
कल से मध्य प्रदेश की राजनीति में पेशाब की जो नदी बह रही है उससे इतना तो तय हो गया है कि इस लोकतंत्र की पवित्र पेशाब धारा को कुछ
लोग पवित्र नदी के रूप में चरण वंदन करेंगे तो कुछ लोग इसे वैतरणी बता कर के 20 साल की भाजपा के पवित्र कार्यकाल को कोसने का काम करेंगे… फिलहाल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पेशाब कांड से अत्यंत भाव विभोर होकर द्रवित होकर अंततः दशमत कोल को अपने राजमहल में बुलाकर उसका चरण पखारा और चरणामृत अपने माथे पर
लगाया। उसका हाल-चाल भी जाना क्योंकि 20 साल में वह यह सुध नहीं ले पाए थे किंतु इस राजनीतिज्ञों के पेशाब कांड कार्यकाल में शिवपुरी के विकास शर्मा जो दलित नहीं है और दलितों की प्रताड़ना के कारण अंततः सार्वजनिक रूप से घोषित करके सत्ता से न्याय नहीं मिलने के कारण फांसी लगा लिया। बात 2020 की है अगर शिवराज सिंह चाहते तो विकास शर्मा का भी चरण पखार करके उसका हाल-चाल जान लेते और वह डिप्रेशन में जाने से बच जाता और फांसी नहीं लगाता ।किंतु शिवपुरी के मामले में जहां दलित समाज के कुछ सिरफिरे लोग राजनीतिज्ञों के द्वारा की फैलाई गई जहरीले वातावरण से प्रभावित होकर विकास शर्मा को शराब पीने पर मजबूर कर दिया था
____________________(त्रिलोकीनाथ)_______________________
उसके लिए आज भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह कोई क्षमा याचना करते नजर
नहीं आते, उन्हें दलितों में भगवान दिखता है और वह उसका पैर प
कड़ कर उसके चरणामृत से अपने सिर को लगाते हैं यह अलग बात है कि वह चरणामृत पीते हुए नहीं दिखाई दिए…?
राजनीत की यह प्रेरणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में तब पहली बार देखी गई थी जब वह गंगा किनारे कुछ सफाई कर्मियों के या दलितों के चरण को पकड़ते हुए दिखाए गए थे। शायद उसी से प्रेरित होकर शिवराज सिंह एक कदम आगे चलकर चरणामृत को सिर पर लगाए थे।
शिवपुरी के विकास शर्मा और सीधी के दसमत कोल के साथ एक जैसी प्रताड़ना हुई है विकास ने अपमान के कारण फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली, जैसी खबरें वायरल हो रही है किंतु दसमत का जैसे इस पेशाब कांड से पुण्य जाग गया हो.. मध्य प्रदेश सुबह के मुख्यमंत्री उसके चरणों के अनुरागी हो गए और सार्वजनिक तौर पर उसे भगवान का दर्जा देकर सम्मान का संदेश दिया.…. यह आधुनिक राजनीति की पैदा की हुई “आधुनिक विकासवादी लोकतांत्रिक मनुवादी” सोच हो सकती है की ब्राह्मण ने पेशाब किया तो दलित का भाग जाग गया और जब 2 साल पहले दलित ने ब्राह्मण विकास शर्मा को शराब पिलाया तो उसका भाग्य नहीं जागा…?
अन्यथा पेशाब की इस नदी में नहाने पर राजनीत सबका सम्मान कर सकती थी…लेकिन सीधी के पेशाब की इस नदी को मध्य प्रदेश की राजनीति में इतना ऊंचा दर्जा दे दिया है यह बेहद दर्दनाक किंतु अपमानजनक हालात हैं। राजनीत वैचारिक तौर पर इतनी गरीब हो चुकी है की बोट के धंधे के लिए वह किसी भी स्तर पर गिर सकती है, अन्यथा प्रश्न यह खड़ा होना चाहिए था किस शराब की इस राजनैतिक पवित्र नदी को ब्रेक कैसे लगाया जाए।
इस पर कोई बात नहीं हो रही है अब तो डर यह लग रहा है कि आने वाला विधानसभा चुनाव सभी मुद्दों को भुलाकर क्या अब पेशाब की राजनीति पवित्र नदी के मुद्दे पर लड़ेगी की पेशाब किसी को पवित्र कर सकता है। तो किसी को फांसी के फंदे पर पहुंचा सकता है…? यह बड़ा प्रश्न है और इसका जवाब अभी इतनी जल्दी आएगा भी नहीं, समय इसका जवाब दे पाएगा या नहीं यह भी नहीं कहा जा सकता…..?
