नई संसद भवन के लोकसभा में सूरत से आया दलाल//मंगलसूत्र की चिंता वाले देश में “गोल्ड-लोन” पहुंचा, एक लाख करोड़ से ऊपर का–(त्रिलोकी नाथ)

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    लोकसभा के चुनाव का दूसरा चरण 26 अप्रैल को खत्म हो गया । नई संसद भवन में लोकसभा गठन के आगाज भी हो गई है, उसका पहला सदस्य जिस सूरत से आया है वह निर्वाचित नहीं निर्विरोध घोषित दलाल है। सामान्य तौर पर दलाल उसे कहते हैं जो दलाली के धंधे में दोनों पक्ष से कमीशन लेता है लेकिन ये दलाल, सूरत लोकसभा क्षेत्र से निर्विरोध निर्वाचित घोषित दलाल है। क्योंकि गुजरात के सूरत लोकसभा क्षेत्र से जो भी प्रत्याशी खड़े हुए थे या तो उन्होंने अपना पर्चा वापस ले लिया या फिर प्रमुख प्रतिनिधि कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी का पर्चा इसलिए रद्द हो गया क्योंकि उसके सभी प्रस्तावक शपथ लिखकर यह संदेश दिए थे कि उसके हस्ताक्षर फर्जी हैं ।     

————-(त्रिलोकी नाथ)————-
मजे की बात यह है कि कथित तौर पर सभी प्रस्तावक प्रत्याशी के आसपास के रिश्तेदार हैं किस तरह कलेक्टर / निर्वाचन अधिकारी सूरत ने यह समझने का भी प्रयास नहीं किया की प्रत्याशी के प्रस्तावक अगर कह रहे हैं कि उनके हस्ताक्षर नहीं है तो उन्हें सामने बुलाया जाना चाहिए और अगर नहीं आ रहे हैं तो वह कहां गायब हैं..? किन परिस्थितियों में है..? निर्वाचन अधिकारी सूरत में यह भी विचार नहीं किया की जो एक सरकारी प्रत्याशी है यानी “इनमें से कोई नहीं”( “नोटा”) नाम का प्रत्याशी है उसके मामले में क्या निर्णय लेना चाहिए अथवा उच्च अधिकारियों से मार्गदर्शन लेना चाहिए…? क्योंकि अगर वोट पढ़ते तो हो सकता है दलाल से ज्यादा वोट नोटा को पड़ जाते। आखिर जनता है उसका क्या, उसने शहडोल के सोहागपुर विधानसभा क्षेत्र में शबनम मौसी को गौरव के साथ विधायक बनाकर विधानसभा भेजा था। यह भी एक अनुभव रहा।
परिस्थितियों चाहे जो भी रही हो परिणाम यह रहा की नई लोकसभा का नया प्रत्याशी सूरत का दलाल सदस्य बनकर आ गया है। स्वाभाविक है की सब जोड़-तोड़ और जन-भावनाओं का मजाक उड़ाते हुए लोकतंत्र को कुचलते हुए अपने पक्ष में चुनाव परिणाम कैसे लाया जाए यह भाजपा की रणनीति और भारत के भविष्य का भी परिणाम के रूप में सामने आया है।
तो माननीय दलाल को औपचारिक बधाई देते हुए अब दूसरे चरण के चुनाव की चर्चा करते हैं

