शहडोलआदिवासी अंचल में पुरातत्व का गायब-इतिहास, माफियाओं के लिए वरदान..

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बात 1992 93 की है तब राष्ट्रीय संग्रहालय की प्रमुख रमेश चंद्र शर्मा शहडोल आए हुए थे और पॉलिटेक्निक कॉलेज के हाल में सेमिनार कर रहे थे अपने भाषण में यह बता रहे थे कि पुरातत्व सामग्री का क्या महत्व है…. मैंने उनसे पूछा कि आपके उद्बोधन में शहडोल का जिक्र नहीं आया है शहडोल में भी काफी पुरातात्विक स्थल हैं उन्होंने साफ कहा कि शहडोल में कोई प्राप्ति पुरातत्विक परिस्थिति का ज्ञान राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली को नहीं है मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ इतिहास और पुरातत्व का एक बड़ा खजाना शहडोल में भरा पड़ा हुआ है आदिवासी अंचलों में जगह-जगह प्राचीन हजार साल पुरानी 1500 साल पुरानी पुरातत्व सामग्री उपलब्ध होने का अनुमान है उन्होंने मना किया मैंने बताने का भी प्रयास किया कि कुछ पुरातात्विक सामग्री मैंने भी खेतों से उठाकर ले आया है जो एक प्रकार का अपराध है किंतु उस पर उन्होंने आश्चर्य जताया और फिर मध्यप्रदेश के पुरातत्व विभाग को  पत्राचार किया.

 ———–( त्रिलोकीनाथ )————–

20मी सदी तक ज्ञान नहीं था.. किस आदिवासी अंचल में पुरातत्व का इतिहास अपने प्राचीन विरासत विरासत को कैसे दबाए बैठा है किंतु अभी हाल में मैं जब महाकाल उज्जैन मैं त्रिवेणी संगम गया तो वहां पर अद्भुत व्योहारी क्षेत्र की एक शिवलिंग को देखने को मिला जो 1500 साल पुरानी बताई जाती है उसकी प्रकृति भी प्रतिकृति भी वहां पर अलग से बना कर रखी गई थी इसके अलावा पूरे त्रिवेणी संगम में उज्जैन में या फिर भोपाल के बिरला संग्रहालय में मैंने जो पाया उसके हिसाब से जितना भी बड़ा इतिहास भारत का है उसका बहुतायत भाग आदिवासी अंचलों में दवा पड़ा है. शहडोल के अवशेष 20-25 परसेंट  किसी भी संग्रहालय में मिल जाते हैं इसके बावजूद इस इतिहास को खंगालने उसे सामने लाने उसकी वैभवता को बताने की बजाए शहडोल आदिवासी अंचल में प्रशासन की नजर में मध्यप्रदेश शासन की नजर में पुरातत्व विकास में कभी बाधक नहीं रहा है.

और जब भी विकास की योजनाएं बनी है जैसे शहडोल की सीवर लाइन योजना बनी तो उस योजना में पुरातत्व सामग्री के होने का जिक्र ही नहीं है, इससे यह तो साबित होता है की इतिहास को काला बाजार के विकास के रास्ते में बाधक नहीं बनने दिया जाएगा शायद यही कारण है शहडोल क्षेत्र के तमाम इतिहास को या पुरातात्विक इतिहास को कभी भी सम्मान नहीं मिला. शहडोल पुरातत्व संग्रहालय में एक चपरासी, उपसंचालक स्तर का दर्जा रखते हुए संग्रहालय को संभाल रहा है. यह घटना अपने आप में स्पष्ट करती है की अगर वाणिज्य विकास में अरबों खरबों रुपए इस प्राकृतिक संसाधन वाले भरे पूरे क्षेत्र से निकालना है तो पुरातत्व को पूरी तरह से अनदेखा किया जाएगा.

और शायद यही कारण है कि थोक के भाव में शहडोल के खनिज संसाधन को लूटने के लिए नीलामी के नाम पर कई कोल ब्लॉक, कई बॉक्साइट माइन्स ,कई आयरन और और रेत और मिट्टी के गिट्टी के खदान तो माफियाओं के लिए वरदान बने हुए हैं.

