
आम नागरिक उतना ही गरीब वैचारिक रूप से लाचार और अपाहिज हो चुका है जितना कि हमारे देश के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जब डॉलर के मुकाबले रुपया गिरता है तो देश की इज्जत गिरती है तब डॉलर 58 रुपए का था जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हुआ करते थे बात कही गई थी अब 21वीं साड़ी है. अब वही मुख्यमंत्री, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हो गए हैं तो डॉलर 87 रुपए के पास पहुंच गया है इससे भी देश की इज्जत नहीं गिरती… स्वाभाविक है देश का माफिया तंत्र मजबूत हो रहा है तो इसमें डरना क्यों….? जमीर ही तो है वह मरता रहे इसमें घबराना क्यों…. इसमें भी गर्व करिए कि आप एक अराजक लोकतंत्र में जिंदा है….?
मध्य प्रदेश विद्युत मंडल जो वर्तमान में एक आशिक निजी वितरण कंपनी के रूप में निजीकृत हो गई है। और उसकी व्यवस्था में आम नागरिक को किस तरह प्रताड़ित होता है कि यह कंपनी लोगों को मारती भी है और रोने भी नहीं देती। किंतु करीब 100 महीने इसकी प्रताड़ना और मार को बर्दाश्त करने के बाद अपने नागरिक जमीर को जिंदा रखते हुए शहडोल के वरिष्ठतम चिकित्सक व पूर्व जिलाधिकारी डॉ के एन मित्तल ने वर्तमान व्यवस्था को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया है उन्होंने अपने व्यंगात्मक क्षमा याचना में स्वयं को दोषी ठहराते हुए आम लोगों से विज्ञापन जारी कर क्षमा याचना की है। सचमुच में यह देखा जाए तो जिस तरह प्रयागराज के कुंभ में उत्तर प्रदेश की सरकार ने जोर-जोर से प्रचार किया कि यह डिजिटल कुंभ होगा और अत्यधिक संसाधनों से लैस होगा लेकिन जैसे ही वहां पर बुलाई गई भीड़ का दवाब बढ़ा पूरी व्यवस्था चरमरा गई। सैकड़ो लोग इस व्यवस्था में अपनी जान गंवा दिए लेकिन मुख्यमंत्री आदित्य नाथ भगवा वस्त्र पहनकर खुलेआम झूठ बोलते हुए अपने झूठ पर पूरी ईमानदारी से खड़े रहे कि 30 लोग मर गए हैं और 60 लोग घायल हो गए हैं। हो सकता है उसमें उनकी अपनी पार्टी के लोग मारे हैं जिन्हें 25 लाख रुपए उन्हें देना हो…? जबकि वास्तव में सैकड़ो की मरने की तादाद है और हजारों की घायल होने की किंतु कोई देखने सुनने वाला नहीं है।
कुछ इसी तरह हमारी विद्युत प्रशासनिक प्रणाली का शिकार हुए डॉ के एन मित्तल हताशा और अवसाद से बचने के लिए एक नागरिक होने के नाते शर्म से उबरने के लिए ही शायद यह व्यंगात्मक विज्ञापन प्रकाशित किया है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर यह कहा है कि किस तरह 2017 में उनके घर की लाइट अपमानजनक तरीके से काट दी गई थी फर्जी बिल बनाकर के। हालांकि वह संपन्न थे इसलिए अपने मनोबल को बढ़ाते हुए न सिर्फ विद्युत विभाग के लगभग लूटने के अंदाज में लूटी गई बिल को पेमेंट किया बल्कि एक लड़ाई लड़ी और उनके अनुसार अब विद्युत विभाग उनसे कह रहा है कि यह कृत्य बुरे मकसद से प्रकरण झूठ बनाया गया था और सारा नाटक उन्हें परेशान करने के लिए किया गया था। अब जब यह बात शहडोल की वरिष्ठतम नागरिक डॉक्टर मित्तल कर ही रहे हैं तो विद्युत वितरण कंपनी के लोगों को सार्वजनिक माफी क्यों नहीं मांगनी चाहिए…? जबकि वह वर्तमान में भी डिजिटल तरीके से आम नागरिकों से खुलेआम मनमानी बिल भेज रही है और आदिवासी क्षेत्र के लोगों