
भाजपा पत्रकार वार्ता-1: मोदी के 11 साल; उपलब्धियां, मुस्लिम तुष्टिकरण और धार्मिक स्थलों को कब्जाने का मुद्दा….
क्या बोले शहडोल की मोहन राम मंदिर की अराजकता पर…?
शहडोल।
मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी कार्यालय में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में राज्य मंत्री दिलीप जायसवाल ने केंद्र सरकार के नेतृत्व में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 11 साल के शासनकाल की उपलब्धियों का विस्तार से उल्लेख किया। इस दौरान उन्होंने कई मुद्दों पर बात की, जिसमें केंद्र सरकार की नीतियों, विकास कार्यों, और धार्मिक स्थलों के प्रबंधन से जुड़े विवादास्पद मुद्दे शामिल रहे। हालांकि, उनके बयानों ने कुछ गंभीर सवालों को भी जन्म दिया, खासकर धार्मिक स्थलों पर अतिक्रमण और न्यास प्रबंधन के संबंध में।
नरेंद्र मोदी के 11 साल की उपलब्धियां
दिलीप जायसवाल ने अपने संबोधन में कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 11 वर्षों में भारत ने अभूतपूर्व विकास और प्रगति हासिल की है। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों जैसे बुनियादी ढांचा, डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, और आत्मनिर्भर भारत जैसी योजनाओं का उल्लेख किया। उनके अनुसार, इन योजनाओं ने न केवल देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है, बल्कि सामाजिक समावेशन और सांस्कृतिक गौरव को भी बढ़ावा दिया है।
उन्होंने विशेष रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्रों जैसे
अयोध्या, काशी, और उज्जैन के महाकाल मंदिर के विकास पर जोर दिया। जायसवाल ने दावा किया कि इन स्थानों पर मंदिरों के जीर्णोद्धार और कॉरिडोर परियोजनाओं ने न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दी है।
मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप
जायसवाल ने अपने बयान में यह भी कहा कि 2014 से पहले भारत में “मुस्लिम तुष्टिकरण” की नीति अपनाई जाती थी, जिसके कारण हिंदू धार्मिक स्थलों की उपेक्षा की गई। उन्होंने दावा किया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने इस नीति को समाप्त कर सभी समुदायों के लिए समान अवसर और विकास सुनिश्चित किया है। यह बयान वार्ता में चर्चा का एक प्रमुख बिंदु रहा और इसने धार्मिक स्थलों के प्रबंधन से जुड़े सवालों को और गहरा कर दिया।
धार्मिक स्थलों पर न्यास और अतिक्रमण का विवाद
पत्रकार वार्ता में एक महत्वपूर्ण सवाल उठा कि क्या मुस्लिम तुष्टिकरण का वातावरण दिखाकर उसकी कीमत पर हिंदू धार्मिक स्थलों जैसे अयोध्या, काशी, और उज्जैन में मंदिरों का प्रबंधन मनमाने ढंग से बनाए गए न्यासों के हाथों में सौंपा जा रहा है। स्थानीय लोगों की सहभागिता या विमर्श लगभग नहीं होता है ऊपर से कुछ लोग थोप दिए गए होते हैं। जिसका अयोध्या में जिस तर्ज पर राम मंदिर न्यास समिति बनाकर उसमें शंकराचार्य को स्थान न देकर आरएसएस और भाजपा से जुड़े लोगों का प्रभु उपम कर दिया गया तथा राम मंदिर पर उनका कब्जा हो गया। उसी तर्ज पर अन्य न्यायाधीशों का भी निर्माण कर हिंदुओं के आध्यात्मिक केन्द्रों पर कब्जा किया जा रहा है।
विशेष रूप से वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर का उदाहरण दिया गया, जहां कॉरिडोर परियोजना के नाम पर विकास का सपना दिखाकर कथित तौर पर मंदिर परंपरागत गोस्वामी लोगों के हाथों से मंदिर को न्यासा बनाकर कब्जा किया जा रहा है जिसका व्यापक स्तर पर अनधिकृत निर्माण का विरोध हो रहा है..?
इस सवाल के जवाब में जायसवाल ने कहा, “सरकार के लोग न्यास में नहीं होते हैं, इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि सरकार इस तरह के कार्यों को बढ़ावा दे रही है।” हालांकि, उनका यह जवाब कई लोगों को संतोषजनक नहीं लगा, क्योंकि उन्होंने इस मुद्दे पर ठोस तथ्य या कार्रवाई का उल्लेख नहीं किया।
शहडोल के मोहन राम मंदिर का मुद्दा
वार्ता में स्थानीय स्तर पर शहडोल के मोहन राम मंदिर का मुद्दा भी उठा। उठाए गए प्रश्न पर आरोप लगाया कि हाई कोर्ट के 12 साल पुराने आदेश के बावजूद हाई कोर्ट के आदेश का पालन स्थानीय भारतीय जनता पार्टी के लोगों के दबाव के कारण नहीं किया जा रहा है जिससे शहडोल की सबसे बड़ी लोकप्रिय आध्यात्मिक केंद्र का मंदिर की जमीन पर अतिक्रमण हटाया नहीं गया है। यह अतिक्रमण ईदगाह और सिंधी धर्मशाला से जुड़े लोगों द्वारा किया गया है। जबकि मनमानी ढंग से अराजकता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है…? इस पर जायसवाल ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया और चुप्पी साध ली। यह चुप्पी उनके बयानों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है, क्योंकि एक ओर वे केंद्र सरकार की उपलब्धियों और धार्मिक स्थलों के विकास की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर इस तरह के गंभीर मुद्दों पर कार्रवाई की कमी स्पष…
शहडोल में आयोजित इस पत्रकार वार्ता ने एक बार फिर केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। दिलीप जायसवाल ने नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धियों को गिनाने की कोशिश की, लेकिन धार्मिक स्थलों पर अतिक्रमण और न्यास प्रबंधन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर उनके जवाब असंतोषजनक रहे। खासकर मोहन राम मंदिर के मामले में उनकी चुप्पी ने स्थानीय लोगों के बीच असंतोष को और बढ़ा दिया है। यह स्थिति न केवल सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है।
यदि सरकार वास्तव में धार्मिक स्थलों के संरक्षण और विकास के लिए प्रतिबद्ध है, तो उसे न केवल कॉरिडोर परियोजनाओं जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर ध्यान देना होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर मंदिरों की जमीन और संपत्ति की रक्षा के लिए भी प्रभावी कदम उठाने होंगे। शहडोल के मोहन राम मंदिर का मामला इस दिशा में एक महत्वपूर्ण परीक्षा है, और इसका समाधान सरकार की मंशा को स्पष्ट करेगा।

