
कथित बेरोजगार और समस्या ग्रस्त युवाओं ने संसद में सेंधमारी करके धुआं धुआं कर दिया,इस धुआं में बीरबल की खिचड़ी पकने लगी और पकोड़ा तलने का रोजगार खुल गया. सत्तापक्ष लोगों ने कहा है कि विपक्ष बेरोजगार रहा, उसे रोजगार मिला. विपक्ष कहता रहा की बीरबल की खिचड़ी किसने पकाई… इसकी जांच पारदर्शी तरीके से हो..? इसलिए करीब 141 सांसदों को संसद से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.. पिछले 75 साल में एक साथ इतने सांसदों का निलंबन भी एक एतिहासिक रिकॉर्ड है..और यह सेंधमारी के खिलाफ एक बड़ा संदेश भी है.
…………………….(त्रिलोकीनाथ )………………………
लेकिन बीरबल की खिचड़ी में कौन, किसके लिए, कैसा रोजगार पैदा कर रहा है..और पकोड़ा तलने में ठंडी में कौन पकोड़े का आनंद ले रहा है ? दरअसल जब पहली बार “पकोड़ा तलने के रोजगार” में खींचातानी हो रही थी उन सांसदों में एक सांसद ऐसा भी बताया जाता है जो वास्तव में उसे समय संसद में ही नहीं था.. तो क्या बीरबल की जो खिचड़ी पक रही थी उसमें निलंबित किए जाने के लिए लिस्ट क्या पहले से तैयार करके रखी गई थी…? यह बात उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी युवाओं ने निर्धारित लक्ष्मण रेखा को पार करके अपनी बात को रखा था…?
यह अलग बात है की करीब 141 सांसद जिस कारण से हटाए गए थे, धुआं-धुआं कर बीरबल की खिचड़ी बनाने की योजना बना दी गई… तो क्या प्रधानमंत्री ने जो कहा था कि पकौड़ा तलना भी एक रोजगार है…क्या वह इसी रोजगार की बात कर रहे थे..?और अगर यह रोजगार है जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी बेरोजगारी दूर कर रहा है…तो उन बेरोजगारों का क्या होगा,जो भारत में40% से ऊपर अपनी बेरोजगारी को और उसकी दुर्गंध युक्त लाश को ढो रहे हैं..?यह बात इसलिए भी कहीं जा रही है क्योंकि जिस सागर शर्मा ने संसद के अंदर मर्यादा लांघ करके अपनी बेरोजगारी का हंगामा खड़ा किया.वह, अपने मां-बाप का इकलौता बेटा था गरीब परिवार का हिस्सा है,तो क्या उसकी गरीबी भी एक कारण थी कि वह उसे “टूल-किट” बनाकर के संसद के अंदर कर अपने अंजाम को सफलता प्रदान की. किंतु बेरोजगारी इतनी बड़ी नहीं थी आखिर वह जिंदा रहने के लिए किराया का ऑटो तो चला ही रहा था…और तर्क दिया जा सकता है कि वह पढ़ा-लिखा भी नहीं था.. तो फिर उसे संसद के अंदर हंगामा करने के लिए किन लोगों ने प्रेरित किया…? और उसे क्या कोई पकौड़ा तलने का रोजगार भी दिया था.. और वह रोजगार का मूल्य क्या था..? इसकी जांच आखिर क्यों नहीं होनी चाहिए …? किंतु इसकी शुरुआत अंत से ना हो करके शुरुआत से क्यों नहीं हो रही है…?
अगर सागर शर्मा अपने सागर को विस्तार करके दक्षिण के भाजपा के सांसद प्रताप कीपरमिशन कैसे प्राप्त कर लिया..?कौन सा इतना सशक्त नेटवर्क है,जो दक्षिण से चलकर उत्तर के इस सागर को संसद के अंदर अपनी लहर फैलने की अनुमति दे दी.;तोभाजपा सांसद प्रताप सिंह का प्रताप बड़ा है या सागर शर्मा का सागर या दोनों ही इतने छोटे हैं कि उन्हें माफ कर दिया जाना चाहिए…? लेकिन भाजपा सांसद प्रताप सिंह के प्रताप यह था कि वह भाजपा का सांसद है,इसलिए उसे अभी तक आतंकवादी निरोधक अधिनियम के दायरे में नहीं रखा गया है, और ना ही उसकी जवाब देही संतोषजनक तरीके से संसद को दी जा रही है. तो क्या कुछ छुपाया जा रहा है…? या फिर कुछ जांच करने के लिए कुछ दबाया जा रहा है…? और इन सबको दबाने के लिए करीब141 सांसदों को हल्ला मचाने पर संसद के बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है…?
