
लोकतंत्र में चुनाव आचार संहिता के दौरान यानी लोकतंत्र की प्रसव पीड़ा के दौर में निष्पक्ष वातावरण और स्थिर वातावरण माना जाता है। 17 तारीख को मतदान होना है स्वाभाविक है कल चुनाव प्रचार बंद हो जाएगा । इसके एक दिन पहले यानी पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिवस यानी 14 नवंबर को शहडोल भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय में एक पत्रकार वार्ता दोपहर बाद 3:30 बजे आहूत की गई। विषय था, “संकल्प पत्र” के बारे में हमारी भी उत्सुकता रही ।
……………………( त्रिलोकीनाथ )……………………..
हमारे एक मित्र ने कहा पत्रकार वार्ता में चलने को, उत्सुकतावस हम चले गए.. करीब 15 मिनट लेट रहे लगा लेट हो गए हैं लेकिन वहां जाने पर पता चला कि भाजपा के कोई राष्ट्रीय महामंत्री अपने कार्यकर्ताओं और पदाधिकारी की मीटिंग ले रहे हैं। इसलिए जो लोग आधा घंटा से वेट कर रहे थे उनका धैर्य खोने लगा.. हमें भी अटपटा लगा कि जब चुनाव के दौरान ही यह हाल है पत्रकारिता के साथ तो भविष्य स्पष्ट है कि किस दिशा में भाजपा की राजनीति जा रही है।
फिर भी हमारे पुराने साथी जेपी सिंह परिहार से चर्चा होते हुए हम पान खाने बाहर निकल गए 15-20 मिनट उसमें समय काटा, इतने में फोन आया की पत्रकार वार्ता चालू होने वाली है, लौट कर आए तो कई पत्रकार मित्र एक महल हुआ सभा कक्ष में वार्ताकारों के इंतजार में दिखे। पत्रकारों की भीड़ बढ़ रही थी। हम भी इंतजार किया ऐसे एक घंटा हो गया। धैर्य खत्म होता गया, अपना जमीर पत्रकारिता की इस प्रकार की अनदेखी को पचा नहीं पाया और और पत्रकारों की जमीर का वास्ता देकर हम वहां से निकल आए।।
जब लौट कर आए तब याद आया कि भाजपा के एक पूर्व केंद्रीय मंत्री दवे जी थे उनका वाक्य याद आया की “पत्रकार हमारे मित्र नहीं है” फिर इन पत्रकारों को क्यों बुलाया गया यह प्रश्न कौंध रहा था। समझ में आया की जो भारतीय जनता पार्टी के मित्र नहीं है उन्हें गुलामी का इंजेक्शन इसी प्रकार से धीरे-धीरे लगाया जाता है। अन्यथा कोई कारण नहीं था की तयसुदा वक्त में चुनाव की वक्त भी जिसे पत्रकार समाज को गुलाम बनाए जाने के लिए धीरे-धीरे इंतजार कराया जाना एक प्रक्रिया की तरह अपनाया गया है…. तो स्पष्ट है की सत्ता में आने के बाद यह उनका संकल्प और बढ़ता चला जाएगा । भारतीय जनता पार्टी को पत्रकार नहीं उनके गुलाम मित्र चाहिए और भाजपा इस पत्रकार समाज को गुलाम बनाने की प्रयोगशाला में लंबे समय से प्रयास कर रही है। इसलिए अगर उसने पत्रकारों को गुलामी की तरह व्यवहार कर अपने लक्ष्य पूर्ति के लिए उनका उपयोग किया है तो यह कोई नई बात नहीं है।
गुलामी ऐसे ही धीरे-धीरे आती है और भाजपा को मालूम है कि यह समाज आर्थिक रूप से काफी कमजोर और शोषित तथा वंचित समाज है उसकी कमजोरी को ही उसकी गुलामी का सबसे बड़ा साधन बनाया जा सकता है। उसका प्रयोग भाजपा की नई बिल्डिंग में आज देखने को मिला।
संकल्प पत्र नहीं मिलने का दुख जरूर हमें है किंतु भारतीय जनता पार्टी की हाईटेक नई बिल्डिंग शहडोल जैसे आदिवासी विशेष क्षेत्र में मजबूत सत्ता के इरादों को बुलंद करती है। कि वह कैसे अपने संपूर्ण राजनीतिक संगठित ताकत को नियंत्रित करती है, यह भी कोई नई बात नहीं है भाजपा में नई संस्कृति आने के बाद भारत के पूरे जिले में ऐसे 3 स्टार स्तर के कार्यालय बनाए जा रहे हैं । क्योंकि उनके पास धन की कोई कमी नहीं है।
