अगर अतीकअहमद ओबीसी होगा, तो शहीद का दर्जा मिलेगा क्या…? बस एक रोमांच है…

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Atique Ahmad: लखनऊ पेशी पर आया माफिया अतीक अहमद, बोला सीएम योगी आदित्यनाथ बहादुर और ईमानदार मुख्यमंत्री - Mafia Atique In Court for Raj Pal Murder Case Mafia says CM Yogi Adityanath        जिस महान गैंगस्टर  डॉन अतीक अहमद को लेकर भारत का पूरा मीडिया जिसे गोदी मीडिया कहा जाता है वह 30 घंटे की नॉनस्टॉप रोमांचक मौत की, दुर्घटना, कार पलटने या गोलीबारी अथवा मौत का डर फैलाने वाला दहशत फैलाने वाले टीवी सीरियल को चला रहे हैं.. अगर खुदा न खासथा इस महान अपराधी अतीक अहमद  किसी कारण से ही बीच रास्ते में मौत हो जाती है तो क्या इसकी महानता के चलते इसे शहीद का दर्जा दिया जा सकता है…? और इसमें भी बहस क्या कुछ हफ्ते और नहीं चलाई जा सकती…? अतीक अहमद शहीद था या गैंगस्टर अपराधी था…?

क्योंकि भारत की एक राजनीतिक पार्टी कांग्रेस  के  स्टार लीडर प्रियंका गांधी द्वारा यह बात कहीं जा रही है की शहीद के बेटे को देशद्रोही बताया जा रहा है और ऐसे में शहीद शब्द कहीं आकर्षण का केंद्र ना बन जाए, इसलिए उसे महान गैंगस्टर के साथ अगर जोड़ दिया जाए कुछ ही हफ्ते के लिए ;ताकि कर्नाटक का चुनाव इस दौर में खत्म हो जाए तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए…? यही भारत की वर्तमान राजनीति है… ऐसा भी समझ सकते हैं| अन्यथा कोई कारण नहीं था की एक गैंगस्टर को हेलीकॉप्टर में उठाकर प्रयागराज के जेल में पहुंचा दिया जाए मात्र कुछ घंटे में… खर्चा उतना ही आना था जितना कि/ उससे भी कम आना था जितना कि गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की पुलिस को तमाम प्रकार से ड्यूटी में लगाकर खर्च करना है… तो फिर क्या कारण है कि इस महान गैंगस्टर को पूरे ढोल नगाड़े के साथ पूरी मीडिया को लाइव टीवी चैनल के जरिए रोजगार देकर प्रयागराज लाया जा रहा है.

क्योंकि सरकार कितनी भी बेशर्म होगी इतना लिहाज तो करेगी ही कि जब हंगामा मचा चुका है तो इस अतीकअहमद की गाड़ी एक कार को पलटा कर या कहीं बीच में काउंटर के जरिए मृत नहीं दिखाएगी… तो फिर इस  प्रोपेगेंडा का क्या मतलब….? सिर्फ एक मतलब है टीवी चैनल /समाचार सिस्टम में यदि कोई मुद्दे की कहीं कोई चर्चा चल रही है तो उसको दफन कर दिया जाए… आखिर इतनी कायरता हमारी समाचार टीवी चैनल ने क्यों स्वीकार कर ली है.. यह या तो मजबूरी है अथवा मीडिया में एकाधिकार की घोषणा भी या फिर पूरी मीडिया चैनल को लाइव टेलीकास्ट चलाने का अथवा इस पर समाचार फोकस करने का बहुत हैवी अमाउंट   पेड-न्यूज़ चलाने के लिए जिम्मेदारी मिली है.. ताकि टीवी चैनल्स आत्मनिर्भर बने रहे…? ऐसा दिखता रहे|

बहरहाल हम इस महान घटना क्रम में अछूते हो रहे थे, इसलिए थोड़ा सा  छूतहा  होकर राष्ट्रीय मुख्यधारा की सोशल मीडिया गिरी या पत्रकारिता में शामिल होने का गर्व प्राप्त करना चाहते हैं… और इसीलिए इस महान गैंगस्टर के पक्ष में इसलिए भी लिख रहे हैं कि अगर नींद खुले और यह गैंगस्टर अतीक अहमद किसी भी कारण से मृत्यु दिखाई दे तो हमें पूरी संवेदनहीनता के साथ इस पूरी घटना क्रम में खड़ा होना सीख लेना चाहिए.. आखिर वह अपराधी था उसकी हत्या कुछ इसी प्रोपेगेंडा के साथ करना चाहिए| यही हमारा राष्ट्रवाद हमें प्रेरित करता है| और हम इस पर गर्व कर सकते हैं और गर्व के अनुभव होने पर हम संवेदनहीनता की किसी भी सीमा में क्यों न चले जाएं… अगर किसी अन्य कारण से भी इसकी कोर्ट से ही सजा होती है तो भी इसे इसकी महानता के लिए तमाम प्रकार  के इसके पक्ष  दोनों ही किसी भी बड़े मुद्दे को जब हमारी नींद खुली और हमें खबर मिली की महान गैंगस्टर प्रयागराज से श-शरीर पहुंच गए हैं तो भी हमें उनकी अगले रोमांचकारी सीरियल को समझने के लिए गर्व होना चाहिए. आखिर कुछ बात तो है कि इतना महान गैंगस्टर जिंदा बच गया, तब जबकि विकास दुबे महाकाल के पास जाकर भी अपनी जान नहीं बचा पाया और अगर नहीं बच पाया यानी मृत शरीर के साथ हमें सुबह दिखता है तो हम इसे इसकी महानता के लिए रोमांच इतना होना चाहिए ताकि हम उस महान रोमांच को भूल जाएं जिसमें किसी को भी शहीद परिवार की लड़की प्रियंका गांधी  वाड्रा ने जो कहा है शहीद के पुत्र को देशद्रोही बताया जाता है .

तो कुल मिलाकर यह समझ में आता है रोमांच का धंधा लगातार किसी न किसी रूप में कोविड-19 वायरस की तरह नए नए वेरिएंट के रूप में इस देश में लगातार मीडिया में छाता रहेगा और अपने नए नए वेरिएंट में इनका इजाद करके इन्हें फेंका जाता रहेगा ताकि भारतीय नागरिक स्वस्थ्य मानसिकता से सोचने का सपना भी छोड़ दें. इसलिए लगता है कि हे भगवान चुनाव 10-20 साल के लिए इकट्ठा करा दीजिए ताकि हम रोमांच के इन वेरिएंट से शहीदों को तो बचा सके… उनकी स्मृतियां शायद बची रह जाएं…? अन्यथा कब किसे सहीद बता दिया जाए.. कब किसी महान गैंगस्टर के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाए कुछ कहा नहीं जा सकता… सोचा रात का वक्त है सवेरे तक कहां सोचेंगे हम भी इस रोमांचकारी उत्सव में शामिल होकर आराम से सो तो ले….सुबह की सुबह देखी जाएगी क्योंकि मीडिया को तो वही दिखाना है जो उनके आका कहेंगे हम भी इस दल के दलदल में शामिल होकर थोड़ा सा गुलामी का आनंद क्यों न ले…. रात की ही तो बात है और यह राज की भी बात है…

     ———————————-( त्रिलोकीनाथ.)———————————-

 


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