किंतु जिस शिवपुरी की घटना में विकास शर्मा को आत्महत्या करनी पड़ी उसके लिए प्रायश्चित करने का सीधी की घटना बड़ा अवसर थी लेकिन शायद राजनीतिज्ञों ने अपनी धूर्तता के कारण इस अवसर को खो दिया है क्योंकि उन्हें भावनाओं का जंगल बनाकर, भय का भूत खड़ा करके अपनी अपनी राजनीतिक रोटियां जंगल के आग लगाकर पकाने का अवसर देख रही है।
सिर्फ मुख्यमंत्री शिवराज कि भारतीय जनता पार्टी नहीं बल्कि भारत के समस्त राजनीति जैसे इस पर टूट पड़ी है… लेकिन इसका समाधान सम्मानजनक समाधान ढूंढने के कोई अवसर नहीं तरह से जा रहे हैं यह बेहद खतरनाक हालात है इसका जवाब भी यह भीड़ तंत्र देगी या नहीं अभी कह पाना जल्दी है…
हम तो बात शराब की करेंगे जिसकी महानता के गुण अमिताभ बच्चन के पिता जी हरिवंश राय जी बच्चन शराब के गुणगान में पूरी मधुशाला ही लिख डाली और उसकी महानता की बखान कर डाली यहां तक की उनकी मधुशाला में मरने पर भी शराब की महानता की अंतिम चाहत की बात कही गई है। की जब मैं मरू तो मेरे मुंह में गंगाजल ना डाला जाए हाला डाला जाए,
बहरहाल कवियों की बात भी पवित्र होती है तो मधुशाला आज भी अमिताभ बच्चन की आमदनी का जरिया है लेकिन यही मधुशाला हमारी साध्वी दीदी मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के लिए कुछ खास नहीं दे पाई… उमा भारती मधुशाला याने शराब की दुकानों में पत्थर फेंक कर बोतले तोड़ती नजर आई थी लेकिन भाजपा की
पूर्व मुख्यमंत्री थी ऊपर से भगवा रंग था वह खुद साध्वी थी तो श्राप के डर से शिवराज भी कुछ नहीं कर पाए… अंततः नई शराब नीति बनाकर उसमें पीने की व्यवस्था बंद करवा दिए, अब कौन समझाए कि जब पीने की व्यवस्था होगी नहीं तो शराब लेकर कोई अपने घर तो जाएगा नहीं, पीनेवाला अगर कोई ब्राह्मण ठाकुर या सवर्ण अथवा पिछड़ा वर्ग का होगा जो समाज में शराब को सम्मान का दर्जा नहीं देता है तो उसे पीने के लिए किसी पान दुकान या किराने की दुकान के आस पास भी है ठीहा (जगह) ढूंढना पड़ेगा। और अगर वह गलत जगह शराब पी लिया धोखे से वह सत्ता पार्टी का नेता हुआ और बिगड़ैल राजनीतिक बापो की बिगड़ी औलाद हुई यानी कर्मठ कार्यकर्ता बहुत जल्दी हराम के धन से पैसा कमा लेकर बड़ा आदमी बन गया तो उसे पीने के बाद सिगरेट भी चाहिए और पेशाब करने की जगह भी…. क्योंकि शिवराज सिंह ने उमा भारती के दबाव में यह निर्णय लिया तो वह यह नहीं सोच पाए कि शराब पीने के बाद पेशाब करना सबसे ज्यादा जरूरी होता है… हो सकता है हमारे मुख्यमंत्री शराब न पीते हो, इसलिए उन्हें ज्ञान नहीं हो… किंतु शराब