महिला-पत्रकारिता के मामले में तालिबानी ने भारत में मारा…?तालीबानी विदेश मंत्री की पत्रकार वार्ता की रफू गिरी ( त्रिलोकी नाथ )

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महिलाओं के मामले में तालिबान ने भारत के घर  मारा…?

तालिबानी छाया में भारत का महिला अपमान: देवबंद से दिल्ली तक का सन्नाटा
       आज का भारत, जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र घोषित करता है, कभी-कभी ऐसे आईनों के सामने खड़ा हो जाता है जो उसकी प्रगतिशील छवि को चुनौती देते हैं। 10 अक्टूबर 2025 को नई दिल्ली में अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस एक ऐसा ही आईना              साबित हुई। तालिबान शासन के इस प्रतिनिधि की यात्रा, जो अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों को कुचलने वाली नीतियों का प्रतीक है, भारत की मिट्टी पर पहली बार उतरी तो साथ ही लाई एक शर्मनाक सच्चाई: महिला पत्रकारों को इस प्रेस वार्ता से निष्कासित कर दिया गया। यह घटना न केवल तालिबानी मानसिकता की घुसपैठ को उजागर करती है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संवेदनशीलता पर भी सवाल उठाती है।

( त्रिलोकी नाथ )

प्रेस कॉन्फ्रेंस का नया काला अध्याय:महिलाओं का अनुपस्थित होना
मुत्ताकी का भारत दौरा तालिबान के सत्ता हथियाने के चार साल बाद पहला उच्च-स्तरीय संपर्क था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के बाद अफगान दूतावास में आयोजित इस प्रेस इंटरैक्शन में कोई संयुक्त ब्रीफिंग नहीं हुई। अफगान पक्ष ने अकेले ही मीडिया से बात की, लेकिन यह बातचीत पुरुष-प्रधान सभ्यता का नंगा नाच बन गई। सुरक्षा कर्मियों ने महिला पत्रकारों को प्रवेश से रोक दिया, भले ही वे ड्रेस कोड का पालन कर रही थीं। इंडिया टुडे की पत्रकार गीता मोहन ने सोशल मीडिया पर लिखा, “महिला पत्रकारों को आमिर खान मुत्ताकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आमंत्रित ही नहीं किया गया।” एनडीटीवी ने भी इस मुद्दे को उठाया, लेकिन दूतावास के गेट पर महिलाओं की आवाज दबा दी गई।
यह घटना संयोग नहीं, बल्कि तालिबानी संस्कृति का प्रत्यक्ष आयात थी। अफगानिस्तान में तालिबान शासन के तहत महिलाओं को शिक्षा, नौकरी और सार्वजनिक जीवन से वंचित रखा गया है। संयुक्त राष्ट्र इसे “दुनिया का सबसे गंभीर महिला अधिकार संकट” मानता है। मुत्ताकी, जो खुद तालिबान के कट्टरपंथी नेता रहे हैं, की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं की अनुपस्थिति ने भारत को शर्मसार किया।अफगान पक्ष ने बाद में सफाई दी कि यह “अनजाने में” हुआ,और काबुल में मुत्ताकी महिला पत्रकारों से मिलते हैं। लेकिन दिल्ली की जमीन पर यह तालिबानी पुरुषवादी मानसिकता का खुला प्रदर्शन था, जहां महिलाओं को “दोयम दर्जे” का नागरिक माना जाता है।

देवबंद को नागपुर के बाद “महिला अपमान का दूसरा केंद्र”बनाने का आरोप 

यात्रा का अगला पड़ाव देवबंद था, जहां मुत्ताकी दारुल उलूम देवबंद पहुंचे। इस इस्लामी शिक्षा केंद्र में भारी भीड़ उमड़ी, चाहने वाले नजर आए, लेकिन एक भी मुस्लिम महिला नहीं दिखी। प्रेस कॉन्फ्रेंस या सार्वजनिक सभा में महिलाओं को पर्दे के पीछे बिठाया गया या ही प्रवेश वर्जित रहा। दारुल उलूम ने इन आरोपों को “बेबुनियाद” बताया और कहा कि कार्यक्रम भीड़भाड़ के कारण रद्द कर दिया गया,लेकिन विवाद थमा नहीं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख अरशद मदनी ने इसे “संयोग” करार दिया, कहते हुए कि “महिलाओं के सम्मान में कोई रोक नहीं थी।”देवबंद को नागपुर के बाद “महिला अपमान का दूसरा केंद्र”बनाने का आरोप जहां परंपरागत रूढ़िवादिता आधुनिक भारत की प्रगति से टकरा रही है। आरएसएस के मुख्यालय में भी महिलाओं को प्रमुख स्थान पर अभी तक नहीं बैठाया गया है।