इसके पहले पहले चरण 19 अप्रैल पर जो कम मतदान हुआ वह भी कुछ कहता बताता संकेत दे रहा है.. और अगर उसकी संकेत की भाषा को सही समझा जाए या भाजपाअगर सही समझ रही है तो भारत में ध्रुवीकरण की भाषा जो उनकी पहचान है उसका उन्होंने खुलकर प्रयोग करना चालू कर दिया है…
ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो पहले चरण के पूर्व में ही कांग्रेस पार्टी की घोषणा पत्र का गंभीर अध्ययन करने के बाद मोदी एंड कंपनी ने उनके घोषणा पत्र को मुस्लिम लीग की घोषणा पत्र के रूप में प्रचारित किया। बजाएभाजपा अपने घोषणा पत्र की तारीफ करने के..?
और इस तरह है कांग्रेस के घोषणा पत्र का प्रचार मुद्दा का विषय बना… पहले चरण के मतदान प्रतिशत के अनुमान को लगाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और धार्मिक कट्टरता को झूठ की मशीन के साथ जनता में परोसने का काम चालू हुआ… खुद नरेंद्र मोदी के मुखारविंद से यह उनका शुभ काम चालू हुआ था । जो मुस्लिम लीग से चालू होकर मछली और मंगलसूत्र तक यानी महिलाओं की गिरेबान तक जा पहुंचा..
किंतु जैसे ही मतदान प्रतिशत घटा उन्होंने अपने सूत्रों के हिसाब से महिलाओं के गले के मंगलसूत्र को निशाना बना दिया। झूठ और सांप्रदायिकता की चाशनी में मंगलसूत्र मे़ सोना लुट जाने व रहने की गुंजाइश को देखना चालू किया गया। यह अलग बात है

