मणिपुर के रामराज्य में सीता (महिलाएं) कब तक अपमानित और हत्या का शिकार होती रहेगी; क्या निराश हुआ जाए…? (त्रिलोकी नाथ)

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मणिपुर, आदिवासी अधिकार और ‘रामराज्य’ का प्रश्न: संवैधानिक सुरक्षा, हिंसा और शासन की परीक्षा

       भारत में 2014 के बाद से ‘रामराज्य’ और हिंदुत्व की चर्चा अक्सर विकास, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और सुशासन से जोड़ी जाती है। पर मणिपुर में पिछले तीन वर्षों से जारी जातीय हिंसा, शहडोल जैसे पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में संसाधनों के दोहन और अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट की प्रशासनिक चुनौतियों को एक साथ रखकर देखने पर एक गहरी बेचैनी उभरती है। क्या संवैधानिक सुरक्षा तंत्र आदिवासी क्षेत्रों में काम कर रहा है? क्या कानून का शासन समान रूप से लागू हो रहा है? और क्या यही वह रामराज्य है जिसकी कल्पना की गई थी…?

                                                         (त्रिलोकी नाथ)
संवैधानिक ढाँचा और मणिपुर की वास्तविकता
संविधान की छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त जिला परिषदों के माध्यम से विशेष स्वायत्तता देती है। मणिपुर इसमें शामिल नहीं है। मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अनुच्छेद 371C के तहत विधानसभा में पहाड़ी क्षेत्रों की समिति और राज्यपाल की विशेष जिम्मेदारी का प्रावधान है। पाँचवीं अनुसूची मध्य भारत के अनुसूचित क्षेत्रों (जैसे मध्य प्रदेश के शहडोल संभाग के कई हिस्से) पर लागू होती है, जहाँ जनजातीय सलाहकार परिषद और राज्यपाल की भूमिका है।मणिपुर में मई 2023 में मेतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच हिंसा शुरू हुई। राज्य सरकार के अनुसार अगस्त 2026 तक 306 लोग मारे जा चुके हैं और 49 लापता हैं। हजारों घर जले, धार्मिक स्थल क्षतिग्रस्त हुए और लगभग 60,000 लोग विस्थापित हुए, जिनमें से हजारों अभी भी राहत शिविरों में हैं। 2023 में महिलाओं के निर्वस्त्र प्रदर्शन की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया था। फिर भी तीन वर्ष बाद भी दोषियों की सजा और व्यापक न्याय की प्रक्रिया धीमी रही है। हाल के महीनों में भी हत्याएँ और हिंसा की घटनाएँ जारी रहीं। राष्ट्रपति शासन लगा, फिर हटा, नई सरकार बनी, पर विश्वास की कमी और सुरक्षा की चुनौती बनी हुई है। मणिपुर में पहाड़ी और घाटी के बीच भूमि, स्टेटस और संसाधनों के लंबे विवाद हैं। हिंसा को केवल ‘स्थानीय’ कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता; यह संवैधानिक सुरक्षा, प्रशासनिक निष्पक्षता और न्याय की व्यवस्था की परीक्षा है।
शहडोल और संसाधनों का प्रश्न
मध्य प्रदेश के शहडोल क्षेत्र में रिलायंस इंडस्ट्रीज कोयला परत मीथेन (CBM) का उत्पादन कर रही है। यह परियोजना 2000 के दशक की शुरुआत में केंद्र सरकार के तहत शुरू हुई। सोहागपुर ब्लॉक में उत्पादन जारी है और कंपनी ने उत्पादन बढ़ाने के लिए निवेश की घोषणाएँ भी की हैं। पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में खनन और गैस निकालने पर जनजातीय भूमि अधिकार, ग्राम सभा की सहमति और पर्यावरण संरक्षण के सवाल बार-बार उठते रहे हैं। कई मामलों में पारदर्शिता, मुआवजा और कानूनी प्रक्रियाओं पर विवाद दर्ज हुए हैं। मध्य प्रदेश खनिज नियमों बिना किसी खनिज अनुबंध के 2009 से गैस कह सकते हैं अवैध रूप से निकल जा रही है कितनी निकाली जा रही है..? यह भी कितना सच है…? कितना वह कह देती है… मानना पड़ता है.. क्योंकि जब कोई खनिज अनुबंध ही नहीं है तो खान सुरक्षा की य क्षेत्रीय सुरक्षा के हितों की संविधान की पांचवी अनुसूची प्राकृतिक संसाधनों के दोनों के मामले में सुरक्षित होता क्या उसका पालन हो पा रहा है शायद बिल्कुल नहीं हो रहा है…?    दुर्घटना के लिए   यदि कोई ठेकेदार  कॉन्टैक्टर या मामूली सा कोई कर्मचारी जिम्मेदार ठहराया जाए तो गलत नहीं… रिलायंस के मालिक और  डायरेक्टर उस दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कभी नहीं होंगे क्योंकि कोई अनुबंध ही नहीं है उपलब्ध मापदंडो करने के अनुरूप कोई दंड का भागीदार नहीं होगा…. क्योंकि कोई संविधान की पांचवी अनुसूची की दायरे में 2009 से चालू हुए 2029 तक के लिए खनिज गैस उत्पादन के लिए समझ में आने वाला कोई कानूनी अनुबंध नहीं है.. जितनी रॉयल्टी दे दी गई वह उसकी कृपा है फिलहाल तो उपलब्ध शासकीय दस्तावेज यही कहते हैं….अगर कोई परियोजना बिना अनुबंध पर्याप्त कानूनी अनुपालन या स्थानीय हितों की प्राथमिकता के चल रही हो, तो वह पाँचवीं अनुसूची की भावना के विपरीत है। संसाधन दोहन और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन बनाना शासन की जिम्मेदारी है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक में स्थापित किया गया था। इसकी एक क्षेत्रीय कैंपस मणिपुर में भी है। इसका उद्देश्य जनजातीय समाज को उच्च शिक्षा उपलब्ध कराना था। शिक्षा और विकास के ऐसे प्रयास सकारात्मक हैं, पर वे सुरक्षा, न्याय और संसाधन अधिकारों की जगह नहीं ले सकते।

