भारतीय लोकतंत्र में आभासी राजनीति का जाल  (त्रिलोकीनाथ)

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भारतीय लोकतंत्र में आभासी राजनीति का जाल 

   भारतीय राजनीति लंबे समय से प्रतीकों, नारों और भावनात्मक मुद्दों पर टिकी रही है। लेकिन पिछले दो दशकों में सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के विस्तार के साथ यह प्रवृत्ति और तेज हो गई है। अब राजनीतिक दल आभासी दुनिया में कथाएँ गढ़कर, अर्ध-सत्य या चुनिंदा तथ्यों को वास्तविकता के रूप में पेश करके जन-मत प्रभावित करने की कोशिश करते दिखते हैं। इस प्रक्रिया को कई लोग “आभासी राजनीति” या “नैरेटिव वॉर” कहते हैं। इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों शामिल हैं, हालांकि तरीका और प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं।
                                                                                                    त्रिलोकीनाथ
आभासी कथाओं का उदय
आरएसएस और भाजपा पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वे संगठित प्रचार तंत्र के जरिए मुद्दों को भावनात्मक बनाकर पेश करती रही हैं। सुमित्रा महाजन जैसे नेताओं के पुराने आलेखों में आरएसएस को अनुशासित, अर्ध-सैन्य प्रकृति वाला संगठन बताया गया है, हालांकि संगठन खुद इसे सांस्कृतिक-सामाजिक कार्य बताता है और सैन्य बल होने से इनकार करता है। सोशल मीडिया के युग में यह प्रचार और तेज हो गया। “पप्पू”, “जय श्री राम” जैसे नारे या राम मंदिर से जुड़े मिथक-कथाएँ भावनात्मक प्रभाव छोड़ते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “परजीवी”, “आंदोलनजीवी” और हाल में लाल किले से “दिमागी नक्सल” जैसे शब्दों का इस्तेमाल इसी श्रेणी में आता है। ये शब्द विरोधी विचारों को एक खास फ्रेम में बाँधते हैं।वंदे मातरम् के पूर्ण गान को कानूनी मान्यता देने या एक राष्ट्र-एक चुनाव जैसे मुद्दों को भी कई आलोचक आभासी या प्रतीकात्मक बताते हैं। ये शिक्षा, बेरोजगारी, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे जमीनी मुद्दों से सीधे नहीं जुड़ते। वहीं समर्थक इन्हें सांस्कृतिक एकता और प्रशासनिक सुधार का हिस्सा मानते हैं।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया और सीमाएँ
कांग्रेस पक्ष अब इन्हीं तरीकों को अपनाने की कोशिश कर रहा है। मनुस्मृति को स्त्री स्वाभिमान और संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर या हल्द्वानी जैसे मामलों में “शुद्धिकरण” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके वह आभासी कथा का जवाब आभासी कथा से देने लगा है। लेख में कहा गया है कि कांग्रेस का डीएनए महात्मा गांधी के सत्य पर आधारित है, इसलिए वह अर्ध-सत्य को उसी तीव्रता से नहीं फैला पाती। यह एक आदर्शवादी दावा है। व्यावहारिक राजनीति में हर दल नैरेटिव बनाता है। कांग्रेस ने भी अतीत में कई भावनात्मक मुद्दों का सहारा लिया है। अंतर यह हो सकता है कि संसाधन, संगठन और डिजिटल पहुंच में असमानता है।
कुछ विवादित उदाहरण
ऑपरेशन सिंदूर को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय बयान का मुद्दा हालिया विवाद में है। उन्होंने कहा था कि ऑपरेशन में किसी सैनिक को नुकसान नहीं पहुंचा। बाद में छह सैन्य कर्मियों के नाम राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर दर्ज किए गए। सरकार का कहना है कि बयान पायलटों की मौत संबंधी झूठे प्रचार के संदर्भ में था और संदर्भ से काटकर पेश किया जा रहा है। विपक्ष इसे संसद में गुमराह करने का आरोप लगाता है। दोनों पक्ष अपने-अपने नैरेटिव पर अड़े हैं। पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर का पुराना विवाद भी इसी श्रेणी में आता है—आरोप लगे, जांच हुई, लेकिन पूर्ण स्पष्टता नहीं बनी।ये उदाहरण दिखाते हैं कि आभासी दुनिया में तथ्य कितनी आसानी से चुनिंदा अंशों में बदल जाते हैं। एआई और सोशल मीडिया एल्गोरिद्म इस प्रक्रिया को और तेज करते हैं। कंट्रोल विदेश में हो या घरेलू, प्रभाव एक जैसा होता है—लोग मूल मुद्दों से भटक जाते हैं।
जमीनी हकीकत बनाम भावना
युवा बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाएं, पर्यावरण और नागरिक सुरक्षा जैसे मुद्दे जंतर मंतर पर या सड़कों पर दिखते हैं। लेकिन भावनात्मक शब्दों का असर ज्यादा टिकाऊ लगता है क्योंकि वे पहचान और गर्व से जुड़ते हैं। एक राष्ट्र-एक चुनाव जैसे प्रस्तावों में भी प्रशासनिक दक्षता का दावा है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह लोकतंत्र के संघीय चरित्र को कमजोर कर सकता है। दोनों पक्षों को इन जमीनी मुद्दों पर ठोस नीति और क्रियान्वयन पर ध्यान देना चाहिए।
भारतीय राजनीति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया का इस्तेमाल अब अपरिहार्य हो गया है। जो दल भ्रम या भावना को बेहतर फैलाएगा, वह अल्पकालिक सफलता पा सकता है। लेकिन लंबे समय में लोकतंत्र की मजबूती तथ्यों, जवाबदेही और जमीनी मुद्दों पर निर्भर करती है। कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों को आभासी मायाजाल से निकलकर शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे वास्तविक मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। अन्यथा जनता भावनाओं के चक्रव्यूह में फंसी रहेगी और असली समस्याएं अनसुलझी रह जाएंगी।सच यह है कि राजनीति में नैरेटिव हमेशा रहा है। डिजिटल युग ने सिर्फ उसकी गति और पहुंच बढ़ा दी है। चुनौती यह है कि हम इसे नियंत्रण में रखें, न कि इसके नियंत्रण में आ जाएं।

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