“प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् “….शहडोल में दम तोड़ता हुआ अर्थशास्त्र ( त्रिलोकी नाथ)-1

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गूगल पंडित जी के अनुसार1890 में अल्फ्रेड मार्शल द्वारा पूर्ति और मांग का सिद्धांत दिया गया था। जो देश समाज और परिवार की अर्थशास्त्र में अहम भूमिका अदा करता है और इसी सिद्धांत को देश दुनिया मानती है
आपूर्ति और मांग का नियम यह सिद्धांत है कि वस्तु की कीमतें आपूर्ति और मांग के बीच संबंध से निर्धारित होती हैं । यदि किसी वस्तु या सेवा की आपूर्ति उसकी मांग से अधिक हो जाती है, तो कीमतें गिर जाएंगी। यदि मांग आपूर्ति से अधिक हो गई, तो कीमतें बढ़ेंगी।
शहडोल नगर में ऐसा नहीं है यहां दुनिया उल्टी चलती है क्योंकि यहां पर संपूर्ण बौद्धिक समाज चाहे वह कार्यपालिका का  और बौद्धिक अधिकारी वर्ग हो या फिर विधायिका का पार्षद से लेकर के संसद तक वे सब इस अर्थशास्त्र को खारिज करते हैं. जिसको प्रमाणित करता है की शहडोल में रेत की आपूर्ति प्रकृति ने भरपूर मात्रा में कर रखी है यानी कहीं भी पानी की तरह रेत मिल जाता है लेकिन इसकी कीमतें आसमान पर है क्योंकि कालाबाजार ने सिस्टम के साथ मिलकर के इस भरपूर मात्रा में उपलब्ध रेत क अकाल घोषित कर दिया है. इसीलिए उद्योग से निर्माण होने वाली गिट्टी की कीमत सस्ती और रेट उससे दोगुनी महंगी मिल रही है यही नहीं कालाबाजार और माफियाओं की सफलता है जल्द ही बरसात आ जाएगी पिछले 8 माह से रेत का पड़ा हुआ अकाल रेत को और महंगा कर देगा।लेकिन आदिवासी विशेष क्षेत्रशहडोल जो भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में अनुसूचित है यानी सुरक्षित है अर्थशास्त्र के सिद्धांतों की सुरक्षा नहीं करता है यहां पर अर्थशास्त्र के सिद्धांत की हत्या होने लगती है। हालांकि भारत की आदिवासी समाज से आने वाली राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपति मुर्मू ने शहडोल में आकर इसकी घोषणा पेसा एक्ट के रूप में सबको बता कर गई है लेकिन राष्ट्रपति जी को क्या कोई सुन रहा है…या उन्हें भी शहडोल के आदिवासियों की तरह व्यवहार रूप में देखा गया है…?
______(त्रिलोकीनाथ)_______
हम बात कर रहे थे अर्थशास्त्र के जरिए पैदा हुए बड़े-बड़े उद्योगपति बड़े व्यापारिक घराने या ब्यूरोक्रेट्स में बैठे-बैठे बड़े-बड़े पढ़े लिखे विद्वान समाज के लोग जो समान रूप से बौद्धिक होने का अधिकार रखते हैं किंतु वह भी शहडोल में आकर अर्थशास्त्र के इस सामान सिद्धांत के खिलाफ उन हत्यारों के साथ खड़े हो जाते हैं जो अर्थशास्त्र की बुनियाद में बात को घोषित करता है की कर ऐसे लेना चाहिए जैसे फूलों से सुगंध।
किंतु प्राकृतिक संसाधनों से परिपक्व शहडोल जिले में सरकारी नीतियों में ही माफिया तंत्र के विकसित होने का प्रमाण प्रकाशित होता है। तो सबसे सस्ता और सुलभ तथा भारी मात्रा में कहीं भी यदि सामान्य नाला भी बहता है वहां पर रेत का मिल जाना सहज उपलब्ध व्यवस्था है। क्योंकियहां यह प्रकृति उपहार है। स्थानीय निवासियों के लिए। लेकिन सरकारी नीति में इस प्रकार से माफिया तंत्र के रूप में विकसित किया यह सहज उपलब्ध खनिज संसाधन आज सोने के भाव हो गई है।