जैसा की जय राम रमेश ने नरेंद्र मोदी के झूठ का पर्दाफाश करते हुए एक ग्राफ प्रस्तुत किया है जिसमें उन्होंने कहा है की रिपोर्ट बताती है की पिछले 10 वर्ष में इस अराजक व्यवस्था में आम-आदमी सोना यानी गोल्ड कारी नीतियों के तहत “गोल्ड-लोन” के जरिए एक लाख करोड रुपए से ज्यादा भी कर्ज में फंस गया है।
हम अक्सर अखबारों में देखते हैं की अखबार के पन्ने गोल्ड लोन में डूब चुके सोना की नीलामी के जरिए बैंक अपना धन वसूल कर रहे होते हैं। जो अपने आप में इस बात का पोल खोलता है की आम जनता को पैसे की कितनी जबरदस्त आवश्यकता है और सरकारी नीतियों में सरकारी कर्ज में उसे यह पैसा नहीं मिल रहा है तो वह बैंक की नीति के तहत “गोल्ड-लोन” में जोखिम उठाकर अपना सोना नीलामी करवा रहे हैं.. अगर वह सीधे बेचते तो शायद उन्हें ज्यादा पैसा मिलता..?
चुंकि आदिवासी क्षेत्र शहडोल में हम रहते हैं जहां संविधान की पांचवी अनुसूची के संरक्षण के चलते महाजनी प्रथा को प्रतिबंधित के जरिए सूदखोरों पर लगाम लगाने का काम कानूनी तौर पर हुआ है।
किंतु ना तो लगाम लग पाया है बल्कि सूदखोरी में काला बाजार का बहुत बड़ा बाजार फैल गया है जिसमें आम आदमी फंस कर रह जाता है। नरोजाबाद का आदिवासी केवल सिंह हो या शहडोल में अन्य जगह सूदखोरी भ्रष्टाचारियों को भुगतान के उसकी पहले शर्त होती है। सूदखोरी के कई प्रकरण पुलिस के पास आए भी लेकिन पुलिस ने उसे पर कोई कार्यवाही नहीं की बल्कि उसे दबाने का काम किया… यह देखा गया है अब गोल्ड-लोन अथवा फाइनेंस कंपनियों के जरिए पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में सूदखोरी का अप्रत्यक्ष खुला लाइसेंस कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने दे रखा है।यह अलग बात है की यही काम बैंकिंग कंपनी बेहतरीन तरीके से कर सकती थी कम ब्याज दरों पर उसे पर कोई नियंत्रण नहीं हुआ है।
तो अपन देख रहे थे की 1 लाख करोड रुपए से ज्यादा का कारोबार गोल्ड-लोन का सोना गिरवी रखकर कर्ज बांटा गया है प्रधानमंत्री की बात माने तो उनके द्वारा प्रचारित “लोकप्रिय मुद्रा-लोन” इसका आधा भी नहीं है… यह बात भी प्रधानमंत्री की माने की इलेक्टोरल बांड सामने आया तो पता चला कि पैसा कैसे आता जाता है…. कह सकते हैं की गोल्ड-लोन सामने आया तो पता चला कि सिर्फ कानूनी तौर पर एक लाख करोड रुपए से ज्यादा का ट्रांजैक्शन कैसे हो रहा है…? और आम आदमी किस बुरी तरह से कर्ज के जाल में फंस गया है और यह पूरी परिस्थितियों नोटबंदी के बाद भयानक तौर तरीके पर सामने आई हैं। इस भूमिका समझना चाहिए…
अब समझ ले की इसी सोने को जब मंगलसूत्र में लगाया जाता है तो “नरेंद्रमोदी ” का यह कहना है कि कांग्रेस घोषणा पत्र में कहती है कि वह लोगों का एक्सरे कराएगी और देखेगी की कहां-कहां सोना है और अगर मंगलसूत्र में भी सोना है तो वह उसे भी ले लेगी… यह अलग बात है कि कांग्रेस ने ऐसा कोई बात घोषणा पत्र में नहीं लिखा है।
फिर भी “नरेंद्रमोदी ” अगर मंगलसूत्र की बात कही है तो समझगे की मंगलसूत्र हिंदुओं में सुहागिन की एक पहचान है। और यदि पति खत्म हो जाता है तब वही मंगलसूत्र उसके स्त्री धन के रूप में परिवार पोषण या व्यक्तिगत जीवन में काम में आता है। लेकिन मुसलमान में मंगलसूत्र नहीं पहना जाता, स्त्री और पुरुष के संबंध में यह भावनात्मक रिश्ता हिंदुओं के लिए पवित्रम आधार है। किंतु मुसलमान के संबंध में तीन तलाक पुरुषवादी समाज का हक रहा है। वहां पर यह स्त्री के शोषण के रूप में कानून दुरुपयोग होने के कारण रद्द कर दिया गया है। यह काम भाजपा सरकार में ही हुआ है।
जिसमें सुधार की गुंजाइश एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में जरूरत थी। किंतु वह मुसलमान पुरुषों के लिए स्त्री-पुरुष संबंध में भावनात्मक मुद्दा था; यहां पर उल्लेख करने का उद्देश्य सिर्फ भावनात्मक पक्ष की गंभीरता को किस प्रकार से भाजपा वोट के हथियार के रूप में उपयोग करती है, यह देखा गया है। उसे अच्छा या बुरा नहीं बताया गया है।सिर्फ समझने की दृष्टिकोण से यहां उसे उल्लेखित किया गया है।
बहरहाल अब समझना चाहिए हिंदू महिलाओं का मंगलसूत्र समझा जा सकता है, मुसलमान के लिए कानून समाज सुधार के दृष्टिकोण सेप्रतिबंधित हो चुका तीन-तलाक का महत्व समझा जा सकता है।

