“सारे जहां से अच्छा, लोक-तंत्र हमारा; हम गुलाम है इसके, यह गुलसिता हमारा…?”” (त्रिलोकी नाथ)

Share

     सीजन निर्वाचन महोत्सव का है हालांकि यह अब साल भर चलने वाली एक ड्रग्स जैसा हो रहा है.. जिसमें कई लोग आनंदित होते हैं इसलिए हमें भी सिर्फ सोचना ही तो है.. हमारा लोकतंत्र लगातार विकसित हो रहा है, इसे निर्वाचन की दृष्टिकोण से और कितना सुविधाजनक बनाया जा सकता है.. ताकि आम जनता बिना किसी परेशानी के भारत के लोकतंत्र में योगदान दे सके।

————(त्रिलोकी नाथ)——————
तो सोच के देखते हैं कि, मान लें निर्वाचन आयोग के तीन पदाधिकारी ने एक मत से निर्णय ले लिया की आम मतदाताओं को वोट देने के लिए डिजिटल प्रक्रिया को अपनाया जाएगा, जिसके तहत कोई भी व्यक्ति यानी मतदाता कहीं भी बैठकर सिर्फ अपने मोबाइल से वैकल्पिक उम्मीदवारों के लिए वोट करेगा और उन्हें नंबर के जरिए बटन दबाकर के वोट दिए जाने की सुविधा दी जाएगी। ऐसे में जिसको उन्होंने वोट दिया है उसकी फोटो संबंधित मतदाता के मोबाइल में आ जाएगी उसके नाम सहित, इस प्रक्रिया से मतदाताओं को जहां भी काम कर रहे हैं जिस वक्त भी रह रहे हैं उसे वक्त, उस पोजीशन में उन्हें वोट देने की सुविधा मिल जाएगी और मतदान भी इलेक्ट्रॉनिक पद्धति से तत्काल हो जाएगा।
इससे और लोकप्रिय बनाने के लिए यह भी किया जा सकता है की हर वोट देने वाले मतदाता को हजार रुपए तत्काल उसके अकाउंट में ट्रांसफर हो जाएंगे इससे तमाम भ्रष्टाचार के सभी अवसरों को खत्म कर दिया जाएगा और लाभार्थी को तत्काल उसको मत देने की बदले किए गए श्रम का मूल्य भी पूरी पारदर्शी तरीके से बिना भ्रष्टाचार के डिजिटल इंडिया के तहत उसके अकाउंट में पैसे भी आ जाएंगे । इससे आम आदमी को लाभ भी मिलेगा और निर्वाचन प्रक्रिया के अरबों- खरबों रुपए की खड़ी हुई काला बाजार के काला धन की पूरी प्रक्रिया भी समाप्त हो जाएगी, इसमें कोई बुराई भी समझ में नहीं आती है।
आखिर लोकतंत्र में वोटो को खरीदने के लिए 160 अरब रुपए का इलेक्टोरल बांड के जरिए अपव्य प्रमाणित तो हो ही रहा है बावजूद सुप्रीम कोर्ट के फैसला आ जाने के बाद भी इस पर रोक नहीं लगाया गया है। जिसे कानून बनाकर स्टेट बैंक आफ इंडिया ने कागज के टुकड़ों के जरिए इकट्ठा किया था। “इलेक्टोरल बांड” के कानून बनाकर डाली की डकैती को अगर सुप्रीम कोर्ट ने अवैध यानी गैरकानूनी यानी असंवैधानिक प्रमाणित नहीं किया होता तो इस डकैती को देश के सर्वोच्च विद्वान कार्यपालिका द्वारा बैंकिंग कार्य प्रणाली द्वारा और नेताओं के द्वारा पिछले कई वर्षों से मान्यता तो दिया ही जा रहा था। कुछ पगलों ने इसे न्यायालय में ले जाकर जबरदस्ती विवाद का कारण बना दिया। लेकिन इससे फायदा हुआ है यह तो प्रमाणित हुआ ही की 160 अरब रुपए सिर्फ एक झटके में कैसे इकट्ठे हो जाते हैं..?
मुझे तो नहीं लगता कि चुनाव आयोग को वित्त मंत्रालय इतना पैसा देता होगा कि वह चुनाव कराए…? तो इससे यह साफ होता है की यही पैसा यदि चुनाव आयोग को कानूनन दे दिया जाए तो लाभार्थियों को मत देने जैसे उबाऊ और अर्थहीन लोकतांत्रिक कल्पना में जबरदस्ती भाग नहीं लेना पड़ता। यह भी एक प्रस्ताव है।