इसकी सुरक्षा इस कदर बढ़ गई है कि अगर ब्यूरोक्रेट्स को लगे कि इस बैंक के लाकर में रखना चाहिए और उसके पास उपलब्धता है तो वह लाकर में रखकर इसकी सुरक्षा करना चाहता है। इसका कारण यह है की सरकारी नीतियों ने इस खनिज रेत को माफियाओं के लिए एक बड़े विकसित बाजार के रूप में अवसर खोल दियाहै।
तो छोटा सा उदाहरण देखें एक उद्योग की तरह गिट्टी पत्थर के लिए क्रेशर इंडस्ट्री लगाई जाती है और इसके बाद उसे पर रॉयल्टी की तरह तय होती है लेकिन यह दरें कितनी कम है कि वह सहज रूप से एकत्र करने वाली रेत की रॉयल्टी की दरें कम है। और रेत पर कोई उद्योग नहीं लगता है उसकी दरे बहुत ज्यादा है। जिसका परिणाम यह है कि जो उद्योग से निकलने वाला उत्पादन है  पत्थर वह 200 घन फिट के लिए करीब ₹7000 में आम बाजार में बिकता है लेकिन यही खनिज रेत आम बाजार में जाकर समान रूप से 11000 से ₹12000 में मिलने लगता है।अगर बरसात के दौरान यह 15 से 18000 रुपए मिले तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए..
जब इसका कारण हमने खनिज अधिकारी से जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि गिट्टी की रॉयल्टी की दरें कम है। तो सहज सवाल उठता है फिर रॉयल्टी की निर्धारण जब माफिया और शासन और प्रशासन के प्रतिनिधियों को मिलकर करना है तो 10 गुना क्यों नहीं बढ़ा देती…? शासन को भी पैसा मिलेगा, काला बाजार में भी माफिया तंत्र को जबरदस्त पैसा मिलेगा.. शहडोल में आम आदमी को गत 8 माह से आसपास की  खदानों से अभी भी रेत सुलभ नहीं है। यानी पानी भरपूर सामने रखा हुआ है लेकिन हमारा पुलिस और प्रशासन उसे सरकारी मीट की चौकीदारी कर रहा है जो यह कहता है की पानी नहीं है तो यह मान कर चलिए की पानी नहीं और अगर पानी पीना है उसे100-200 किलोमीटर दूर से पानी लेकर आईए और अपनी प्यास बुझाइए।
ऐसा नहीं है की दशहरा के वक्त एक उपभोक्ता के रूप में मैं शहडोल के कलेक्टर वंदना वद्य को आवेदन देकर दो ट्रक रेत की मांग की थी तब उन्होंने मुझे आश्वासन दिया था कि खनिज अधिकारी से मिल लीजिए वह जो निर्देश देंगे आपको रेत मिल जाएगी। तब बहना यह था कि टेंडर शहडोल में रेत के नहीं हुए हैं। बाद में टेंडर हो गए लेकिन शहडोल नगर के 30 40 किलोमीटर के आसपास रेप खदानों को कलेक्टर ने चालू नहीं कराया परिणाम स्वरूप आसपास की खदानों से सिर्फ माफिया के जरिए ही रेत लिया जा सकता है। अब बरसात लग जाएगी तो भी रेत मिलना मुश्किल हो जाएगा या फिर 100 किलोमीटर दूर जहां रेत भंडारण करके रखा गया है वहां से महंगी तय की गई रेट पर  शहडोल वालों को मिलेगा यह पारदर्शी कुशल भारतीय जनता पार्टी के रामराज्य को प्रमाणित करता है।
तब भी चाहे प्रकृति मुफ्त में खनिज पदार्थ उपलब्ध करावे तो फिर एक दिखने वाला कानूनी अधिकार किंतु पूर्णतया अन्यायपूर्ण व्यवस्था विकसित की गई है लेकिन शहडोल की मरी हुई राजनीति अब सड़ने लगी है तो जरिए माफिया के हिस्से में बहुत आयत रेत का ठेका क्यों नहीं दे दिया जाता जब लूटना ही है स्थानीय प्राकृति संसाधन से परिपूर्ण क्षेत्र को तो खुलकर सोना लूटा जाए…यह तय है कि इसका काला धन का बंटवारा यहां के आदिवासी नेताओं के हिस्से में नहीं जाता है.. जूठन को छोड़ दे तो…।