को भी उसी तरह से अवैध वसूली कर रही है जिस तरह से अन्य क्षेत्रों में कर रही है. किंतु उसकी सुनवाई के लिए कोई स्थानीय व्यवस्था दिखाई नहीं देती… कहने को विद्युत उपभोक्ता फोरम बना हुआ है किंतु करोड़ उपभोक्ताओं में उंगली में भी गिरने वाले शिकायतों पर इसकी लड़ाई कितनी जटिल है कि आम नागरिक को लुटवाने की प्रणाली सस्ती लगती है। बजाय इसके कि वह विद्युत फोरम के चक्कर पर चक्कर लगाता रहे। आखिर क्यों विद्युत उपभोक्ता फोरम ने एक वरिष्ठ डॉक्टर को प्रताड़ित करने के लिए सरे आम माफी नामा करने का निर्देश विद्युत वितरण कंपनी को नहीं दिया। ताकि यह संदेश जाए कि विद्युत वितरण कंपनी आम नागरिकों को इस तरह नहीं लूट सकती।
यह सही है की तत्कालीन विद्युत मंडल में भ्रष्टाचार के कारण या लापरवाही के चलते कंपनी घाटे में चलती थी किंतु जिस तरह से विद्युत वितरण कंपनी बनाकर आम नागरिकों को मनमानी बिल भेज कर डिजिटल तरीके से लूटा जा रहा है उसे पर कोई न्याय पूर्वक विद्युत वितरण की व्यवस्था नहीं है अथवा यह सुनिश्चित नहीं किया जा रहा है कि यदि उपभोक्ता नागरिकों के साथ प्रताड़ना पूर्ण कार्यवाही विद्युत बिल के नाम पर किया जा रहा है तो उसका जुर्माना क्यों ना बड़ा विद्युत वितरण कंपनी के ऊपर लगाया जा सके। डॉक्टर मित्तल की विज्ञापन से यह स्पष्ट है कि उन्हें बताया गया है कि यह झूठे मकसद से बनाया गया प्रकरण था तो उसका 8 वर्ष से प्रताड़ित किए जाने का जुर्माना क्या है…? विद्युत उपभोक्ता फोरम ने यह सुनिश्चित क्यों नहीं किया इससे यह प्रतीत होता है कि हमारी न्याय प्रणाली भी कंपनी के रूप में विकसित माफिया नुमा सिस्टम बनाकर प्रताड़ना का ही एक नया तरीका विकसित कर लिया है… इसके अलावा कुछ नहीं है । क्यों ना हम अपने वरिष्ठ नागरिक डॉक्टर के एन मित्तल को प्रताड़ित किए जाने के लिए विद्युत वितरण कंपनी की निंदा करे क्योंकि ऐसा करके आप अपना जमीर जिंदा रख सकते हैं स्वयं को प्रताड़ित करने के बाद भी। किंतु यदि आम नागरिक ऐसा नहीं सोचता है तो वह एक सच्चा गुलाम है उसका जमीर मर हुआ साबित भी होता है इस घटना से यही प्रमाणित होता है।
क्योंकि उपभोक्ता संगठन मोहल्ला वार नहीं है जिला वार नहीं है नगरवार नहीं है वह बिखरा हुआ है जबकि डिजिटल तरीके से लूटने वाली तमाम कंपनियां संगठित व शासन प्रशासन से संरक्षित होती हैं।जबकि शासन को चाहिए कि निकटतम उपभोक्ता समितियां का गठन करके कंपनी के रूप में विकसित हो रहे निजी विद्युत वितरण कंपनी की तरह ही अन्य प्रकार की डिजिटल लूट प्रणाली से कैसे आम आदमी सस्ता न्याय पा सके। आखिर इस कौन सुनिश्चित करेगा अन्यथा लूट सके तो लूट इस पर तंत्र चल ही रहा है। इसमें कोई शक नहीं। हमारी संवेदनाएं डॉ मित्तल कि संवेदनाएं से मिलकर काम करें तो बात कुछ बने। अन्यथा आप लूट तंत्र में फंस गए हैं ऐसा समझ कर गुलामी पर गर्व कर सकते हैं।एक हिसाब से ठीक भी है भ्रष्टाचारियों और अराजकता के तंत्र में कोई एक तो मुजरिम होगा ही और अगर माफिया तंत्र लूटने वाला मुजरिम नहीं है तो जो लुट गया है वही मुजरिम है एक विद्वान और ख्यातिलब्ध डॉ केएन मित्तल का यह दर्द वास्तव में शहडोल के हर नागरिक का दर्द है क्या इसी दर्द को पाने के लिए यह देश स्वतंत्र हुआ था अवश्य विचार करना चाहिए……

