क्या राजनीति की सड़ांध में उड़ रही हैं, उड़न-परी पी.टी. ऊषा..

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मशहूर शायर सागर आजमी की ग़ज़ल है

शोहरत की फ़ज़ाओं में इतना न उड़ो ‘साग़र’; परवाज़ न खो जाए इन ऊँची उड़ानों में.. “

wrestlers protest sakshi malik blaims delhi police not training no trust yogeshwar dutt wfi brijbhushan singh - Wrestlers Protest: बबीता को छोड़े योगेश्वर दत्त के रहते क्यों नहीं मिला न्याय, जंतर ...

लगता है भारत की उड़न परी पीटी उषा पर यह ग़ज़ल शत-प्रतिशत फिट बैठने वाली है. क्योंकि वह भारत माता की बेटियां के स्वाभिमान पर न्याय करती नहीं  दिखती हैं.भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष ब्रिजभूषण सिंह सांसद भारतीय जनता पार्टी के खिलाफमहिला खिलाड़ियों के साथ यौन प्रताड़ना और यौन अपराधियों आदि के संबंध में लगे आरोपों को लेकर जंतर मंतर में धरने पर बैठे महिला पहलवानों और उनके समर्थन में पुरुष पहलवानोंपर धरने की कार्यवाही को भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष उड़न परी पीटी उषा ने कहा है “यह अनुशासनहीनता है “किंतु उन्होंने यह नहीं बताया की बलात्कार और यौन प्रताड़ना जैसे गंभीर आरोपों के लिए पिछले 3 महीनों से चल रही जांच निष्कर्ष पर उनका क्या कहना है …

त्रिलोकीनाथ

दरअसल पीटी उषा एक सांसद भी है भारतीय जनता पार्टी की तरफ से और बृजभूषण सिंह भी एक सांसद हैं तो जो दोनों एक ही पार्टी के सांसद के लोग कहला गए, इसलिए अपनी सामाजिक परिस्थिति को बचाने के लिए पीटी उषा ने यह भी ख्याल नहीं रखा की किशोर और युवा महिला पहलवानों के साथ जो व्यभिचार के आरोप सांसद बृजभूषण सिंह के ऊपर लगे हैं उस पर निष्कर्ष यह जांच अभी तक पारदर्शी क्यों नहीं हुई है..pt usha, IOA: పరుగుల రాణి పీటీ ఉషకు అరుదైన గౌరవం.. 95 ఏళ్ల ఐఓఏ చరిత్రలో తొలిసారిగా.. - pt usha set to become first woman president of indian olympic association - Samayam Telugu जबकि टीवी शो News24 पर अपनी बात कहते हुए महिला पहलवानों ने खुलकर पूरी बातें भारतीय जनमानस के सामने रखी है. और आज इस पर सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला भी आ सकता है. कि क्या इस मामले में पुलिस प्रकरण दर्ज होंगे…? अथवा नहीं..?

पीटी उषा एक महिला भी हैं और जब महिला पहलवानों ने बड़े दुखी मन से इस बात को कहा कि उनके ही घर की महिला लड़कियां जब एथलीट पर भाग लेने का सोचती हैं तो उनके साथ भी बृजभूषण सिंह जैसे पदाधिकारी या अन्य लोग  व्यभिचार कर रहे होंगे… तब की परिस्थिति कितनी भयावह होगी… यह सोचकर भी उन्हें भय लगता है. इसी टीवी शो पर एक फिजियोथेरेपिस्ट ने स्पष्ट किया कि किस प्रकार से जूनियर महिला एथलीट के कैंपस से बाहर ले जाए जाने पर जब उन्होंने आपत्ति जताई तो उन्हें खेल की दुनिया से पृथक कर दिया गया, न सिर्फ उन्हें बल्कि उनकी पत्नी को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

