
आज हम “कुतुब मीनार” में थे, कुतुब
मीनार इसलिए क्योंकि हम आदिवासी क्षेत्र के निवासी हैं। और यह गाना बड़ा प्रचलित हुआ था…
देखो-देखो-देखो, पैसा फेंको, तमाशा देखो….दिल्ली का कुतुब मीनार, देखो ….बंबई शहर की बाजार देखो….
आदि आदि,इसलिए यह जहां में बसा हुआ था की दिल्ली की औकात चाहे जो भी हो लेकिन कुतुब मीनार की औकात में आदमी को अपनी औकात को नापना चाहिए। हमने भी कुतुब मीनार के पास अपनी हैसियत को नापने का काम किया।
————–( त्रिलोकीनाथ)————
क्योंकि 2 दिन पहले ही 56 इंच के सीने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो संसद के अंदर
मणिपुर की हिंसा में शुतुरमुर्ग की तरह खड़े होकर मणिपुर की हिंसा की आंधी को नहीं देखना चाहते थे इसलिए वह एक नई आंधी की कल्पना अपने दो घंटा की बकबक बाजी में बिता दिया।।
“बक-बक बाजी” यह हमारी आदिवासी क्षेत्र की कोरी कल्पना नहीं है बल्कि भारत और विश्व में सबसे
बड़े शहरों में एक कोलकाता के लोकप्रिय दैनिक अखबार “द टेलीग्राफ” की फ्रंट-पेज की संसद में बोली गई नरेंद्र मोदी की भाषा है, जिसे अखबार ने अपनी लीड न्यूज़ बनाया। जो कुछ इस प्रकार का था ।हम इतिहास में घूम रहे थे, इतिहास था… करीब 1000 साल पहले का ; तब खिलजी को शौक हुआ कि
वह कुतुबुद्दीन ऐबक के कुतुब मीनार से बड़ी “अलाई मीनार” बनावे। ऐसा इतिहासकारों ने वहां पर लिखा है। किंतु खिलजी कि यह कल्पना धरी रह गई।
अब लोकतंत्र है भारत में लेकिन जब से नरेंद्र मोदी आए हैं वह कह रहे हैं कि 2014 में देश आजाद हुआ है, और अपनी आजादी के 9 साल के अंदर ही उन्होंने तमाम लज्जा-मर्यादा को लांघते हुए मरुस्थल बनी
भारतीय संसद के मरुस्थल में खड़े शुतुरमुर्ग की तरह कह रहे थे कि यह वह कालखंड है जिसमे जो लिखा जाएगा उसका प्रभाव आने वाले 1000 साल तक पड़ेगा… ठीक यही बात करीब 1300में खिलजी भी सोचा था… लेकिन कुतुब मीनार के बगल में खड़ी या “अलाई मीनार” खंडहर इमारत गवाह है इस इतिहास के खिलजी की कल्पना को उड़ान नहीं मिली, और खंडहर अब दिल्ली के पर्यटक को के काम आ रही है… किंतु इससे अपने धार्मिक पाखंड को स्थापित करने में खिलजी खत्म हो गया….
तो क्या नया खिलजी लोकतंत्र में नई शेखचिल्ली के सपने देख रहा है..? या फिर वह मणिपुर की हिंसा को भुला देने के लिए अपने काल्पनिक 1000 साल प्रभाव डालने वाले प्रभावित करने वाले कारक के “प्लान-बी” को प्रस्तुत कर रहे थे, क्योंकि “प्लान-ए” मणिपुर की हिंसा को भुला देने के लिए स्मृति ईरानी की कहानी “राहुल की फ्लाइंग किस”बुरी तरह पिट गई और “चाची-४२०” साबित हो गई थीं।तो क्या खिलजी का पुनर्जन्म संसद में फिर से हो गया था… जो वह आगामी 1000 साल तक प्रभाव डालने वाली खंडहर का स्मारक खड़ा कर रहा था यह बड़ा प्रश्न है …?