किसने मना किया है जब पुलिस और प्रशासन और कानून आपके जेब में है और आप माफिया के शक्ल के तौर पर शोषण के सिद्धांत को लोकहित और जनहित से परे जाकर निर्धारित करते हैं, जिसमें अर्थशास्त्र का कोई संतुलन ही नहीं होता है। ऐसे में यह भी प्रमाणित होता है की जो पढ़ा लिखा उच्च उच्च अधिकारी वर्ग है वह भी शहडोल में आकर आदिवासियों की तरह ही सोचने लगता है और स्वयं को मानसिक रूप से गुलाम दिखाने का प्रयास करता है अन्यथा कानून में उपलब्ध स्वविवेक इस तरह आत्महत्या नहीं करता जैसे शहडोल में दिखने लगता है। ऐसे में आम आदमियों के लिए तो अपना घर बेचकर अपना समय नष्ट कर मूर्खों की तरह सरकार की नीतियों में पूरे धन मन और तन को नष्ट करना ही लिखा है। तो इसकी खुली घोषणा क्यों नहीं होनी चाहिए।

सहज रूप से उपलब्ध खनिज रेत के हालात इतने गंदे हैं पारदर्शी तरीके से की दो-दो सरकारी कर्मचारियों की खुलेआम रेत के चलते हत्या हो गई।यह अलग बात है कि इन सरकारी कर्मचारियों ने माफिया बनकर के अपने लाभ के लिए काम कर रहे थे या फिर अपने उच्च अधिकारियों के लिए काम कर रहे थे…? या फिर सरकारी सेवक बन करके सरकार की नीतियों की सेवा कर रहे थे…?
क्योंकि एक बात तो तय है की प्रमुख खनिज प्रमुख सचिव खनिज निकुंज श्रीवास्तव ने शहडोल में आकर के पत्रकारों को साफ-साफ बता दिया है कि जब तक आप अपने उच्च अधिकारियों को बात करके और अपनी टीम के साथ रेत की गाड़ियों को पकड़ने के लिए या फिल्ड में नहीं जाते हैं तब तक आप सरकारी काम नहीं कर रहे होते हैं। और ऐसे हालात में अगर आपकी हत्या होती है या कुछ भी होता है उसके लिए आप जिम्मेदार होंगे, ठीक उसी तरह की यात्री अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें….।

इस हालत में यह कह पाना बड़ा मुश्किल है की जो एक करोड रुपए की अधिक तथाकथित घोषणा मुख्यमंत्री ने पुलिस अधिकारी की हत्या के रूप में दिया है अथवा ₹25000 का जो अनुदान पटवारी की हत्या के रूप में दिया गया क्या वह देना भी चाहिए…? अब यह सरकार के उच्च अधिकारियों को ही तय करना है।

और क्यों नहीं देना चाहिए यह भी बड़ा प्रश्न है..? अगर आप लोकहित के विपरीत जाकर के माफिया तंत्र के हितों के लिए या शासन के खजाने में ज्यादा राजस्व भरने के नाम पर स्थानीय खनिज रेत संसाधन को अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के खिलाफ लूट की प्रयोगशाला के रूप में अपनी नीतियां बनाते हैं और उसे नीतियों से आपके पास पैसा भी जमा हो रहा है तो चाहे वह माफिया हित के लिए कम करें या फिर राजस्व हित के लिए काम करें जब फ्री या लूट का धन आ ही रहा है तो ब़टवारा होना चाहिए।
कम से कम शासन और प्रशासन अपने समाज में तो बंटवारा करें… शहडोल की जनता के समाज में तो यह पैसा नसीब में वैसे भी नहीं आना है… जब प्रकृतिदत्त उपहार को आप अर्थशास्त्र के सिद्धांत के खिलाफ नकली बाजार पैदा करते हैं और सहज उपलब्ध रेत को सोने की तरह बेचते हैं उसका कालाबाजारी पैदा करते हैं जो आम आदमी के लिए सिर्फ ब्लैक मार्केट से खरीदने की वस्तु बन जाती है।

ऐसे में काम से कम पुलिस प्रशासन और विधायिका को अपने समाज में दुर्घटना में क्षतिपूर्ति का बंटवारा करना ही चाहिए। फिर यह बात क्यों उठानी चाहिए जो प्रमुख सचिव निकुंज श्रीवास्तव ने कहा कि अगर आप अपने मन से जाते हैं तो आप जिम्मेदार हैं..?