अयोध्या का मंदिर और प्रशासनिक चुनौतियाँ
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण एक ऐतिहासिक और भावनात्मक उपलब्धि रहा। हाल में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को अपना पहला सीईओ नियुक्त किया। यह नियुक्ति दान की कथित गबन की घटनाओं और कुछ पदाधिकारियों के इस्तीफे के बाद हुई। मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और आध्यात्मिक पवित्रता बनाए रखना आवश्यक है। कोई भी धार्मिक संस्थान अगर प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं से घिर जाए तो उसकी साख प्रभावित होती है।  केवल मंदिर निर्माण पर्याप्त नहीं।
बड़े सवाल
मणिपुर की हिंसा और शहडोल जैसे क्षेत्रों में संसाधन प्रबंधन दोनों ही कानून के शासन की परीक्षा हैं। एक जगह हिंसा और न्याय की देरी, दूसरी जगह कथित कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी। दोनों में आम लोगों—खासकर महिलाओं, बच्चों और जनजातीय समुदायों—की पीड़ा है। अगर व्यवस्था किसी क्षेत्र में हिंसा को प्रभावी ढंग से रोकने या संसाधन दोहन को पारदर्शी और हितकर बनाने में असफल दिखती है, तो ‘विकसित भारत’ या ‘रामराज्य’ के दावे खोखले लगने लगते हैं।
यह निराशा का माहौल हो सकता है,  आदिवासी क्षेत्र के निवासी संविधान की सुरक्षा का अधिकार रखते हैं। गुलामी कोई संस्कृति नहीं हो सकती—चाहे वह आर्थिक हो, प्रशासनिक हो या सांस्कृतिक। रामराज्य की सच्ची परीक्षा यह है किकमजोर वर्गों को न्याय, सुरक्षा और गरिमा मिले। अगर सोचने की क्षमता बची है तो इन सवालों पर गंभीर चर्चा जरूरी है। अन्यथा गर्व का भाव खोखला रह जाएगा।

अब सवाल यह है कि भारत की संवैधानिक लोकतांत्रिक स्थिति अकेले विधायिका पर नहीं है जहां बहुतायत स्थिति में अपराधिक पृष्ठभूमि के लोग कब्जा कर लेते हैं या फिर अनपढ़ टाइप के लोग जिनके बीच में बौद्धिकता दबी रह जाती है जिन्हें लगभग शून्य वेतनमान पर समाज सेवा के लिए प्रतिनिधित्व का अवसर मिला था उन्होंने कार्यपालिका के अधिकारियों से भी ज्यादा अपने तनख्वाह बना ली हैतो क्या कार्यपालिका स्वतंत्र नहीं है कि उसके पढ़ा-लिखा समझ और उच्च वेतन मान पानी वाला बौद्धिक व्यक्ति भी अपने को गुलाम बनाए रखने में ही अपनी सहूलियत देखा है किंतु न्यायपालिका तो पूर्ण स्वतंत्रता है उसकी संज्ञान प्रणाली आखिर दम क्यों तोड़ देती है बिना किसी परिणाम दायक निर्णय के रही पत्रकारिता की बात जो अघोषित चतुर्थ लोकतांत्रिक स्तंभ माना जाता है उसका तो संविधान ने कोई संवैधानिक जन्म दिया ही नहीं उसे न तो आर्थिक तौर पर मजबूत किया गया ना कोई सामाजिक सुरक्षा दी गई और ना ही न्याय प्रणाली उसे न्याय की गारंटी देता दिखाई देता है वह तो सबसे गरीब कड़ी है उसे तो गुलाम, प्राथमिकता क्रम में पहले ही होना चाहिए

अगर कॉरपोरेट का पूंजीवाद इस देश को नियंत्रित करने लगा हो इसलिए भी चिंतन करना चाहिए कि हम किस और बढ़ रहे हैं और इसका अंत कहां होगा क्या जल्दी स्वतंत्रता प्रकार जल्दी गुलाम हो जाने की जल्दबाजी की ओर हम बढ़ के चले हैं क्योंकि अंतत लोकतंत्र में मालिक हमीं नौकर को ठहराया जाता है तो जो भी हो रहा है उसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं…? तो क्या हम निराश हो जाएं या फिर अंधकार से प्रकाश की ओर चलने का साहस करें…..

 

 


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