कि ना रहेगी बांस और ना बजे की बांसुरी…क्योंकि संसद के अंदर अगर यह सांसद रहेंगे तो लगातार हल्ला मचाते रहेंगे इस बीच में होता रहा पत्रकार रवीश कुमारने उस खबर को आगे कर दिया जो मुंबई की सड़कों में समंदर की चाल पर समंदर की तरह विस्तार धारावी के स्लम एरिया में घुसा अंदर घुस गया..कहा गया कि उनके-मित्र गौतम अडानी को धारावी ठीक करने के लिए सस्ते में ठेका दे दिया गया है..और इसके लिए अन्य बिल्डर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं..और यह मान लिया जाए की रवीश कुमार झूठ ही बोल रहे हैं कि भारत के करीब बड़ी रियल स्टेट का अंश भाग इस धारावी से नियंत्रित होता है तो क्या धारवी के जरिए रियल एस्टेट के कारोबार में गौतम अडानी का कब्जा की जा रही है और इस बड़ी सी मेरी को दबाने के लिए संसद के अंदर बेरोजगारों ने हंगामा खड़ा कर रखा है ताकि कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना के अंदाज परयोजना का क्रियान्वन हो जाए..ऐसी भी झूठी कल्पनाएं क्यों नहीं करनी चाहिए..?
क्यों कि हम कल्पना लोक के लोकतंत्र में रह रहे हैं..और तमाम बहस सिर्फ एक मनोरंजन है उसका कोई निष्कर्ष नहीं निकलता..जांच एजेंसियां सिर्फ एक टूलकिट है…? जो अपने लक्ष्य को अपने आलकमान के इशारे पर निर्णय तक पहुंचती हैं..और यही कारण है कि पुलवामा में शहीदों का निर्णय आज तक नहीं आ पाया है…? फिर भी हम पकोड़ा तलने के रोजगार के लिए लगातार लगे हुए हैं…और यह सतत संघर्ष जारी रहेगा इस बीच अखबार ने खबर दी है की संसद में सेंधमारी के बाद संसद परिसर में हंगामा करने वाली आंदोलनकारिणी नीलम के गांव जींद में पंचायत ने नीलम के पक्ष में अपना निर्णय सुना दिया कि वह बेटी हैऔर अपने हक की लड़ाई लड़ रही थी….तो क्या सिर्फ बेटी को बचाया जाएगा और बेटों की बात नहीं की जाएगी….?
सच बात किए हैं की लखनऊ के सागर शर्मा के मां-बाप परेशान हैं कि वह कि लोकतंत्र में फंस गए हैं जहां उनका इकलौता लड़का सागर शर्मा जो किराया का ऑटो चलाकर अपने जीवन की नैया पार करने की सोच रहा था उसे षड्यंत्र ने नई टेक्नोलॉजी के सहयोग से शिकार बना लिया और उसका ब्रानवास कुछ इस तरह से किया कि वह इस लोकतंत्र में बलिदान होने के लिए आतंकवादी का आरोपी बन बैठा और संसद के अंदर धुआं-धुआं कर दिया…और सच बात यह भी है कि इस दुनिया में सत्ता के शिकारी अपनी खिचड़ी पकने लगे हैं और उससे भी कड़वा सच किए हैं की रोजगार का पकोड़ा राजनीतिज्ञ के लिए जमकर पक रहा है…यह अलग बात है की सत्ता पक्ष उसे ज्यादा खा रहा है या विपक्ष …?
अन्यथा आरोप-प्रत्यारोप रूप से हटकर के पारदर्शी जांच जनता जनार्दन को क्यों नहीं बताई जानी चाहिए किंतु अगर यह जांच भी पुलवामा के शहीदों की जांच की तरह निष्कर्ष-हीन रहेगी या राष्ट्र-हित में छुपा दी जाएगी तो कहा जा सकता है के अभी बहुत कुछ बाकी है.. जो होना है..आधुनिक नेताओं के कारगुजारी से. इसमें कोई शक नहीं तो हमें और आपको को तैयार रहना चाहिए हर चीज मनोरंजन की तरह सुनने और समझने के लिए और कष्ट और पीड़ा तो दहेज में आएगा तो दुखी मत होइए.. यही आनंद है.. यही परमानंद है… आधुनिक लोकतंत्र का…..