इसके बावजूद भी उनका नियंत्रण यदि संबंधित जिले में सुचारू नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि भाजपा की पकड़ से वह विषय दूर है, बल्कि वह भाजपा की नीतिगत फैसले का एक हिस्सा ही है।
जैसे शहडोल के खनिज संसाधन में माफियाओं का कब्जा यूं ही नहीं बढ़ा है वह नीतिगत तरीके से स्थिर करके रखा गया है। और वह इतना भरोसेमंद और नियंत्रित है की चुनाव आचार संहिता में जब कार्यपालिका अपनी पूरी ताकत में होती है तब भी बहुतायत पाया जाने वाला शहडोल क्षेत्र में रेत खनिज संसाधन की माफिया गिरी अपनी क्षमता के अनुसार संचालित होता रहता है । और उसका संचालन इतना भरोसेमंद होता है कि उसके रास्ते में अगर भारतीय सेना के किसी जवान का परिवार भी आने आता है तो उसे भी वह रास्ते से खत्म कर देने में गुरेज नहीं करता। यह खनिज माफिया की स्थाई ताकत है।
व्योहारी
में खनिज माफिया अपनी उफान पर है भलाई पूरे जिले में विगत एक महीने से रेत का टेंडर नहीं होने से प्रतिबंध लगा हुआ है किंतु खनिज माफिया के लिए वहां कोई प्रतिबंध नहीं है भारतीय सेना का जवान अगर व्यौहारी में बाधा बन तो उसकी जमकर पिटाई कर प्राण घातक हमला भी किया गया। रिपोर्ट भी नहीं लिखी गई दबाव में मामूली सी रिपोर्ट लिखी गई। लेकिन कुछ दिन बाद जब वह अपनी ड्यूटी में दिल्ली चला गया उसके घर में खलिहान में रखे भूसे पर आग लगा दी गई और चुनौती भी दी गई कि अगर उसके यानी माफिया की काम में रुकावट हुआ तो घर में भी आग लगा दिया जाएगा। यह बात जब भारतीय सेवा के उच्च अधिकारियों के पास गई तो उन्होंने प्रशासन को इस पर रेत माफिया की तौर तरीके पर कार्यवाही करने के लिए और सुना के परिवार की सुरक्षा के लिए चिंता व्यक्त की और कार्यवाही की अपेक्षा भी की तो क्या हालत इस स्तर पर खराब हो चुके हैं कि भारतीय सेवा को शहडोल में खनिज माफिया की समस्या को उठाने के लिए स्वयं सामने आना पड़ रहा है…? किंतु यह खनिज माफिया की बड़ी ताकत यूं ही नहीं आई थी।
यह उस स्थाई नीतिगत फैसला की ताकत है जो भाजपा के ऐसे मजबूत मुख्यालयों से अगर नियंत्रित नहीं होती तो यह काम माफिया सरलता से नहीं कर पाता। यही हाल शहडोल में अलग-अलग जगह रेत की माफिया गिरी में सफलता के साथ संचालित है। उन्ही वाहनों को पकड़ा जाता है जो भाजपा के मित्र या कार्यकर्ताओं के मित्र नहीं होते। यह भाजपा मुख्यालय की नई बिल्डिंग की बड़ी ताकत है। ऐसे में अगर यह सब सफलता से संचालित है और उन्हें शहडोल की पत्रकारिता की कमजोरी नस को खेलने होता है तो बड़ी बात नहीं है कि वह पत्रकारों को लगातार धीरे-धीरे गुलामी का मीठा जहर देते रहते हैं। ताकि पत्रकारिता नपुंसक होती चली जाए। उसका आत्म बल और जमीर इस बात की इजाजत न दे कि वह स्वतंत्रता से लोकतंत्र के बारे में सोच सके। अब चुंकि संकल्प पत्र अपने को मिला नहीं तो संकल्प पत्र में खनिज माफिया को लेकर उसने क्या संकल्प लिया है..? उस पर जरूर हम चर्चा करते हैं अगर उनके बड़े नेता होते तो चर्चा रोचक होती। किंतु इन्हीं प्रश्नों से बचने के लिए पत्रकारों को गुलाम बनाए रखने के लिए 1 घंटे डेढ़ घंटे इंतजार करने की यह आदत अब आदिवासी विशेष क्षेत्र में भी शायद भाजपा के उच्च अधिकारियों के निर्देश पर होने लगा है। इसीलिए आज की पत्रकार वार्ता कम से कम 1 घंटा तो लंबित ही रही उनका संकल्प पत्रकार वार्ता के न होने से ज्यादा संकल्पित होता दिखा। पत्रकारिता को धीरे-धीरे कैसे गुलाम बनाया जाए… शायद यही उनका लोकतंत्र है..?