किंतु मणिपुर में जो महिलाएं निर्वस्त्र जुलूस निकालकर अन्याय हुआ वे भारत की नागरिकता में न्याय की मांग करती रही हैं उनके लिए ना तो मंगलसूत्र का मायने हैं और ना ही तीन तलाक का कोई अर्थ है।इसके बावजूद भी वहां हिंसा लगातार है दैनिक जनसत्ता में प्रकाशिततालिका के अनुसारमणिपुर में 82% के करीब वोटिंग हुई है उन्होंने घोषणा भी कर दी थी कि वे चुनाव में भाग नहीं लेंगे। क्योंकि उनके साथ न्याय नहीं हुआ है.., बावजूद इसके की सूरत में भाजपा का प्रत्याशी माननीय दलाल निर्विरोध निर्वाचित हो जाते हैं, मणिपुर में 82% से ज्यादा वोटिंग हुई है परिणाम इस बात की घोषणा करेंगे की वोटिंग किसके कारण ज्यादा हुई अगर वहां पर भाजपा पक्ष जीत जाता है तो यह उसे भाजपा की लोकप्रियता कहलाएगी..? जो सूरत में निर्विरोध किसी दलाल को लोकसभा में सदस्य के रूप में निर्वाचित कर देते हैं. और हिंसाग्रस्त क्षेत्र में उनके समर्थन पर कोई प्रत्याशी चुनाव जीत जाता है ऐसे में न्यायपालिका का हाल का वह निर्णय कटघरे में खड़ा हो जाता है जिसमें कहा गया है इईवीएम पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए।
इसलिए भी जरूरी है कि 82% वोटिंग के बाद वहां पर भारतीय जनता पार्टी अपने समर्थक को पराजित होता देखे और देखना भी चाहिए। नहीं तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक साबित होगा। क्योंकि वहां निर्वस्त्र महिलाएं, किसी राष्ट्रभक्ति सैनिक की निर्वस्त्र कर दी गई पत्नी का गुस्सा भी अगर प्रमाणित नहीं होता है तो ऐसा लोकतंत्र का बने रहना देश के लिए बेहद खतरनाक होगा.…. क्यों नहीं समझना चाहिए।
फिर चुनाव की क्या आवश्यकता है गुजरात के सूरत में जो मॉडल एक निर्वाचित प्रतिनिधि का प्रस्तुत किया गया है भाजपा के द्वारा वही मॉडल भविष्य में हर जगह काम आ सकता है। यह अलग बात है कि उसका स्वरूप अकेले स्वयं को निर्विरोध घोषित कर लेने का हो अथवा शहडोल जैसे लोकसभा क्षेत्र में प्रतिद्वंदी लगभग प्रत्याशी-हीन प्रतियोगिता में मतदान पूर्व प्रमाणित विजेता की घोषणा भी मॉडल बन सकता है। वैसे भी गृहमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी एंड कंपनी के प्रमुख घटक अमित शाह ने चुनाव पूर्व ही कह दिये थे कि कांग्रेस पार्टी के बूथस्तर के कार्यकर्ता को अंग वस्त्र डालकर भाजपा में शामिल करना चाहिए।
तीसरे चरण का मतदान आगे 7 मइ होगा तब तक हमें ऐसे ही मनोरंजन करते रहना चाहिए.. देश का जो होगा सो होगा और जो भी होगा वह राम-राज्य ही होगा… तो इस पर चर्चा हम आगे भी करेंगे…

 

 

व्यक्तिगत रूप से स्वयं नरेंद्र मोदी जी के लिए मंगलसूत्र इसलिए मायने नहीं रखना क्योंकि उन्होंने अपनी व्यहता पत्नी को पत्नी का दर्जा तो देते हैं किंतु उसके हक और हुकुक जो दिखाने वाला सत्य है जो प्रधानमंत्री आवास में पत्नी के रूप में होना चाहिए वह इसलिए नहीं है क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी का अघोषित त्याग कर दिया । यह उसी प्रकार का त्याग है जैसे तीन तलाक बोलकर के किसी मुस्लिम पत्नी को मुस्लिम पुरुष द्वारा कर दिया जाता रहा.. ऐसा समझा जा सकता है.. किंतु हिंदू होने के कारण उन्होंने तलाक नहीं दिया.; किंतु उन्हें छोड़ा भी नहीं। इसे उनकी भाषा में त्याग की महानता के रूप में गढ़ा गया है। किंतु इससे उनकी पत्नी श्रीमती जसोदाबेन जो उनके नाम का मंगलसूत्र पहनते हैं वह उसे पर फंस कर रह गई। ऐसा भी समझा जा सकता है


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