
“जंगल का लोकतंत्र-युद्ध: शेरनी, लकड़बग्घे और पूंजीवादी हाथी”।पंचतंत्र का नया कथा-रूप
वन में एक बूढ़ी शेरनी (ममता बनर्जी) और उसकी युवा सहयोगी शेरनिया (सायोनी घोष जैसी नई पीढ़ी) का साम्राज्य था। कोलकाता (पुरानी राजधानी) उसका मुख्य मांद था। चारों ओर से घेराबंदी हो रही थी — पूंजीवादी अमेरिका (घमंडी आर्थिक ताकत और सेना के रूप में CRPF/CAPF) की विशाल फौज, इजराइल (इलेक्ट्रॉनिक हमला — EVM, Pegasus आदि) और अन्य जानवर (लकड़बग्घे, सूअर, भैंस, मिट्ठू कौवे ढेर सारे पशु मित्र) मिलकर हमला कर रहे थे।आंकड़े बताते हैं कि 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव दो चरणों में हुए: 23 अप्रैल (152 सीटें) और 29 अप्रैल (142 सीटें)। कुल 294 सीटों के लिए मतदान हुआ। मतदाता संख्या लगभग 7.5 करोड़ थी। वोटिंग प्रतिशत ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचा — कुल टर्नआउट 92.93% तक, जो 2011 के रिकॉर्ड को तोड़ता है।
सुरक्षा व्यवस्था: चुनाव के दौरान केंद्र सरकार ने अभूतपूर्व स्तर पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF/CRPF आदि) तैनात किए। अनुमान के अनुसार 2 लाख से अधिक (कुछ रिपोर्ट्स में 2.4 लाख) जवान। मतदान के बाद भी गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि 700 कंपनियां (लगभग 70,000 जवान) चुनाव के बाद भी 60 दिनों तक या आगे तक राज्य में रहेंगी। कुछ रिपोर्ट्स में तो 2400 कंपनियों तक का जिक्र है यह तैनाती “लोकतंत्र की रक्षा” के नाम पर थी, लेकिन विपक्ष इसे “घेराबंदी” और “मिलिटराइजेशन” कह रहा था।
अर्थव्यवस्था का संकट: रुपया और पूंजीवाद“जब शेरनी के जंगल पर हमला हो रहा हो, तब पूंजीवादी हाथी ने रुपए को इतना कमजोर कर दिया कि एक डॉलर 95 रुपये के करीब पहुंच गया। वर्तमान में अप्रैल 2026 में उच्चतम 95.28 तक पहुंचा।ऐसे में कंकाल में पड़ा हुआ 5 कृपया की कोई औकात नहीं रही, इसलिए 100 रुपया प्रति डॉलर स्वीकार कर लो। क्योंकि जब अमेरिकी अदालत में जैफ्री एपिस्टीन की फाइलें खुल रही हों (2026 में DOJ ने लाखों पन्ने, वीडियो और इमेज रिलीज किए), तब नैतिकता का बोझ कौन उठाए? यौन अपराधी की आधी फाइल खुली, फिर भी ‘एपिस्टीन फाइल के हीरो’ (नीरो) चुनावी बांसुरी बजा रहे हैं।”
चुनावी जंगल का दृश्य
4 मई 2026 को मतगणना है। एग्जिट पोल्स में BJP को 192 सीटों तक का अनुमान (Today’s Chanakya), TMC को 100 के आसपास। कुछ अन्य पोल BJP को 151 और TMC को 137 दिखा रहे हैं। TMC चीफ ममता बनर्जी ने एग्जिट पोल खारिज कर दिए और 226+ सीटों का दावा किया।“लकड़बग्घे सियार आदि मिलाकर मिलकर शेरनी का शिकार करने निकले। एक लकड़बग्घा तो नई बाबरी मस्जिद बनाने का पाखंड करता है, लेकिन लोकतंत्र के युद्ध में पूंजीवादियों से ‘करोड़ों’ की शर्त रखता है और दूसरा इसके साथ अलग होकर कहता है — ‘हम अलग थे’। कांग्रेस और कम्युनिस्ट भी अपना शिकार करने निकले।”