जब हम मूर्खतापूर्ण तरीके से सोचने का काम करते ही है तो ऐसा भी सोचना चाहिए… इस पर कोई बुराई नहीं, मांग की तो तृप्ति होती ही है । भारत के पूंजीपतियों और कई कलाबाजारियों को यह तृप्ति करता रहा है। तो अगर 140 करोड़ के देश में करोड़ मतदाताओं को क्षण भर के लिए तृप्ती मिल जाए या दिन भर के लिए दारु पीने वालों के लिए या खाने -पीने वालों के लिए और नहीं तो पेट भरने वालों के लिए तृप्ति मिल जाए, कानून तरीके से तो इसमें क्या बुराई है…? आखिर कानून बना करके 81 करोड़ जनता को तृप्ति तो किया ही जा रहा है सिर्फ 5 किलो अनाज से…?
चलिए अब अपन दूसरा मनोरंजन करते हैं करीब 3 महीने असफल लोकतंत्र निर्माण के लिए आखिर हम अपना योगदान तो दे ही रहे…। शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र है, यहां का पर्यावरण और पारिस्थितिकी प्रकृति तरीके से बेहतरीन वैभवशाली रहा है। यहां का आम आदमी सहज रूप से अपने कच्चे मकान में और साधारण जिंदगी में प्रकृति के संतुलन के साथ जीत चला आया है।
थोड़ा बहुत तो कष्ट होता ही है.. जीने के लिए फिर चाहे वह राहुल गांधी के लिए कष्ट हो बिना शादी करावाये जीने की दवा हो या फिर नरेंद्र मोदी के लिए शादी करने के बाद भी पत्नी को छोड़कर जीने का दबाव हो… कहने के लिए यह व्यक्तिगत चॉइस है, लेकिन यह संघर्ष भी है… इसको इस ढंग से भी देखना चाहिए…। बहरहाल यह रूचि भी है इसलिए इसका स्वागत ही करना चाहिए। क्योंकि संघर्ष अलग-अलग तरह को होता है, दारु पीने वाले के लिए सुखद संघर्ष और ना पीने वाले के लिए दारु पीने वाले को झेलना का संघर्ष ; यह बरकरार ही रहता है। यह किसी भी स्थिति में सुविधा देने के बाद ठीक नहीं होने वाला है।
इसलिए यह तय किया गया आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल में की जो आम आदमी को नदियों में बहती हुई रेत पानी की तरह लगभग फ्री मिलती है उसको देश के लिए लाभप्रद कैसे बनाया जाए और नतीजा यह हुआ की प्राय:मुफ्त में मिलने वाली रेत, प्रकृति के द्वारा जैसे सूर्य की रोशनी, स्वस्थ हवा और उपलब्ध पानी मिलता है वैसे ही रेत भी इस आदिवासी विशेष क्षेत्र मेंउपलब्ध रहा है । किंतु 21वीं सदी में जब देश विकसित होने की रफ्तार में दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनकर विश्व गुरु बनने जा रहा है तब यह तय हुआ कि शहडोल की रेत को शासन अपने अधीन कर ले और उसने कानून बनाकर के पूरी रेत को जो सुविधाजनक तरीके से सस्ते में मिल रही थी 200-300 रुपए में ट्रक मिल जाता था उसे खनिज नीति बनाकरअब 10 से ₹20हजार प्रति ट्रक के हिसाब से उपलब्ध कराए जाने की घोषणा कर दी गई ..नतीजा यह हुआ कि ठेकेदार ने एक कदम और बढ़ाकर अपना योगदान देते हुए शहडोल प्रशासन के साथ मिलकर उसने निकटतम उपलब्ध रेत की घोषित खदानों को अनुबंध के जरिए रेत निकालने की प्रक्रिया को रोक दिया ताकि शहडोल का रेत का उपभोक्ता व्योहारी से या अनूपपुर से या उमरिया जिले से रेत को खरीद कर शहडोल ला सके।
इसमें दो फायदा हुआ एक तो व्यापारी का व्यापार बढ़ा और आर्थिक महाशक्ति के दौर में हम आगे बढ़े.. दूसरी ओर काला बाजार का कारोबार आर्थिक महाशक्ति को आगे बढ़ाने के लिए अप्रत्यक्ष योगदान देने लगा… यह अलग बात है की शहडोल का उपभोक्ता₹300 में प्रति ट्रक मिलने वाले रेट को ₹20000 में भी देकर भी अब असमर्थ है क्योंकि उसे अब अपने यहां की उपलब्ध बगल में पड़ी हुई रेत को या तो चोरी से उठाना पड़ेगा या फिर सैकड़ो गुना ज्यादा कीमत देकर के उसे अपने घर बनाने के लिए रेत लेना होगा। यह हमारी कुशल प्रशासन व्यवस्था का वरदान भी है यह हमारी सरकारी यह सरकारी नीतियों का ही चमत्कार है। अचानक जैसे भगवान राम अयोध्या में उतर आए हैं हम इसे उतनी ही खुशी से स्वीकार कर रहे हैं।

