मुख्यमंत्री यादव ने जब कहा शहडोल सहस्त्र तालाबों का नगर, तब एक तालाब भांठ दिया …

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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ना तो अनुभवी कूटनीतिज्ञ अथवा खतरनाक और चालबाज मुख्यमंत्री हैं और ना ही माफिया सरगना की तरह राजनीति करते हैं वह सहज सरल आम आदमी की भाषा में संवेदना व्यक्त करते नजर आते हैं इसीलिए जब भी आम आदमी को और इस जुड़ी भावनाओं को चोट पहुंचता है वे एक्शन पर आ जाते हैं, जिसका परिणाम होता है शाजापुर में कलेक्टर की नागरिक के साथ असभ्यता के साथ भाषा का इस्तेमाल हो या उमरिया में एसडीम की राह चलते नागरिक के साथ मारपीट कर गुंडागर्दी का संदेश देने का मामला हो… सतर्कता के साथ तत्काल कार्यवाही करते नजर आते हैं।

—————————( त्रिलोकीनाथ )—————————–
फिलहाल उनकी यही भावना पर्यावरण संरक्षण की ओर दिखाई देती है शहडोल में जब मोहन यादव आए थे उन्होंने शहडोल को चिन्हित करने के लिए शहडोल के तालाबों की 100 से ज्यादा की संख्या की चर्चा कर इसकी तारीफ की थी। कल वह इंदौर में एक तालाब की संरक्षण के जरिए राज्य के तालाबों और जल स्रोतों के संरक्षण पर संदेश दिया है। बहुत अच्छा है, एक मुख्यमंत्री को प्रदेश के मुखिया होने के नाते जड़ और चेतन वस्तु के प्रति संवेदना होनी ही चाहिए। तालाब और हमारे नदियां तमाम जल स्रोत, जंगल मानव जीवन और जीव जंतु का आधार है। किंतु यह पुस्तकों में सिमटता चला जा रहा है और आंकड़ों की जादूगरी में भ्रष्टाचार के लिए समर्पित हो रहा है।
20वीं शदी के अंत में उमरिया में पंचायत में तालाब बनाने की बारे में कहा गया था की तालाब इस प्रकार से बने हैं कि अगर जहां पैर रख दो तो हो सकता है वह भी तालाब हो…? यह भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा मुहावरा था।
लेकिन शहडोल में तालाब बनाने नहीं थे, प्रकृति ने विरासत में तालाब और नदियां तथा जंगल से आदिवासी विशेष क्षेत्र को भरापूरा किया था लेकिन खूंखार राजनीतिज्ञ और राजनेताओं तथा अफसर की माफिया गिरी के कारण विशेष कर मुख्यमंत्री के चिन्हित नगर के सहस्त्र तालाब या तो आत्महत्या कर रहे हैं या फिर उनकी हत्या शहडोल का नेता और प्रशासन हत्यारा माफिया बन कर तालाबों को भू माफिया के माफिया गिरी में नष्ट कर रहे हैं । क्योंकि कई नेता और अफसर भू माफिया गिरी में संलग्न अथवा संरक्षण दे रहे हैं इसलिए शहडोल नगर के तालाब तिल तिल करके मर रहे हैं।
जिस दिन मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव पॉलिटेक्निक मैदान में शहडोल नगर के सहस्त्र तालाब पर ढपोलशंखी बयान बाजी कर रहे थे उसी दिन इस पॉलिटेक्निक मैदान से करीब 500 मीटर दूर एक बड़े तालाब को पाट कर भू माफिया ने प्रशासन के मूक-बधिर सहयोग से वहां पर तत्काल दीवाल नई-नई खिंचवा दी थी (यहां पर भूमाफिया शब्द का उपयोग इसलिए भी किया जा रहा है क्योंकि तालाब कभी भी किसी ने धोखे से अपना नाम भू अभिलेख में चढ़ावा लिया है इसके बावजूद भी वह जीवित तालाब है उसे नष्ट करने का अधिकार किसी को भी नहीं है)
इस तरह मुख्यमंत्री के भाषण के दौरान ही एक और तालाब की हत्या का प्रमाण पत्र मिला। शहडोल में जब तक आदिवासी समाज का और स्थानीय विरासत में आए समाज प्रभुत्व मे़ रहा है तालाब संरक्षित रहे हैं, इसमें कोई शक नहीं । लेकिन जैसे ही यहां की राजनीति में बाहरी आदमी आए वह माफिया बनकर राजनेता बने और न सिर्फ तालाबों और नदी नालों को नष्ट किया बल्कि सरकारी और आदिवासी समुदाय की जमीनों को धोखाधड़ी करके हथिया लिया और नेता बनकर के प्रशासनिक अफसर को मिलाते हुए क्षेत्र की पर्यावरण और पारिस्थितिकी को बुरी तरह से नष्ट भ्रष्ट कर दिया।
इसमें चाहे कांग्रेस पार्टी के नेता हों या भारतीय जनता पार्टी के नेताओं सबका बीते 10-15 सालों में नाम बढ़-चढ़कर आता है।