इसके बाद क्या बाकी रह जाता है की खेल की दुनिया में किस प्रकार का व्यभिचार का संसार सत-सम्मान अनुशासन वध तरीके से चलता चला आ रहा है. और पीटी उषा जब अनुशासन की बात करते हैं तब उन्हें इस बात का ख्याल क्यों नहीं रहा की आखिर महिला पहलवानों की स्वाभिमान और जमीर को जिंदा रखने का जिम्मेदारी किसकी है…? पीटी उषा को इस बात का दुख है की महिला खिलाड़ी सड़क पर यौन प्रताड़ना के गंभीर आरोपों का प्रदर्शन कर रही हैं उन्हें इस बात का कतई दुख नहीं है कि किस प्रकार से सांसद पद पर बैठे हुए व्यभिचारी समाज के लोग भारत की बेटियों के साथ अनुशासन के नाम पर बलात्कार का संसार बनाए हुए हैं.. और यदि उसमें से कुछ लोग दुस्साहस करके बात को सामने लाते हैं तो उन्हें दबाने के लिए पूरी शासन और प्रशासन की ताकत लग जाती है. पहले तो जांच के नाम पर महिला पहलवानों का मनोबल तोड़ा जाता है किंतु स्वाभिमान के आहत होने से और भविष्य में महिला खिलाड़ियों की चिंता को ध्यान में रखकर किए जा रहे धरना प्रदर्शन को जब  किया जाता है  तो बजाय उसकी गंभीरता को मापने के महिला उड़न परी पीटी उषा  भी सत्ता की चमक में यह भूल जाते हैं वह भी एक महिला हैं… और उन्हें भारतीय महिलाओं के सम्मान को बचाने के तमाम प्रयास करने चाहिए… चाहे इसके लिए जो भी कीमत  इस्तीफा ही क्यों न देना पड़े…?

इससे पीटी उषा का सम्मान आम नागरिकों के मन में बड़ जाता. उच्च स्तर पर जिंदा जमीर के लोग अभी भी जीवित हैं… और सबसे बड़ी बात अगर महिला पहलवान झूठ बोल रही थी तो उनके खिलाफ कार्यवाही अभी तक क्यों नहीं हुई….? जबकि राहुल गांधी जब कहते हैं  सभा में “सभी मोदी चोर हैं..” मात्र कह देने से उन्हें संसद का बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. यानी मानहानि के मुकदमे में उन्हें बाहर कर दिया जाता है.

तो क्या शीर्ष स्तर पर महिलाएं जो काम कर रही हैं अनुशासन के दायरे में अपने शोषण को अपनी गरिमा समझ कर जीना सीख ले… क्या उड़न-परी पीटी उषा की यही सोच है…? इस तरह तो हर शीर्ष स्तर पर फिर किसी भी महिला का कोई भी जमीर जिंदा नहीं रह सकता… यह क्यों नहीं सोचा जाना चाहिए …?फिर चाहे वह खेल की दुनिया का मामला हो अथवा प्रदूषित राजनीति की दुनिया का मामला हो या अन्य कोई प्रशासनिक दुनिया का मामला हो…?

सबको याद है कि किस प्रकार से पंजाब के एक आईपीएस ने एक महिला आईएएस अधिकारी के साथ जब एक पार्टी में बदतमीजी की थी तो उसका खामियाजा उस आईपीएस अधिकारी को भोगना पड़ा था और जब दुनिया में भारत का नाम रोशन कर चुकी इन महिला खिलाड़ियों के द्वारा स्पष्ट तौर पर धरना प्रदर्शन के स्तर पर आकर यौन प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, तब क्या भारतीय राजनीति के भगवान बने इन बृजभूषण सिंह जैसे संतों को क्यों बक्श दिया जाना चाहिए…? यह भी पीटी उषा को बताना चाहिए था. किंतु कहते हैं सत्ता का एक ही चरित्र होता है, शोषणकारी चरित्र…? और पीटी उषा जैसी महान खिलाड़ी उस व्यवस्था के  जाल में लगता है फंस गई है… अन्यथा यदि आज सुप्रीम कोर्ट इन महिला खिलाड़ियों के पक्ष में सांसद बृजभूषण सिंह के खिलाफ यौन प्रताड़ना के आरोपों की जांच करने का आदेश देता है तो अनुशासन के नाम पर खुला बयान देने वाली पीटी उषा जैसे महिलाओं को तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए अगर उनका जमीर जिंदा है तो…?  अन्यथा भारत की राजनीति की वाशिंग मशीन में वह कितना भी क्यों ना कितनी डुबकियां क्यों ना लगा ले कितनी भी धूलती रहे उनकी छवि बेहद दागदार छवि कह लाएगी इसमें कोई शक नहीं है…


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