उद्योगपतियों का नकाब पहनकर इस क्षेत्र के पुरातत्व की वैभवता को कुचला ही जा रहा है इन दिनों चर्चा एनसीईआरटी में इतिहास के बदलाव को लेकर जबरदस्त हो रही है कॉरपोरेट पॉलीटिकल इंडस्ट्री को यदि लग रहा है कि इतिहास उसके विकास में बाधक बन रहा है तो वह इतिहास को स्कूल की शिक्षा से खत्म कर देने में जरा भी संकोच नहीं करती है. बल्कि नया इतिहास परोसने का प्रयास करती है ताकि जो इतिहास पढ़ाया जाएगा उसी को उदाहरण देकर बार-बार बोला जाएगा कि इतिहास इसी का नाम है. अब जैसे लोकसभा में राहुल गांधी जब सदस्य रहे और जब पदयात्रा में निकले तो उन्होंने साफ-साफ जोर-जोर से कहा कि उनकी बातों को रिकॉर्ड नहीं किया जाता .लोकसभा के इतिहास का अंग वह नहीं होगा.. और जब ज्यादा बोलने लगे तो उन्हें लोकसभा से ही निकाल दिया गया.. बावजूद इसके उनकी अनुपस्थिति में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री वहां उपस्थित रहे, तो राहुल गांधी के जिंदाबाद के नारे लगते रहे तो क्या यह भी एक इतिहास नए टाइप का बन रहा है. जिसे पढ़कर अंदाज लगाया जाएगा कि इतिहास इस प्रकार का था “ऊंचे लोग ऊंची पसंद” इनकी बातों में पड़ेंगे.

अगर हम भटकेगी तो भटक जाएंगे इसलिए शहडोल तक सीमित रहें और यह बताने का प्रयास करें की तमाम कॉर्पोरेट उद्योगपति जो इस क्षेत्र की प्राकृतिक संसाधन को निकालने के लिए अब शहडोल नगर तक आ पहुंचे हैं उनकी वजह से शहडोल कहीं स्वयं भी एक इतिहास बनकर ना रह जाए.. यह आजाद भारत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा. 

सोन नदी के दियापीपर के पास कई सभ्यताओं का जन्म हुआ ऐसा माना जाता है एक इतिहास का सोन नदी के साथ साथ चलते हुए लेखक देव शरण मिश्र ने सोन के पानी के रंग में अपनी पुस्तक में लंबा चौड़ा इतिहास लिखा था… उसे तत्कालीन सत्ता के लोगों ने हिंदी ग्रंथ अकादमी की रिकॉर्ड से ही गायब कर दिया है. अगर आज भारतीय जनता पार्टी इतिहास को गायब करती है अपने हित के लिए तो यह कोई नई बात नहीं होगी. बरहाल आदिवासी अंचल का इतिहास बहुत भव्य रहा है और इसे नष्ट करने में आम आदमी के सामने रख पाने में कम से कम रामराज्य वाली भारतीय जनता पार्टी की 20 साल की सरकार तो लगभग असफल रही है… इसके पहले की सरकार भी शहडोल के इतिहास को और उसकी गौरवशाली परंपरा को आम आदमी के सामने लाने में फेल रहा है. शहडोल का नगर का पूरे तालाब भी उसके एक इतिहास के हिस्सा रहे हैं.. जिस पर माफिया राज ने लगभग कब्जा कर लिया है.. प्रशासन और शासन लाचार और हताश भाव की तरह इस माफिया के सामने सिर्फ टाइमपास करने का काम करता दिखता है.. बेहतर होता कि आदिवासी क्षेत्र के इतिहास को संजोकर रखने में और लोगों को बताने मैं कुछ लिखा पढ़ा जाना चाहिए अन्यथा खनिज उद्योग में कोयला, बॉक्साइट, सीबीएम गैस, आयरन ओर, रेत, गिट्टी, पत्थर मिलकर शहडोल की वैभवता को लगभग नष्ट कर दिया जा रहा है.. क्या इससे बचा जा सकता है…? यह बड़ा प्रश्न है जिसका उत्तर देने वाला कोई जिम्मेदार तब का फिलहाल तो नहीं दिख रहा है…


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