माफिया जिन के दबाव में उन्होंने उमा भारती के सपने शराबबंदी को लागू नहीं किया किंतु अधि कचरे नीति के कारण पीने के अड्डे बंद कर दिए.. तो जो राजनैतिक नव धनाढ्य शराबी हैं, और अगर वह ब्राह्मण हैं जिन्होंने शराब को अपवित्र वस्तु मानी थी तो उन्हें तो और भी जल्दी पेशाब उतर आती है… सत्ताधारी पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता हैं तो स्वाभाविक है शराब पीने के बाद ऐसे ब्राह्मणों को सत्ता के साथ पैसे का नशा अभी इतना चढ़ जाता है कि उन्हें आदमी दिखता ही नहीं और वह किसी भी सीमा तक नशा का आनंद लेते हैं……. शायद उसी का परिणाम था की प्रवेश शुक्ला के दिमाग में सत्ता सुंदरी और शराब तथा नव धनाढ्य होने का नशा इतना चल गया था कि उसे इंसानियत भी छोटी लगने लगी और वह एक इंसान के ऊपर जो कथित तौर पर मानसिक रूप से कमजोर रहा, हला की शिवराज सिंह ने जिस दसमत कोल को शराब की पवित्रता के कारण पैर पकड़कर पवित्र किया है उसके संवाद से नहीं लगता कि वह अर्ध विक्षिप्त है किंतु खबरें कुछ भी उड़ती रहती हैं इसलिए हम इसकी पुष्टि नहीं करते इसकी पुष्टि तो जो जांच कमेटी बीडी शर्मा भाजपा अध्यक्ष ने बनाई है शायद वह कर पाए और शायद उसकी पूरी रिपोर्ट भी आवे की वास्तव में उस वक्त क्या हुआ था। जब भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ता सत्ता के नशे में शराब को कॉकटेल करके धुये में गम को उड़ाते हुए पेशाब की पवित्र धारा का प्रवाह कर रहे थे इसके कारण विधानसभा का पूरा मुद्दा ही मध्य प्रदेश की पेशाब कांड के इर्द-गिर्द सिमट ता नजर आ रहा है…. उस पर कोई रिपोर्ट आएगी यह देखने की बात होगी…
किंतु बात कर रहे थे इंसानियत के पतन पर क्या मुख्यमंत्री ने अपना मुंह खोला… मुख्यमंत्री की इंसानियत शिवपुरी में विकास शर्मा के मामले में आखिर क्यों आत्महत्या कर ली और जन जागरण का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए यह महान आत्मा जागरण का कारण क्यों बना, अगर धोखे से किसी शराबी ने कुकृत्य करके इंसानियत को पतित किया… इस मामले को अगर इसी स्तर पर दवा दिया जाता या उमा भारती की मान ले कि शराब बंद कर दी गई होती या फिर शराब पीने के अड्डे सुनिश्चित कर दिए होते तो क्या सड़क में कहीं भी कोई शराब पीकर इस प्रकार से राजनीति के ऊपर पेशाब करता रहता…. जिसे अब राजनीतिक दल पवित्र नदी बनाकर इसमें डुबकियां लगा रहे हैं..? क्या भारतीय जनता पार्टी की और प्रदेश की राजनीति इतनी पतित हो चुकी है कि मुद्दे कम हो गए हैं.…? बेरोजगारी ,अधिकारी भ्रष्टाचार लूटपाट..
