यह कहां आ गए हम ..?-1 ( त्रिलोकीनाथ )

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“.. तुम होती तो,.. ऐसा होता…  तुम होती, तो वैसा होता…

मैं और मेरी तन्हाई अक्सर यह बातें करते हैं…..

ये कहां आ गए हम…, यूं ही साथ साथ चलते..

ये कहां आ गए हम ..? आज जब लेख लिख रहा था तो अंदर से आवाज आई, 

14 अगस्त 1981 को अमिताभ बच्चन और रेखा पर फिल्माई गई फिल्म सिलसिला के गाने के बोल, की कि,.. यह कहां आ गए हम ..? क्या हमने इन्हीं दिनों के लिए देश की स्वतंत्रता के साथ रोमांस किया था…. हमारे वीर शहीदों ने इसी प्रकार के भारत के निर्माण के लिए लाखों लोगों ने बलिदान दिया था…?  यह प्रश्न मेरे मन-मस्तिष्क को बार-बार  फिल्टर करता है. भारत के संविधान में अनुसूचित विशेष आदिवासी क्षेत्र शहडोल क्षेत्र के लिए…

                                                                          ( त्रिलोकीनाथ )

तो शुरुआत करते हैं अनुसूचित जाति के जिला पंचायत सदस्य जो तब शहडोल जिला पंचायत की तहसीलअनूपपुर के जिला पंचायत सदस्य चुनकर शहडोल आई थी और तब कॉलरी क्षेत्र के एक यूनियन लीडर श्रीकांत शुक्ला के साथ वहां के महाप्रबंधक थापर का विवाद हो गया था… जिसका निष्कर्ष पार्वती चौधरी जिला पंचायत शहडोल में  अनशन धरना प्रदर्शन के जरिए न्याय की मांग की थी.. इसी विवाद के सिलसिले में जब मैं जमुना कालरी में एक अधिकारी से मिला तो उन्होंने  गई-गुजरी स्थिति में पत्रकारिता की थी उसके लिए अपने अनुभव से कहा भारत में दो ही माफिया दो ही माफिया चला रहे  एक “आईएएस माफिया” और दूसरा “प्रेस माफिया”( यानी कार्यपालिका जिसमें आईएएस आईपीएस आदि लोग होते हैं और दूसरे पत्रकारिता जो अभी भी एक अज्ञात विलुप्त होती प्रजाति का हिस्सा है) मैंने उन्हें खंगालने का प्रयास किया कि यह कैसे बोल रहे हैं…. उन्होंने उसे समझाया भी… तब समझ में आया  प्रेस, पत्रकारिता की ताकत को महसूस किया जाता है… इसके बावजूद कि हम उस प्रेस के हिस्सा हैं जो वर्तमान में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नौटंकी करने वाले फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार पत्रकार बनाकर प्रधानमंत्री से यह पूछने विवस करता है की “प्रधानमंत्री आम जूस कर खाते हैं या काटकर …?,” और पत्रकारिता भारत के प्रधानमंत्री के लिए यही रह गई है….

इसके बावजूद भी जब भारत की राष्ट्रपति शहडोल लालपुर हो अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के लिए बनाए गए आदिवासी विशेष क्षेत्र नियमों अधिनियम एक्ट को लागू करने के लिए चुनती हैं तब महसूस होता है कि उसकी उपयोगिता भारत की स्वतंत्रता अभी भी काफी हद तक जीवित है चाहे उसका उपयोग इसी स्तर पर क्यों ना हो…. जिस स्तर पर महामहिम राष्ट्रपति शहडोल के लालपुर में आकर के लिए अपनी बात बोलती हैं ….पेसा एक्ट को लागू करने के लिए अपनी भावनाएं प्रकट करती हैं|

यानी शहडोल पूरे भारत में वह क्षेत्र है जहां भारत का प्रथम पदाधिकारी राष्ट्रपति पेसा एक्ट लागू पेसा एक्ट कराने की सोच रखता है.. बीसवीं सदी में आईएएस और प्रेस को सफल माफिया के रूप में देखने वाला सिस्टम 21वीं सदी में कहां पहुंच गया है…? इसकी समीक्षा में कुछ प्रश्न उठते हैं तो पहले समझते हैं कि प्रेस माफिया जिसे चौथा स्तंभ कहते हैं उसकी हैसियत राष्ट्रपति द्वारा चयनित लोकतांत्रिक संभावना वाले क्षेत्र में क्या है…? शहडोल क्षेत्र में क्या है वह जिंदा भी है अथवा नहीं….?

कल खेलकूद के दृष्टिकोण से शहडोल अनुसूचित विशेष आदिवासी क्षेत्र के लिए गर्व करने का बहुत बड़ा दिन था और उसे कार्यपालिका ने सेलिब्रेट भी किया…, यह नहीं कह सकते कि नहीं किया… किंतु इस रंग में भंग कहां आ गया… समझने का प्रयास करते हैं|

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस शहडोल के कार्यपालिका के सभी शीर्ष प्रमुख  याने कमिश्नर, एडीजीपी, कलेक्टर, एसपी ने संयुक्त रूप से बुलाई स्थान;कलेक्टर सभाकक्ष जब तक पत्रकार वहां पहुंचते…, तब तक दूसरी खबर आई की प्रेस कांफ्रेंस का स्थल बदल कर पुरानी पुलिस कंट्रोल रूम में कर दिया गया है| क्योंकि वहां कोई छुट्टी के दिन भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को ऑपरेट करने का कोई मीटिंग चल रही थी….

तू क्या वह इतनी हड़बड़ी में जल्दबाजी में थी कि बिना कार्यक्रम के ही वहां पर मीटिंग प्रारंभ हो गई अथवा शहडोल की उच्चतम प्रेस कांफ्रेंस  के लिए जहां समय सुनिश्चित किया गया हो उसे बदल दिया गया हो… बहरहाल प्रेस ने असमय ही इसमें भी सहयोग किया बावजूद इसके निर्धारित समय से करीब 1 घंटा लेट अधिकारी वहां पहुंचे और तब जानकारी हुई कि हमारे पुलिस विभाग के कई जवानों ने देश में हमारी पहचान स्थापित कर पहला, दूसरा व तीसरा स्थान अलग-अलग प्राप्त किया है| उसी को प्रेस के साथ शेयर करके सेलिब्रेट किया जाना था.. किंतु तब तक प्रेस के लोग अपने स्वाभिमान के कारण आहत हो गए थे और इस सिस्टम से अपने को बड़ी विनम्रता से थोड़ा सा अलग करने का प्रयास किया कि स्वाभिमान जिंदा रहे… और उसमें कुछ हद तक सफलता मिली|

तो हमारे गर्व करने का सबसे बड़ा असर अवसर खेलकूद में हमने लगभग खो दिया जो पुलिस के जवान खेलकूद में पुरस्कृत हुए वह नकली तालियों में तुष्टीकरण के हिस्सा बन कर रह गए थे …. क्योंकि उन्हें हम भी सेलिब्रेट नहीं कर पाए.. क्योंकि सेलिब्रेशन का जिस सुनिश्चित स्थान था उसे राजनीति ने अतिक्रमण कर उस पर पानी फेर दिया था|                                                                                              (..  जारी भाग 2)

 


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