
वैसे तो शहडोल अनुसूचित जनजाति क्षेत्र में यह बताने के लिए स्वयं महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने लालपुर मैं आकर घोषणा की थी की इस क्षेत्र में संविधान की पांचवी अनुसूची के अंतर्गत विशेष प्रावधान पेसा एक्ट लागू कर दिया गया है किंतु जमीनी धरातल में उतरने में अभी इस वर्षों लगेंगे क्योंकि अफसर शाही इसे मानने को तैयार नहीं है । हालांकि शायद यह बात राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू को भी मालूम था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने जिस पेसा एक्ट को 1 साल पहले लागू किया था उसकी दोबारा वह स्मरण पत्र के रूप में घोषणा करने आई थी।
दो-दो बार घोषणा होने के बावजूद भी शहडोल के विशेष कर आदिवासी विभाग में कानून व्यवस्था कैसे जिंदा रहती है इसकी एक मिसाल हाई कोर्ट के इस आदेश से साबित होती है। आदिवासी विकास शहडोल में स्थापित माफिया का राम राज्य के कारण अंततः उच्च न्यायालय जबलपुर ने प्रिंसिपल सेक्रेटरी को व्यक्तिगत रूप दोषी ठहराते हुएसे ₹5000 जुर्माना अदा करने का आदेश पारित किया है ।
बताया जाता है डब्लू.पी. याचिका 5136 में भगवान दास बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य के मामले में इस आशय का आदेश पारित किया गया है। जिसमें कहा गया है की ₹5000 की लागत की भुगतान की अधीन राशि जमा करना होगा। उच्च न्यायालय कानूनी सेवा समिति और गैर अनुपालन के लिए प्रतिवादी नंबर 1 से व्यक्तिगत रूप से वसूली जाएगी। उच्च न्यायालय के आदेशों का विशेष सरकारी खजाने में डेबिट नहीं किया जाना चाहिए। स्पष्ट किया गया है की लागत व्यक्तिगत वेतन खाते से जमा की जाएगी। प्रतिवादी नंबर 1 उसके अकाउंट पर चेक के माध्यम से 10 दिन के अंदर यह राशि जमा करें।
इसके बाद मध्य प्रदेश आदिम जाति कल्याण विभाग में हड़कंप मच गया क्योंकि जो अपराध शहडोल के आदिवासी विभाग ने अपने माफिया राम राज्य के दौरान सहजता से करते चले आ रहे थे, अंतत आदतन उसका भुगतान प्रिंसिपल सेक्रेटरी को हाई कोर्ट के आदेश से दंडित होने के रूप में मिला।
दर असल शहडोल में आदिवासी विभाग में भ्रष्टाचार अपने चरम पर है उसकी चरमता इस स्तर पर है कि शहडोल से लेकर भोपाल तक सिर्फ भ्रष्टाचार की पुलिया ही सबका बेड़ा पार लगाती रही है। हालात इतने बदतर हो गए थे कि एक तृतीय वर्ग कर्मचारी सहायक आयुक्त बनाकर के करोड़ों रुपए का आहरण कलेक्टर के संरक्षण में करता रहा और बकायदे पूरा आदिवासी विभाग भ्रष्टाचार की जांच जबकि लंबित है उसे क्लीन चिट दी गई और वह रिटायर होकर के आराम की जिंदगी बसर कर रहा है। ऐसा बताया जाता है। इसी प्रकार के कई भ्रष्टाचार शहडोल में आम हो चुके थे और हालात इतने भी गंदे हो गए की आदिवासी विभाग शहडोल में जो भी आता है वह भ्रष्टाचार के लक्ष्य को रखकर ही काम करने आता है। जिसका परिणाम यहां तक रहा कि राजनीतिक सम्मेलन आदिवासियों के नाम पर सम्मेलन होते हैं और करोड़ों रुपए आदिवासियों के नाम पर भ्रष्टाचार के बंदर बांट हो जाते हैं ।
सहायक आयुक्त कार्यालय में भ्रष्टाचार के बाबू मील की पत्थर की तरह गड़े हुए हैं। जब तक कि वह रिटायर्ड नहीं हो जाते एक दीमक की तरह आदिवासी विभाग को खाते रहते हैं।
प्रमुख सचिव हुए दंडित, शहडोल आदिवासी विभाग के लापरवाही से