मीडिया की चुप्पी: गोदी मीडिया का सांप सूंघना
महिला प्रधान दिखने वाला भारतीय मीडिया, जो अक्सर विपक्ष पर चिल्लाता रहता है, इस बार खामोश हो गया। इलेक्टोरल बॉन्ड्स या वोट चोरी कर राहुल गांधी के आरोपों पर तो कोहराम मच जाता है, लेकिन यहां महिला पत्रकारों की आवाज दबने पर एक भी चैनल ने बम नहीं फोड़ा। क्या तालिबानी दबदबे का डर है? या विदेश नीति के नाम पर समझौता?
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और इंडियन वूमेन प्रेस कोर ने इसे “भेदभावपूर्ण” बताया और कहा कि यह वियना कन्वेंशन के तहत कूटनीतिक छूट से परे है। यह चुप्पी भारतीय पत्रकारिता की गुलामी का प्रमाण-पत्र है, जहां सत्ता-समर्थक मीडिया महिला अधिकारों पर आंखें मूंद लेता है।

हालांकि विदेश मंत्रालय ने सफाई दी कि प्रेस इंटरैक्शन में उसकी कोई भूमिका नहीं थी, लेकिन सवाल बाकी है: क्या भारत ने तालिबान को “मुंह चिढ़ाने” के लिए पाकिस्तान के जवाब में यह छूट दी? अमेरिका ने पाकिस्तान को “आतंकवादी स्टेट” के रूप में पाला, तो भारत ने तालिबान को विदेश नीति का हथियार बनाया? मुत्ताकी ने कहा कि अफगानिस्तान भारत को “नजदीकी मित्र” मानता है, लेकिन।

महिला अधिकारों पर यह दोहरा मापदंड स्वीकार्य नहीं। विपक्ष का कड़ा विरोध: राहुल गांधी की चेतावनी
विपक्ष ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल किया: “जब आप महिला पत्रकारों को एक सार्वजनिक मंच से बाहर किए जाने की अनुमति देते हैं, तो आप भारत की हर महिला को बता रहे हैं कि आप इतने कमजोर हैं कि उनके लिए खड़े नहीं हो सकते।” प्रियंका गांधी वाड्रा ने ट्वीट किया, “प्रधानमंत्री जी, तालिबान प्रतिनिधि की प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिला पत्रकारों को हटाने पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें।” पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि पुरुष पत्रकारों को एकजुट होकर बहिष्कार करना चाहिए था। टीएमसी और अन्य दलों ने इसे “भारतीय महिलाओं का अपमान” करार दिया।

अब किसेशर्म आनी चाहिए…?आतंकवादियों के शासन तालिबानी सरकार की विदेश मंत्री के भारत आगमन पर फिर देवबंद में और बाद में आगरा में उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा स्वागत किया जाने पर संभल के सांसद जियाउर रहमान ने सरकार पर दोहरी मापदंड के आरोप लगाए हैं उन्होंने कहा है जब मैं तालिबान के बारे में बयान देता हूं तो मेरे खिलाफ एफआईआर दर्ज होती है अब योगी सरकार उसे पूरी सुरक्षा महिया कर रही है यह दोहरा मापदंड क्यों है तब योगी ने कहा था मुझे शर्म आनी चाहिए अब किसेशर्म आनी चाहिए…?

 लोकतंत्र की परीक्षा यह घटना सांसद कंगना के अंगना में विकसित 2014 के बाद के “नए भारत” की पहली अंतरराष्ट्रीय चर्चित प्रेस कॉन्फ्रेंस का काला धब्बा है। जहां एक तरफ इलेक्टोरल बॉन्ड्स पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की चर्चा होती है, वहीं महिला अपमान पर सन्नाटा। भारत को अपनी विदेश नीति में मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देनी होगी। तालिबान को “आतंकवादी से राष्ट्रवादी” बनाने का खेल चल सकता है, लेकिन महिला अधिकारों पर समझौता नहीं। अगर पुरुष पत्रकार एकजुट होकर खड़े न हुए, तो यह न केवल तालिबानी मानसिकता की जीत होगी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की हार भी। समय है कि हम सब, चाहे विपक्ष हो या सत्ता, महिलाओं की आवाज को प्राथमिकता दें—वरना जयशंकर प्रसाद की विदेश नीति का यह काला धब्बा “अपना-अपना आतंकवादी” हर कोने में मुंह चिढ़ाता रहेगा। हालांकि अब तालिबानी सरकार के विदेश मंत्री मुत्ताकी की फिर से प्रेस से मिलने का अवसर हुआ जिसमें महिला पत्रकारों का सामना हुआ जिसमें भारत और अफगानिस्तान की सरकार की रफूगिरी दिखाई दी किंतु जो इतिहास बन गया है वह प्रमाण है उसे ठीक करना थोड़ा मुश्किल काम है इसलिए कह सकते हैं की महिलाओं का अपमान भारत में तालिबानी संस्कृति में यदि सफल हो गया है तो भारत सरकार भी उसमें उतनी ही दोषी है कि उसने यह करने दिया।


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