हां एक बात और सूदखोरी इस पर भी चर्चा करना चाहेंगे जो एक पवित्र कारोबार है किंतु उसे पेशाब कांड की तरह ऊंचा दर्जा नहीं मिला किंतु सीधी वाले पेशाब कांड से जो पवित्रता शपथ पत्र में लिखकर दशमत ने शपथ लिया है वह यह बताता है कि झूठे शपथ के कारण और लिखी गई कहानियों से कितना बड़ा प्रोपेगेंडा और झूठ को बढ़ावा मिल रहा है। यदि कोई दलित ने शपथ देकर भी लिखा है तो वह गलत है सीधी के शराब कांड पेशाब कांड से सीधी सच्ची बात यही निकल कर आती है।
शहडोल के नरोजाबाद क्षेत्र में केवल सिंह गौड़ एक आदिवासी है जिसका करीब 1700000 रुपए पूरी जीवन की कमाई एक सूदखोर लूट ले जाता है पुलिस और प्रशासन उमरिया जिले का यह सिद्ध करने में लग जाता है कि केवल सिंह खुद एक सूदखोर है और वह लिखकर दे गया है इसलिए उसे सही माना जाए…. मामले को खत्म किया जाए और मामला आदिवासियों के कल्याण के लिए बनी अनुसूचित जनजाति आयोग तक भी पहुंचा और वहां जाकर दम तोड़ दिया… क्योंकि पुलिस ने लिख दिया कि केवल सिंह ने लिखा है मैं कोई कार्यवाही नहीं चाहता तो अगर शपथ देकर दशमत कोल ने लिख दिया है कि वह कोई कार्यवाही नहीं चाहता तो कार्यवाही क्यों हो रही है..? क्योंकि राजनीति को इस राजनीतिक पेशाब कांड की बहुत ज्यादा जरूरत है उसे ना दलित से मतलब है ना आदिवासी से मतलब है उसे उस वोट बैंक के आड़ में मुद्दों को भ्रमित करने के लिए एक विषय की जरूरत है जो उसे चुनाव जीता सके।
इसलिए नरोजाबाद का आदिवासी केवल सिंह अपनी पूरी दौलत लुटा कर भी खुद सूदखोर बन गया क्योंकि थाना नरोजाबाद ने सूदखोर के पक्ष में पूरा काम किया और केवल सिंह से लिखा पढ़ी करवा ली यहां तो दशमत कोल ने शपथ देकर यह बात कही है फिर भी दसमत की बात को नहीं माना जा रहा है। क्योंकि वीडियो वायरल है इसी तरह केवल सिंह के मामले में कई तथ्य चीख कर भी चिल्ला रहे हैं कि केवल सिंह को सूदखोर ने लूट लिया है फिर भी उमरिया पुलिस वहां की अनुसूचित जनजाति की मंत्री और क्षेत्र की विधायक मीना सिंह जो केवल सिंह की रिश्तेदार भी हैं वह उसे न्याय नहीं दिला पाती क्योंकि केवल सिंह का मुद्दा बड़ा वोट बैंक नहीं बन सकता और तब भारत के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को अनुसूचित जनजाति से इतना प्यार भी नहीं हुआ था कि वह शहडोल के पकरिया गांव में में आकर अनुसूचित जनजाति के साथ अपना रिश्ता सार्वजनिक करते।
शायद इसीलिए केवल सिंह केवल आदिवासी बनकर रह गया और लुट गया और दशमत कोल पेशाब कांड का हीरो बनकर मुख्यमंत्री के चरण पखारने और इस चरणामृत से सिर पर लगाने के “लोकतांत्रिक मनुवाद” का दलित हितैषी मुद्दा बन गया अब कांग्रेस को इस दसमत को ढूंढना पड़ेगा ताकि वह उसके चरणों को पखार कर चरणामृत सभी कांग्रेसियों को पिलाने का काम करें ताकि यह सिद्ध हो सके की लोकतांत्रिक कलियुगे मनुवादी व्यवस्था के इन कलयुगी नायकों को आज भी मनुवाद पर कितना विश्वास है।
जिसमें जैसे द्वापर के कृष्ण अपने सुदामा ब्राह्मण का पैर पकड़ते थे… अब नायक बदल गया है सुदामा ब्राह्मण नहीं है वह दसमत कोल आदिवासी है जो जातिगत सांप्रदायिक वाद का बड़ा चेहरा बन सकता है फिलहाल इतना ही क्योंकि मध्य प्रदेश की राजनीति में पेशाब की जो पवित्र धारा बह रही है उसमें पतित राजनीति को डुबकी लगाते हुए हम लगातार देखेंगे और यह भी देखेंगे कि अगर आधुनिक असुर बन चुकी राजनीतिक नव धनाढ्य जातिवादी सांप्रदायिक मानसिकता के कारण यदि ब्राह्मण को पेशाब पिलाया जाता है तो वह फांसी लगा लेता है, लेकिन अगर दलित पर पेशाब किया जाता है तो वह चरण पखारे तक सम्मान पाने का हकदार हो जाता है। यह कैसा “लोकतांत्रिक-मनुवाद” है इस पर भी चर्चा करते रहेंगे क्योंकि दोनों राजनीतिक पार्टियां पेशाब कांड की पवित्र नदी में बह कर डुबकी लगाकर पवित्र होने की प्रतियोगिता से इतनी जल्दी बाज आने वाली नहीं है…?