प्रशासन इन पर कार्रवाई करने की बजाय इनके साथ मिलकर बंदर बांट करने लगता है बताया तो यहां तक जाता है कि जिस प्रकार से बुढ़ार में चर्चित शिक्षक ने जमीनों की हेरा फेरी की, पूर्व विधायक ने जमीनों की हेरा फेरी की, इस तरह शहडोल में नेता और अफसर मिलकर सरकारी जमीनों में आदिवासियों की जमीनों में वैध-अवैध रूप से हेरा फेरी करके जमीनों पर कॉलोनी बनाकर आम आदमी को बेचकर लूटपाट कर रहे हैं। जिसमें कई मामले उजागर हो गए हैं और कई मामले प्रशासनिक अफसर के साथ माफिया गिरी करके दबाये रखा गया है।

तो कुछ में कॉलोनी बनाकर कॉलोनाइजर लोगों को बेवकूफ बनाने में तुले हुए हैं बहरहाल हकीकत तालाबों नदी और नालों को नष्ट करने की सच्चाई को भी दबाने का काम सरकारी कर्मचारी पूरी तन्मयता से करते नजर आते हैं। उसी का यह परिणाम है की शहडोल नगर के 300 से ज्यादा तालाब अब 50 से कम तालाबों की संख्या में बचे हुए हैं जो भूमिमफिया के साथ मिलकर अथवा उनके रकबे छोटे कर दिए गए हैं या फिर उन्हें भी नष्ट किया जा रहा है ।
ऐसा नहीं है की भविष्य को देखते हुए कुछ बसे स्थानीय लोग इन तालाबों को बचाने के लिए प्रयासरत नहीं है किंतु उनकी योजनाओं पर सरकार और प्रशासनिक अधिकारी ध्यान ही नहीं देना चाहते। यही दुर्भाग्य शहडोल के मुख्यमंत्री डॉ यादव के कथन अनुसार 100 से अधिक तालाबों की कड़वी सच्चाई है। लेकिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की संवेदना के साथ बातें आगे तब बढ़ सकती हैं जब वह आम आदमी के संवेदना के साथ स्वयं को जोड़ सकें। उनके तालाब संरक्षण के प्रस्तावों को गंभीरता से वर्तमान परिवेश में संरक्षण के लिए समझ सकें । किंतु सबसे बड़ी समझ यह है कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव जब अपनी संवेदना के साथ आगे बढ़ते हैं तो क्या पार्टी उनके साथ खड़ी होगी..? क्योंकि कड़वी सच्चाई यह है कि जो भारतीय जनता पार्टी के लोग हैं अथवा अन्य राजनीतिक दल के लोग भी वे सभी इन तालाबों को नष्ट करने वाले बड़े भूमिया के रूप में नजर आते हैं.. फिर भी मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव की संवेदना काबिले तारीफ है कि वह जल जंगल और जमीन के प्रति संवेदनशील है। इससे उम्मीद जगाती है कि अगर मुख्यमंत्री के समक्ष सही ढंग से प्रस्तुति प्रशासन कर सके, तो संभावना है कि शहडोल नगर के तालाब मुख्यमंत्री की भाषण में “सहस्त्र तालाबों का नगर”शहडोल को बचाया और बनाया तथा संवारा जा सकता है उसे रोजगार परख और सौंदर्य पर्यटन का केंद्र भी बनाया जा सकता है। किंतु अफसर शाही की भूमिका अगर कर्तव्य नष्ट हो तो..? जो फिलहाल तो नहीं दिखती….


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