
आम-आदमी पर सवार इल्लियाँ
मध्य प्रदेश का शहडोल जिले से लगा सीधी जिला नाम का सीधा है लेकिन वास्तव में बहुत टेढ़ा है वहां के गलियारों में ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी घटनाएं आती हैं जो राष्ट्रीय परिपेक्ष नहीं अंतरराष्ट्रीय परिपेक्ष में भी जगह पाई जाती है मेंनस्ट्रीम की मीडिया का रॉ मैटेरियल यहां बहुत मि
ल जाता है सबको याद होगा की राष्ट्रीय पत्रकारिता के अलावा अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता में भी एक शराबी के द्वारा शराब पीकर किसी व्यक्ति पर पेशाब करने की घटना आम यहां की बड़ी चर्चित रही है उससे ज्यादा चर्चित रही की तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उसे पीड़ित व्यक्ति को अपने राजमहल में बुलाकर उसका पैर पैर धोते हैं और इसके बाद भी यहां की सिस्टम को सुधारने के लिए ना तो शिवराज सिंह ना उसकी भाजपा ना कोई प्रशासन कभी कोई परवाह करता है इसीलिए ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं आश्चर्य तो यह लगता है कि अर्जुन सिंह जैसा विराट व्यक्तित्व का व्यक्ति इस सीधी से कैसे निकल कर राष्ट्रीय मुख्य धारा में अपनी जगह बना लिए थे बहरहाल नई घटना एक पटवारी के द्वारा किस के ऊपर चढ़कर जाने की है
(त्रिलोकी नाथ)
बचपन में शरद जोशी की ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ पढ़कर हँसी भी आती थी और गुस्सा भी। जीप में बैठे अफसर, किसान के खेत पर झपटने वाली इल्लियों की तरह। किसान डरता था, मुफ्त में चना उखाड़कर साहब की जीप में रख देता था। तब लगा था—यह पुरानी कहानी है, आज़ादी के बाद की बीती बात।
अब 21वीं सदी है। मोबाइल, वीडियो, सोशल मीडिया, डिजिटल इंडिया। और सीधी जिले के माटा गाँव से एक वीडियो वायरल होता है। पटवारी नीलेश नामदेव, सर्वे के लिए पहुँचे। रास्ते में छोटा नाला, थोड़ा पानी। जूते भीग जाएँगे। समाधान? 65 साल के बुजुर्ग लालवा केवट की पीठ पर सवार हो जाना। बुजुर्ग घोड़ा बन गया, पटवारी सवार। जूते सुरक्षित, इज्जत डूबी। 
यह कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं। यह वही पुरानी इल्ली है, सिर्फ सवारी बदल गई है। कभी जीप, कभी आम आदमी की पीठ। कभी फाइल, कभी सर्वे, कभी मुआवजा। आम आदमी अब भी घोड़ा है, और सिस्टम की इल्लियाँ उसी पर सवार। पहले एक शराबी किसी पर पेशाब कर देता था—शर्म की बात। अब व्यवस्था खुद आम आदमी पर पेशाब कर रही है, और हम वीडियो बनाकर वायरल कर रहे हैं। जैसे कोई तमाशा देख रहे हों। पटवारी सस्पेंड हो गया। अच्छी बात। लेकिन सस्पेंशन से इल्ली मरती नहीं। इल्ली सिस्टम में रेंगती है। जूते बचाने की आदत, अहंकार, ‘मैं साहब हूँ’ वाला भाव—यह आसानी से नहीं जाता।
शरद जोशी की इल्लियाँ खेत चट कर जाती थीं। आज की इल्लियाँ आत्मा चट कर रही हैं। किसान की पीठ पर बैठकर नदी पार करना सिर्फ शारीरिक अपमान नहीं, मानसिक गुलामी की घोषणा है। 75 साल बाद भी आम आदमी को यह सिखाया जा रहा है कि अधिकारी का जूता ज्यादा कीमती है उसके सम्मान से।
हम स्मार्ट शहर बना रहे हैं, लेकिन स्मार्ट इंसानियत कहाँ है? डिजिटल सर्वे हो सकता है, लेकिन दिल डिजिटल नहीं हुआ। नाला दो मीटर का था। जूता उतारकर भी पार किया जा सकता था। लेकिन अहंकार ने कहा—पीठ पर बैठो। और बुजुर्ग ने कहा—हाँ साहब। यही सबसे बड़ा दुख है। डर इतना गहरा है कि अपनी पीठ भी दे देते हैं।
इल्लियाँ अब सिर्फ खेत में नहीं, हर दफ्तर में, हर फाइल में, हर सर्वे में रेंग रही हैं। आम आदमी की कमर पर सवार होकर वे नदी पार कर रही हैं, सड़क पार कर रही हैं, जीवन पार कर रही हैं। और हम देख रहे हैं। कभी गुस्सा करते हैं, कभी हँसते हैं, कभी भूल जाते हैं।शीर्षक बदल गया है। अब ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ नहीं। ‘आम-आदमी पर सवार इल्लियाँ’। और यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई। जब तक इल्लियाँ पीठ पर सवार होती रहेंगी, नाला कितना भी छोटा क्यों न हो—आम आदमी डूबता रहेगा। जूते बच गए। इंसानियत भीग गई।

