रंगीन मिजाजी हो चुकी है चुनावी फिजा – ( त्रिलोकी नाथ )

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आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल संभाग मुख्यालय शहडोल नगर में चुनाव प्रचार आज खत्म हो गया। यह कब चालू हुआ था और कैसे खत्म हो गया.. विशेष कर कांग्रेस के मामले में यह जनमानस समझ पाता इसके पहले ही चुनाव प्रचार खत्म हो गया। शहडोल संभाग के दूसरे क्षेत्रों में ऐसा कम दिखा ।

 …..( त्रिलोकी नाथ )…….

बहरहाल चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुसार आज चुनाव प्रचार खत्म हो गया, लेकिन सोशल मीडिया में मंत्री जी का प्रचार जोर शोर से होने लगा कि शहडोल संभाग के एक मंत्री, एक महिला से उसे दिलोजान से चाहते हैं। यह अलग बात है की महिला ने मंत्री जी से नई स्कूटी की मांग की साथ ही अपने प्यार का इजहार किया था। इसका प्रचार जोर-जोर चल रहा है। कांग्रेस के जिलाअध्यक्ष और अनूपपुर क्षेत्र के प्रत्याशी प्रशासनिक अधिकारी रहे रमेश सिंह के साथ मंत्री विशाहू लाल जी की जबरदस्त चुनावी टक्कर है। वहां के भाजपा जिला अध्यक्ष ने कहा है वायरल हो रहा है वीडियो में छेड़छाड़ की गई है जिसकी जांच कराई जानी चाहिए।
अब दो दिन में तो जांच हो नहीं सकती… ऐसे में सीधे निर्णय क्या आएगा कुछ कहा नहीं जा सकता। जो लोग मंत्री जी को जानते हैं उनके लिए यह कोई रंगीन मिजाजी नई चीज नहीं है। लेकिन वोट की राजनीति में यदि समय खराब हो तो यही रंगीन मिजाजी चुनाव का रंग खराब कर सकती है। ऐसा नहीं है कि कभी बिसाहू लाल के चेला रहे अब कांग्रेस के विधायक सुनील सराफ कोतमा से चुनाव लड़ रहे हैं। उनकी भी रंगीन मिजाजी के चर्चे कभी कम नहीं थे। ट्रेन की यात्रा में उनके भी चर्चाओं ने कांग्रेस की छवि खराब कर दी थी बावजूद सुनील शराफ के साथ कांग्रेस पार्टी पूरी निष्ठा के साथ खड़ी रही। तो क्या अनूपपुर की पूरी राजनीति में रंगीन मिजाजी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है…? और इसे वहां की जनता स्वीकार कर लेगी..? यह बड़ा प्रश्न है।
ऐसा नहीं हो सकता कि अनूपपुर में मंत्री जी की रंगीन मिजाजी को अपराध माना जाएगा और कोतमा में उसे प्रोत्साहित किया जाएगा..? बहरहाल चुनाव प्रचार समाप्त होने तक शहडोल में बड़े नेताओं का यानी स्टार प्रचारक नेताओं की उपस्थिति न होने से यह साबित हुआ की शहडोल क्षेत्र भलाई प्राकृतिक संसाधनों से अरबों खरबों का मालिक हो लेकिन राजनीतिक संसाधनों से यह बहुत दलित और पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। जहां जागरूकता ना के बराबर है।

सिर्फ हवा की राजनीति उसे दिशा देती है ऐसे में यह मायने नहीं रखता की प्रत्याशी कौन है और कौन नहीं…? यही कारण है कि हर राजनीतिक दल प्रत्याशी की योग्यता की बजाय पार्टी की योग्यता को मद्दे नजर रखते हुए अपने मोहरे खड़े करते हैं। यह अलग बात है की जनमानस का जो माइंडसेट होता है वही राजनीति की चुनावी निर्णय को तय करता है ।
सब जानते हैं की कभी सोहागपुर विधानसभा क्षेत्र में जब जनता जनार्दन को राजनीति के शोषण पूर्ण व्यवस्था में नूराकुश्ती खारिज़ करते हुए एक थर्ड जेंडर के शबनम मौसी को विधायक बनकर राजनीति को संदेश दिया कि ऐसा नहीं चलेगा और हमारे लोकतंत्र ने उसकी कीमत कुछ इस प्रकार से सोहागपुर विधानसभा को आरक्षित क्षेत्र बनाकर जनता जनार्दन की हैसियत और औकात को नाप दिया था। लेकिन जनमानस कब किस प्रकार की फैसला लेता है अगर उसने तय कर लिया है उसमें शातिर राजनीति लगभग फेल हो जाती है। शबनम मौसी की जीत ने यह तय किया था।
तो देखना होगा की परिवर्तन की हवा में क्या कुछ परिवर्तन हो रहा है.. अथवा नहीं हो रहा है… फिलहाल शहडोल के जैसिंहनगर विधानसभा क्षेत्र अब भाग्य भरोसे ही अपना प्रतिनिधि भेजेगा यह तय होता दिख रहा है। जैतपुर की विधायक मनीषा सिंह का भाग का सितारा चमकेगा या फिर जिला पंचायत अध्यक्ष रहे नरेंद्र मरावी बाजी मार ले जाएंगे यह उनकी भाग्य ही उन्हें आगे का रास्ता दिखाएगा। क्योंकि नरेंद्र मरावी एकमात्र संघर्ष साली नेता के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। जिन्होंने शहडोल प्रशासन में स्थापित शिक्षा माफिया के चेहरा बन चुके मदन त्रिपाठी के खिलाफ जिला पंचायत अध्यक्ष रहते हुए धरना प्रदर्शन का ऐतिहासिक कार्य किया था। और शहडोल जिले की जनता यह भली भांति जानती है उसके लिए एक संघर्ष साली प्रतिनिधि के रूप में नरेंद्र मरावी और दूसरी तरफ भाजपा की औपचारिक नेता मनीषा सिंह का भाग्य काम कर रहा है। जनता किसके साथ है यह देखना होगा, बावजूद इसके कि कांग्रेस संगठन का कोई विशेष लाभ नरेंद्र मरावी को नहीं मिला है, जबकि चुनाव जीतने की फैक्ट्री के रूप में स्थापित भाजपा अपना प्रोडक्शन लगातार बनाने का प्रयास करती रही है। फिर भी जिस भाग्य के भरोसे संघर्ष का चेहरा रहे नरेंद्रमरावी प्रत्याशी बनकर आए हैं वही भाग्य जैसीहनगर क्षेत्र का बनेगा…? यह रोचक होगा।


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