जबकि प्रश्न यह उठाना चाहिए कि अगर सहज रूप से धूप अथवा पानी अथवा खनिज पदार्थ भारी मात्रा में प्रतिपूर्ति हो रही है और उसमें कोई उद्योग भी नहीं करना पड़ रहा है फिर भी आप उसे आम जनता के लिए कीमती बनाकर आम जनता का धन क्यों लूट रहे हैं…?
क्यों स्थानीय निवासियों को सहज रूप से वैधानिक तरीके से रेत उपलब्ध नहीं हो रही है…?
बात अनुभव में आया की शहडोल नगर के आसपास तमाम वैधानिक रेत खदानों को पिछले 8 महीने से बंद करके रखा गया है तो क्या 8 महीने से शहडोल नगर में तमाम निर्माण कार्य बंद हो गए हैं..? या फिर जो भी काम चल रहे हैं वह रीवा अनूपपुर या उमरिया से वैधानिक तरीके से रेत खरीद कर ला रहे हैं…? और यदि नहीं ऐसा हो रहा है आसपास की अवैध खान संचालित हो रहे हैं, तो क्या यह खनिज विभाग की माफिया हित में नीतिगत घोषित तरीके से काम नहीं हो रहा है…..;
ऐसे में यह स्पष्ट दिखता है कि जब तक आप अर्थशास्त्र के सिद्धांतों का पालन नहीं करेंगे तो आप मांग पूर्ति के अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के खिलाफ होते प्रशासन चला रहे होते हैं। कलेक्टर का यह अधिकार होता है कि वह स्थानीय स्थानीय रूप से यदि अकाल पड़ रहा है किसी विषय वस्तु का तो उसे सुरक्षित करके सहज रूप से उपलब्ध करावे। यह काम कलेक्टर भी करते दिखाई नहीं दे रहे हैं। अथवा वह दबाव बनाएं की जो भी ठेकेदार है वह आसपास की खदानों को तत्काल प्रारंभ करें। ताकि आम आदमी को सहज रूप से उपलब्ध रेत को कानूनी तरीके से दिया जा सके। कुछ तो सस्ता पड़ेगा इस महंगाई के युग में। इस सरकारी लूट तंत्र की नीति में रेत की खरीदी किंतु फिलहाल ना शासन का ना प्रशासन का और नाही नेताओं का इस और ध्यान नहीं गया है। या फिर वह दिन के उजाले में उल्लू की तरह आंख बंद किए हुए हैं..?
अनजाने में सब के सब माफिया तंत्र के लिए काम करते दिखाई देते हैं इस पर आश्चर्य ही किया जा सकता है और क्या कह सकते हैं क्योंकि सिफारिश भी अब दम तोड़ने लगी हैं…यदि आप राजनीतिक माफिया तंत्र के हिस्सा नहीं है तो आपको सस्ती रेट नहीं मिल रही है आप बनाए गए सिस्टम में लूट लिए जाने वाले मंत्र नागरिक हैं फिलहाल यही प्रमाणित हो रहा है यही शहडोल का लोकतंत्र है….; प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्…


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