     जैसे सरकार ने तय किया कच्चे मकान तोड़ दिए जाएं और पक्के मकान देकर उन्हें फील-गुड अमीरों की तरह अनुभव होने के लिए फ्री में दिया जाए…. नतीजा यह हुआ की चुनाव के पहले पूरा ईट बाजार में दुगना रेट में बिकने लगा, रेत तो पहले से महंगी मिल रही थी अब मूर्ख जनता को यह लगता है कि यह महंगा है तो वह उसकी मूर्खता है…. आपके देश में गधों की विश्व की आर्थिक महादौड़ में अपने गधों को दुनिया सबसे आगे ले जाना है .. वह अपने योगदान में चोरी करना चाहता है शायद इसीलिए शासन और प्रशासन के बुद्धिमान तबका मिलजुल कर इस चोरी को रोकना चाहता है। इसीलिए उसने प्रत्यक्ष रूप से महंगा बाजार बनाया और अप्रत्यक्ष रूप से कालाबाजार में करोड़ अरबो रुपए का योगदान देने का तय कर लिया।
जिसे हमारे विधायक का और कार्यपालिका के बुद्धिमान लोगों ने चार चांद भी लगा दिया और पूरी ताकत लगाकर आम उपभोक्ता को कानूनन पालन करने का बात कर दिया। यह हमारे लोकतंत्र की ताकत भी है और गौरवशाली मूर्खता भी कि हम कानून बनाकर कुछ भी कर लेते हैं । अब यह अलग बात है कि संविधान की पांचवी अनुसूची में यह इस क्षेत्र के लोगों की मौलिक अधिकार है तो उसके लिए कानून का न्यायपालिका का दरवाजा खुला हुआ है जिसको जाना है तो जाए…?
ऐसे में यदि निर्वाचन प्रक्रिया में करोड़ो लाभार्थियों को वोट डालने के श्रम के बदले ₹1000 प्रति मतदाता के हिसाब से उसके बैंक अकाउंट में तत्काल मत डालने के बाद ₹1000 मिल जाता है तो ऐसी नीति बनाने में क्या खराबी है…? इससे मतदान का प्रतिशत भी बढ़ेगा और देश का लोकतंत्र देखने के लिए तो मजबूत होगा ही कि हमारा वाटर जागरुक है …। और जो सबसे बड़ा फायदा होगा वह मोदी की गारंटी की गारंटी कहलाएगा दो करोड़ प्रति वर्ष लोगों को रोजगार मिलेगा यानी 10 वर्ष में अभी तक कितने लोगों को कितनी बार ₹1000 वोट डालने की श्रम के बदले मूल्य मिल गया होता यानी रोजगार मिल गया होता लेकिन ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि बुद्धिमान निर्वाचन आयोग अपनी बुद्धिमत्ता सिद्ध नहीं किया है..? ऐसी अपनी कल्पना है।
लेकिन सरकार अपने हिसाब से लाभार्थियों को लाभ देने के बारे में सोचती है इस कारण हमारा निर्वाचन आयोग इस दिशा में शायद ही काम करेगा..! यह सोचकर मैं दुखी हो जाता हूं कि लोकतंत्र का इस पक्ष में स्वतंत्रत क्यों नहीं हो पा रही है…? क्योंकि जनता का जो होना है वह होना ही है.., उसे कोई भारत भाग्य विधाता ,नहीं रोक सकता। एक फायदा और होता स्थानीय पत्रकारिता को टूट-पूजिहे, छुटभैये स्मगलर टाइप के माफियानुमा बाहरी लोगों नेता बन चुके लोगों के पीछे हजार दो हजार रुपए के लिए कुत्ता-गिरी नहीं करनी पड़ती.. थोड़ा सा स्वाभिमान जिंदा रखने का जज्बा तो जिंदा ही रहता… खाना तो भगवान ही देता है…।
अब इससे बदतर और क्या हो सकता है की घोषित तौर पर 160 अरब रुपए और अघोषित तौर पर खरबों रुपए लोकतंत्र के तथाकथित चार स्तंभों में एक स्तंभ विधायिका के उंगली में गिने जाने वाले राजनीतिक दलों को फ्री में मिल जाते हैं.. और मतदाता उल्लू की तरह रात में जाकर स्वतंत्रता के ख्वाब देखता रहता है और कोई बात नहीं है…


Share

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

राशिफल

- Advertisement -spot_img

Latest Articles