
हो सकता है उनमें प्रपंच रचना का वह समर्थ ना हो, जो उनके विरोधी राजनेताओं में कूट-कूट कर भरा है… किंतु पदयात्रा की राजनीति देश को नजदीक से देखने और समझने की राहुल की राजनीति का मुकाबला करने का समर्थ अपने को दुनिया की सबसे बड़ी सदस्यता वाली राजनीतिक दल दिखाने वाले भारतीय जनता पार्टी के एक भी नेता के पास नहीं है। यह राहुल गांधी की पहचान को असीमित कर देता है। . और भारतीय जनता पार्टी उसमें बहुत छोटी नजर आती है।
…………………..( त्रिलोकीनाथ)…………………………..
“मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊं…
यह काव्य अंश हमने अपनी प्राथमिक शिक्षा में खूब पढ़ा और बहुत रुचि लेकर पढ़ा.. तब महात्मा गांधी बना एक सपना था… शायद उसी से प्रेरित होकर लेखक ने ऐसी कविता लिखी रही होगी।
किंतु इस पर कितने लोग चलते थे..? शायद राजनेताओं की श्रेणी में देखें तो 21वीं सदी में तो शायद ही कोई चला हो। किंतु गांधी की इस नकल को असल में बदलने का काम गांधी ने ही करके महात्मा गांधी की इस वसीयत पर कब्जा करने का काम किया है।
यह तमाम झूठ की आंधियों के बीच में एक कड़वा सच है कि राहुल गांधी पूरे भारत को अपनी पद यात्रा से न सिर्फ नापने का काम किया है बल्कि कांग्रेस के लोगों को भी साथ में पदयात्रा करने के लिए बाधित किया है। पदयात्रा सर्वाधिक चर्चित अगर कोई रही है तो वह महात्मा गांधी की नमक तोड़ो कानून की *दांडी-यात्रा” रही है किंतु महात्मा गांधी के बाद अगर किसी भी राजनेता को याद किया जाएगा शायद पूरी दुनिया में तो शायद राहुल गांधी का ही नाम आगे आएगा।
इसे और मजबूत करने के लिए अब 6 हजार200 किलोमीटर की पदयात्रा का अनुष्ठान राहुल गांधी ने किया है। जो बेशक विलासिता पूर्ण जिंदगी जीने वाले भारत की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत वरदान है की दुनिया में जिंदगी से आगे भी एक जिंदगी है। राहुल गांधी राजनीति में सच की प्रयोगशाला पर लगातार प्रयोग कर रहे हैं…बावजूद इसके कि झूठ का आडंबर उनके इर्द-गिर्द शायद उनकी ही पारिवारिक लापरवाही के कारण घने कोहरे की तरह बना या बना दिया गया है। वर्तमान राजनीति झूठ और आडंबर की राजनीति है, इवेंट की राजनीति है.. ऐसे में अगर राहुल गांधी महात्मा गांधी के बताए रास्ते के जरिए इस झूठ के कोहरे को तोड़ने का काम कर रहे हैं तो उनकी तारीफ निश्चित तौर पर की जानी चाहिए।
हो सकता है उनमें प्रपंच रचना का वह समर्थ ना हो जो उनके विरोधी राजनेताओं में कूट-कूट कर भरा है… किंतु पदयात्रा की राजनीति देश को नजदीक से देखने और समझने की राहुल की राजनीति का मुकाबला करने का समर्थ अपने को दुनिया की सबसे बड़ी सदस्यता वाली राजनीतिक दल दिखाने वाले भारतीय जनता पार्टी के एक भी नेता के पास नहीं है। यह राहुल गांधी की पहचान को असीमित कर देता है। . और भारतीय जनता पार्टी उसमें बहुत छोटी नजर आती है।
हालांकि भाजपा ने उसका मुकाबला अपने तरीके से अपने अलग-अलग इवेंट के जरिए करने का फैसला किया है उसमें धर्म की राजनीति के जरिए अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठित रामलाल की मूर्ति को पुनः प्राण प्रतिष्ठा किए जाने और अधूरे राम मंदिर के लोकार्पण या उद्घाटन भी एक बड़ा इवेंट है…।
और वर्ष 2024 में यह बड़ा रोचक होगा की धर्म का इवेंट, गांधी के इवेंट के सामने टिक पाता है या नहीं…. क्योंकि एक तरफ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सत्ता में स्थापित सत्ता की चमक का सर्वाधिक बड़ा मेगा शो होने वाला है , और दूसरी तरफ महात्मा गांधी के कदम दर कदम चलने वाली पदयात्रा का राहुल गांधी का मणिपुर से मुंबई की पदयात्रा होने वाली है।
तो देखते हैं महात्मा गांधी और उनके राम में कौन ताकतवर लोकतंत्र के लिए साबित होता है…? 2024 का लोकसभा का चुनाव भी इसका एक प्रमाण पत्र के रूप में देखा जाएगा… लेकिन वह संपूर्ण सत्य नहीं होगा, संपूर्ण सत्य स्पष्ट तौर पर राहुल गांधी की प्रमाणित रूप से पदयात्रा को माना जाएगा…. क्योंकि राहुल ने गांधी के बताए रास्ते पर न सिर्फ चलने का ठान लिया है बल्कि इस नक्शे कदम पर अपनी शेष अवशेष कांग्रेस पार्टी को चलाने के लिए भी निष्ठा व्यक्त की है…
यह अलग बात है की 21वीं सदी की विलासिता की दुनिया में जहां कोई फकीर 8000 करोड़ के हवाई जहाज पर चलता हो वहां उसे देश का लगभग राजमहल में पला हुआ युवा राहुल गांधी की पदयात्रा से कितना मोहब्बत करता है। क्योंकि हवाई जहाज का सपना और गांधी की पदयात्रा में आखिर जमीन आसमान का अंतर है। और इसी अंतर में भारतीय लोकतंत्र का भविष्य कुलाचें भर रहा है. कि वह किस प्रकार के लोकतांत्रिक देश में अपना भविष्य निर्भर करता है.. उसे “मदर ऑफ डेमोक्रेसी” वाला भारत चाहिए या फिर “गांधी के लोकतंत्र” का भारत चाहिए अन्यथा युवा भारत को बूढ़े होने की भी भयानक गारंटी मिलने वाली है… अब वह है बिलासी बूढ़ा बनना चाहता है या गांधी के मार्ग में युवा भारत…? यह भी हम राजनीति की नई विरोधाभासी विचारधारा के परिणामों पर देखेंगे..|
फिलहाल तो राहुल गांधी युवा भारत का सबसे बड़ा आइकॉन मॉडल साबित होने वाले हैं आखिर वह 6 हजार200 किलोमीटर पद यात्रा की जो कसम खा लिए हैं……आखिर कुछ तो इस देश में युवाओं को हासिल होगा। यह तो तय है बाकी राजनीति तो “कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना” लगाने की एक कला ही है अगर पदयात्रा की कला स्वीकार्य होती है तो यह देश को सच के रास्ते में भी ले जा सकता है इसमें कोई शक नहीं…..

