“मणिपुर हिंसा” के लिए उच्चतम न्यायालय ने तीन सदस्य दल का किया गठन ।
ठीक किया, उच्चतम न्यायालय ने जो मणिपुर हिंसा और उस पर निगरानी के लिए तीन महिला सदस्य कमेटी का गठन कर दिया ।
क्योंकि मणिपुर के हिंसा कोई सामान्य हिंसा नहीं थी… गुजरात की उस खतरनाक हिंसा से भी खतरनाक थी जिस पर दौरा करने के लिए किसी भी नेता की हिम्मत नहीं पड़ती थी… तब कोई जॉर्ज फर्नांडीज जैसा संत प्रकृति का व्यक्ति नेता ही था जो गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इलाके में अकेले जाता। लेकिन अब नरेंद्र मोदी स्वयं प्रधानमंत्री हैं ऐसी हालत में अब कौन जा सकता था….?
यानी मणिपुर, गुजरात से कई गुना ज्यादा हिंसक और वीभत्स हो चुका था, वह इसलिए ज्यादा हिंसक और वीभत्स कहा जाना चाहिए क्योंकि “मातृभूमि को शीश चढ़ाने, जिस पथ जाएं वीर अनेक…. ऐसे एक कारगिल की लड़ाई लड़ चुके एक सैनिक वीर के आर्तमई पुकार मे भी अगर हमारा लोकतंत्र अपना जिंदा होने का सबूत नहीं देता है… तो फिर वह कब देता…?
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इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने ठीक किया कि वह तोता बन चुका सीबीआई की जांच पर यकीन नहीं करना चाहता… उच्चतम न्यायालय ने इस 3 सदस्य कमेटी को सीबीआई पर भी निगरानी रखने का अधिकार दिया है। क्योंकि हालात ऐसे ही हैं, हाल में जब न्यायपालिका के द्वारा लगभग तड़ीपार कर चुके एक वरिष्ठ नेता ने महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री पद पर बैठ चुके ₹70,000 के कथित भ्रष्टाचार के आरोपी के सम्मान में यह कहा कि “वह सही जगह आया है लेकिन देर से…..” तो लगा क्या कोई नेता एक दूसरे नेता के लिए ऐसा बोल रहा है, या फिर एक भाई, दूसरे भाई के लिए बोल रहा है और इस भाई-गिरी ने अगर मणिपुर की हिंसा होती रहती है या करीब साढे 6 हजार पुलिस शिकायतें/ एफ.आई.आर. 3 महीने के अंदर दर्ज हो जाती हैं तो किस लोकतंत्र की औकात है मणिपुर की हिंसा पर कानूनन न्याय दे सकता है…?
तब जबकि निर्वस्त्र की गई महिलाओं की जुलूस निकालने के मामले में मणिपुर के मुख्यमंत्री वीरेंन सिंह बहुत साफगोई से यह कहते हैं की ऐसी सैकड़ों घटनाएं यहां होती रहती हैं… यह शुक्र है इस मुख्यमंत्री वीरेंन सिंह ने यह नहीं कहा की सेना में काम करने वाले तमाम वीर जवानों के घर वालों की रक्षा की जिम्मेदारी का ठेका उन्होंने नहीं ले रखा है… इतना और कह देते तो हमारी वर्तमान राजनीति का चेहरा स्पष्ट हो जाता कि वह आजादी के तथाकथित अमृत काल में पहुंचते-पहुंचते कितनी पतित हो गई है।
इसलिए भी के उच्चतम न्यायालय की समिति अति आवश्यक थी क्योंकि 9 अगस्त भारत छोड़ो आंदोलन का वह नारा अमृत काल में पहुंचते-पहुंचते प्रधानमंत्री जी ने इसे वंशवाद ,परिवारवाद और अन्य प्रकार के राजनीतिक हथकंडो के तौर पर इस्तेमाल कर दिया। यानी गांधी का नारा घटिया राजनीति के लिए कैसे इस्तेमाल कोई प्रधानमंत्री कर सकते हैं यह बड़ा प्रश्न है…?
तब जबकि उन पर अपने मात्र दो मित्रों के लिए देश निछावर करने की आरोप लग चुके हैं। ऐसे में भी यदि हमारा लोकतंत्र जो फिलहाल तीन स्तंभों की लंगडी चाल चल रहा है,… चौथा स्तंभ लगभग गुलामों की तरह क्योंकि वह पूरी तरह से गुलाम बनाए जाने की प्रयोगशाला में जीवित है, हाल में प्रेस विधेयक ने गुलामी की एक मजबूत कड़ी के रूप में अभिव्यक्ति का अवैध अखबार अब 5 लाख रुपए का दंड का भागी घोषित कर दिया गया है। अगर वह तथाकथित अवैध रूप से अखबार निकालता है यानी मरी हुई मीडिया या पत्रकारिता में एक और घुंघरू बांध दिया गया ताकि वह प्रयास भी ना करें क्योंकि उसे कानूनन जमीनी पत्रकार को कोई आर्थिक सहायता के लिए कानून नहीं बनाया गया है। इसलिए वह अभिव्यक्त होने का प्रमाणित होने का अखबारी माध्यम प्रकाशित न करें , ऐसे में पत्रकारिता सिर्फ उन गुलामो के लिए स्वर्ग की तरह बनाई जाएगी जो सत्ता की चटुकारिता के लिए अखबार निकालते हैं। अन्यथा वह शासन के कोपभाजन के लिए तैयार रहें।
इस हालात में जबकि 15 अगस्त आने वाला है संज्ञान लेकर ही सही उच्चतम न्यायालय को पत्रकारिता की पतित अवस्था के लिए भी एक निगरानी दल क्यों नहीं बनाना चाहिए…. ताकि यह पता चले कि कौन अखबार लोकतंत्र के लिए काम कर रहा है और कौन गुलामी के लिए …?
और पत्रकारिता में मिलने वाले पुरस्कार को क्या जमीनी पत्रकार तक पहुंचाने का कोई रास्ता सुनिश्चित भी है अथवा वह सिर्फ गुलामी के लिए जन्मा है और गुलामी के संघर्ष में मर जाने के लिए विवस है…। (Faridabad1)
मणिपुर के लिए तीन सदस्यीय दल के गठन हेतु धन्यवाद,
इस बात के साथ कि कभी रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था-
जब किसी जाति का अहं चोट खाता है,
पावक प्रचंड होकर बाहर आता है।
यह वही चोट खाए स्वदेश का बल है,
आहत भुजंग है, सुलगा हुआ अनल है।