उड़ीसा की घटना: इसी बीच, केनझार जिले में एक आदिवासी व्यक्ति जीतु मुंडा ने अपनी मृत बहन की कंकाल को कब्र से निकालकर 3 किमी दूर बैंक ले गए, ताकि अपनी बहन का करीब 20,000 रुपया निकाल सकें। बैंक ने डेथ सर्टिफिकेट मांगा था। यह “अंतिम पंक्ति के अंतिम आदमी” की कहानी है, जिसे महात्मा गांधी याद करते थे और लोकतंत्र के लिए संदेश था अंतिम पंक्ति के अंतिम आदमी को लाभ यह वही अंतिम आदमी था जिसके लिए गांधी चिंतित थे। 75 साल बाद भी सिस्टम उसे पहचान नहीं पाया।
बहरहालजंगल में शेरनी अगर बच गई, तो यह संदेश जाएगा कि भारत में “सब कुछ जीतना बड़ा मुश्किल है”। पूंजीवादी-कॉर्पोरेट-राजनीतिक इंडस्ट्री के लिए खतरा। घेराबंदी (सेना + इलेक्ट्रॉनिक) के बावजूद अगर लोकतंत्र की शेरनी (TMC) जीत जाती है, तो समझौते की नई शर्तें बनेंगी — जैसे हार्मुज पर कब्जे की कल्पना।
अगर शेरनी हार गई, तो नया भारत बनेगा जहां एक लकड़बग्घा मछली खाकर अपने सिस्टम से प्रचारित करेगा कि मतदाता ने वोट दिया। “गुड गवर्नेंस” का सड़ा सिस्टम पूंजीवादियों के लिए काम करेगा। महिला आरक्षण vs परिसीमन का हल्ला, “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा घोषित रूप से “पत्रकारिता-मुक्त भारत” स्थापित करेगा क्योंकि वहां पत्रकारिता अभी जिंदा है।
“युद्ध में सब जायज है। इसलिए ईरान के करीब ढाई सौ बच्चों और इसके पहले गज में हजारों बच्चों का कत्ल जायज है; और पश्चिम बंगाल में अगर 27 लाख वोटर्स का ‘स्कूल के बच्चों की तरह’ कत्ल (वोटर लिस्ट से नाम कटना या अन्य) जायज। लेकिन अगर यह प्रयोग असफल रहा, तो जंगल में राज कैसे चलेगा?”
रुपए का पतन और मध्य पूर्व युद्ध (ईरान-इजराइल-अमेरिका तनाव) के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई — तेल की कीमतें बढ़ीं, इंपोर्ट बिल बढ़ा, रुपया दबाव में। तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा, लेकिन अंतिम आदमी कंकाल ढो रहा है।
“हे राजा! जंगल का राज नैतिकता से नहीं, बल से और चालाकी से चलता है। लेकिन जब शेरनी और युवा शेरनिया संगठित हो जाती हैं, तो लकड़बग्घे चुप हो जाते हैं। पूंजीवाद का हाथी कितना भी बड़ा हो, अगर जंगल की मिट्टी मजबूत हो तो वह कब्जा नहीं कर पाता।”ऑपरेशन सिंदूर जारी” चल सकता है बावजूद उनके पीड़ितों को क्या राहत मिली नहीं पता चला, लेकिन लोकतंत्र का युद्ध वोट से लड़ा जाता है — नैतिकताओं को ताक पर रखकर। 4 मई को जो परिणाम आए, वह तय करेगा कि नया पंचतंत्र कौन लिखेगा — शेरनी का, या लकड़बग्घों का।”बहरहाल “पत्रकारिता मुक्त भारत” कि आप सबको बधाई

