी भाषा में वहां के राष्ट्रपति अपना भाषण देते तो कुछ इसी प्रकार से देते हैं अब अपने समझ में तो आता नहीं वह क्या देते और क्या नहीं देते लेकिन हिंदी समझ में आती है इसलिए हम समझ पाए की अंग्रेजी को बीच में घुसेडने की जरूरत नहीं थी हिंदी ही इतनी खूबसूरत है कि वह अपनी प्रस्तुति में सोने में सुहागा लगाती नजर आती है।
(त्रिलोकी नाथ)
भाषा का श्रृंगार उसकी पूर्णता में है। अपूर्ण भाषा की प्रस्तुति का प्रचलन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और टीवी चैनलों के आने के बाद बढ़ा। मीडिया की जिम्मेदारी थी कि वह भाषाओं की गहराई और रस को आम लोगों तक पहुँचाए, लेकिन उसने राज कपूर की “मेरा जूता है जापानी… फिर भी दिल है हिंदुस्तानी” वाली मिश्रित भाषा को बढ़ावा दे दिया।
हिंदी दिवस पर बड़े-बड़े विज्ञापन छापे जाते हैं—लाखों-करोड़ों के। लेकिन हिंदी की सुंदरता को बचाने के लिए मार्गदर्शन कहाँ है? पहले के नेता अलग थे। अटल बिहारी वाजपेयी संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी बोलते थे तो शुद्ध हिंदी ही बोलते थे। चाहे तो वे भी अंग्रेजी घुसेड़ सकते थे, लेकिन उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। विश्व मंच पर उन्होंने हिंदी की ताकत को प्रदर्शित किया। जब भाषा परिवर्तन का पूरा सिस्टम बैठा हो, तो अनुवाद संभव है। लेकिन जब हिंदी ही अंग्रेजी में लिपटी हो, तो उसका आनंद और उसकी आत्मा दोनों खो जाते हैं।
भारत में कई भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। सबका अपना रस है, अपनी चाहत है। कुछ भाषाओं को मुद्रा पर भी स्थान मिला है। लोककथाओं की तरह कई भाषाएँ जिंदा हैं। इनमें हिंदी भी एक है। लेकिन मीडिया और नेतृत्व ने हिंदी-अंग्रेजी मिश्रण को स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब देश के नेता विश्व के बड़े मंचों पर चिंदी में लिपटी हिंदी प्रस्तुत करते हैं, तो हिंदी फटे कपड़ों वाले मजदूर जैसी लगती है। उसका श्रृंगार—उसकी बिंदी—गायब हो जाती है। सुहागन की बिंदी गायब होने पर वह विधवा जैसी दिखती है। ठीक वैसी ही हालत हिंदी की हो जाती है।
जब भी कोई भाषा बड़े मंच से बोली जाए, तो उसके पूर्ण स्वरूप में ही प्रस्तुत की जानी चाहिए। तभी वह अपना सौंदर्य बोध जगा पाती है। वर्तमान में चाटुकारिता और चमचागिरी के चक्कर में हिंदी की बिंदी गायब कर दी गई है। हो सकता है भाषण गैर-भारतीय प्रशासनिक सेवा के लोगों ने लिखे हों, या ज्यादा स्मार्ट दिखने की होड़ में हिंदी स्मार्ट सिटी की तरह गायब होती जा रही हो। , बेहतर होता कि प्रधानमंत्री का ब्रिक्स 2026 सत्र का उद्घाटन और समापन भाषण या तो पूरी तरह अंग्रेजी में होता, या पूरी तरह शुद्ध हिंदी में।
भाषाओं के साथ न्याय ही उन्हें बेहतर प्रस्तुति देता है। जब भाषा को राजनीतिक टूलकिट बना लिया जाता है, तो वह अभद्र हो जाती है। देश में यही हो रहा है। भाषाओं का सौंदर्य बोध और उनका आनंद-रस कम होता जा रहा है—या गायब हो रहा है। हिंदी की बिंदी वापस लगानी होगी। नहीं तो दिल के टुकड़े की तरह हिंदी भी बिखरती रहेगी—कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा।