बहरहाल कहानी बहुत लंबी है इसे किस्तों में बताई जाएगी समझ लें कि उच्च न्यायालय का ₹5000 व्यक्तिगत रूप से दंडित करने का आदेश किस मामले में प्रिंसिपल सेक्रेटरी के ऊपर कहर बनकर टूटा है ।बताया जाता है की आदिवासी विभाग के अधीन केशवाही के एक स्कूल में अनुकंपा नियुक्ति के मामले पर भगवान दास को बुढार का बीइओ और सहायक आयुक्त तथा उपायुक्त आदिवासी विभाग शहडोल अपने पुराने ढर्रे पर ही काम कर रहे थे जिसके जल में भ्रष्टाचार की खुली मांग थी और अनुकंपा नियुक्ति के मामले में भगवान दास को राहत नहीं मिल रही थी। जिस मामले में एक आदेश उच्च न्यायालय ने पारित किया ताकि भगवान दास को राहत मिल सके। किंतु उसे मामले में बजाए गंभीरता बरतने के, पुराने ढर्रे पर ही प्रिंसिपल, खंड शिक्षा अधिकारी, सहायक आयुक्त और उपायुक्त आदिवासी विभाग उच्च न्यायालय के आदेश को ठेंगा दिखा रहे थे।
इस मामले की गंभीरता को अचानक तब दिखाई जब हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल ने देखा तो उन्होंने शहडोल के लिए हुई घटनाओं और आदेश की अवधारणा के चलते प्रिंसिपल सेक्रेटरी आदिवासी विभाग भोपाल को ₹5000 के दंड से दंडित किया तथा स्पष्ट आदेश भी पारित किया यह राशि उनके वेतन से भुगतान की जाएगी। अचानक आई इस आपदा से प्रिंसिपल सेक्रेटरी घबरा गए और उन्होंने शहडोल के पूरे आदिवासी विभाग को दिनभर भोपाल में धूप में बाहर खड़ा कर रखा और अपनी नाराजगी जाहिर की। कि शहडोल आदिवासी विभाग की मूर्खता के कारण उनके वेतन से ₹5000 का दंड से उन्हें दंडित होना पड़ा है। कहते हैं सुधांशु वर्मा नाम का शहडोल में काम कर चुका एक सहायक आयुक्त मध्यस्थता किया और मामले को सरल बनाने के लिए काम किया। तब मामला कुछ ठंडा हुआ।
किंतु यह तय है कि शहडोल आदिवासी विभाग में भ्रष्टाचार का जो राम राज्य चल रहा है उसकी कोई मिसाल मध्य प्रदेश में शायद ही मिले। यह जानते हुए की स्वयं राष्ट्रपति शहडोल में आकर आदिवासी विभाग के मामले पर गंभीरता से कार्यपाई करने के लिए अप्रत्यक्ष निर्देश दी थी ताकि कोई भी व्यक्ति के साथ अन्याय ना हो किंतु भ्रष्टाचार राष्ट्रपति से ऊपर होता है..? शहडोल आदिवासी विभाग ने इको प्रमाणित किया है।
वैसे भी शहडोल प्रशासन में अक्सर देखा गया है कि हाई कोर्ट के मामले में जो भी आदेश हैं वह कचरे में डाल दिए जाते हैं ऐसा ही एक आदेश 2012 में श्रवण कुमार बनाम कलेक्टर वगैरा का मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में पारित हुआ था जो आज दिनांक तक यानी करीब 12 साल बाद भी अपने आदेश के अनुसार उसका अमल नहीं किया गया है। जिस कारण से पूरा मोहन राम मंदिर ट्रस्ट लूटपाट और भ्रष्टाचार तथा बंदर बांट कर जबरदस्त अड्डा बना हुआ है। और ट्रस्ट की पूरी संपत्ति खुर्द बुर्द हो रही है किंतु प्रशासन इस मामले में कोई रुचि लेता दिखाई नहीं देता। एक एसडीएम ने तो यहां तक कह दिया कि उन्हें हाई कोर्ट का आदेश अंग्रेजी में है इसलिए समझ में नहीं आता इसलिए वह आदेश का क्रियान्वयन कर पाने में अक्षम है।
अब देखना होगा कि जब प्रिंसिपल सेक्रेटरी को हाईकोर्ट ने अपनी टारगेट में लिया है तो भगवान दास को कितनी राहत मिलती है..?वास्तव में तरीका भी यही है जब आदिवासी क्षेत्र लूटपाट और भ्रष्टाचार का माफिया रामराज बन जाए ऐसी स्थिति में मध्य प्रदेश के जिम्मेदार उच्च अधिकारियों को खिलाफ ही व्यक्तिगत रूप से दंड पारित करना चाहिए.. आदिवासी विभाग के इस आदेश से विभागीय कर्मचारियों में भारी सनसनी मची हुई है। तो एक बड़ा वर्ग आदेश से काफी खुश हुआ है की देर से ही सही भगवान के घर में अंधेर नहीं है न्याय तो भगवान दास को मिला ही। यह अलग बात है कि भगवान राम को कब न्याय मिलता है…?

