यूपीएससी में भ्रष्टाचार की पूजा को प्रमाणित कर पूजा ने संजय सोनी को इस्तीफा देने के लिए किया मजबूर (त्रिलोकी नाथ)

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AS Puja Khedkar News: UPSC रद्द कर सकता है पूजा खेडकर की उम्मीवारी   पूजा खेड़कर ने आईएएस और यूपीएससी दोनों की धज्जियां उड़ा कर रखती है। और दबाव में आकर के यूपीएससी ट्रेनिंग में भेजे गए पूजा खेडकर को न सिर्फ वापस बुलाना पड़ा बल्कि उनके खिलाफ फिर भी करना पड़ा यूपीएससी पर जो कॉलिख लगी है वह वह पूरी चयन प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर चुकी है की कैसे-कैसे लोग जमीन पर भेजे जा रहे हैं एकमात्र सामान्य आदर्श पद पर यानी कलेक्टर के पद पर इस तरह राज्य प्रशासनिक सेवा के और आईएएस अधिकारी और भारतीय प्रशासनिक सेवा के चयनित लोग में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया है‌क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा यूपीएससी से ही प्रवाहित होने लगी है ऐसा प्रतीत होता है यह अलग बात है इस शीर्ष पद में भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद डॉक्टर संजय सोनी जो यूपीएससी के मुखिया रहे उनका जमीर जिंदा हो गया और उन्होंने इस्तीफा दे दिया है।
2 वर्ष बाद मिशन के बाद धंधा बना पत्रकारिता में मुझे 30 साल हो जाएंगे… इस दौरान कई अधिकारियों से मिलने का भी अवसर लगा शुरुआत में जिन आईएएस अधिकारियों से मेरा पाला पड़ा उसमें गिनती के ही कुछ लोग आईएएस अधिकारी जैसे बर्ताव करते मिले.. उनमें बातों में वजन होता था। कानून के प्रति निष्ठा और कर्तव्य पालन की भावना होती थी। वह लोकतंत्र के प्रति आजादी के सुगंध से भरे होते थे।

दिग्विजय सिंह जब मुख्यमंत्री हुए उन्होंने इनमें से सिलेक्टिव किस्म के आईएएस अधिकारी अपने “मित्र” बनाने चालू कर दिया। वह उनके लिए कार्यपालिका अधिकारी से ज्यादा उनके मित्र होते थे। और आईएएस अधिकारी ऐसी मित्रता को जो मुख्यमंत्री की मित्रता हो उसके प्रति रुचि भी दिखते थे। किंतु जल्दी ही आईएएस अधिकारी कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण पद में बैठने से मरहूम कर दिए जाने लगे । क्योंकि कुछ भी हो गुणवत्ता बौद्धिक पूर्ण उच्च स्तर की होने के कारण वह राजनीतिक लोगों की गुलामी को थोड़ा कम पसंद करते थे ।इसलिए ना रहेगी बांस ना बजे की बांसुरी इस तर्ज पर मध्य प्रदेश शासन में पदोन्नति प्राप्त आईएएस अधिकारी आने लगे। यह लोग घिसे पिटे होते हैं। इसलिए ऐसे अधिकारी मुख्यमंत्री के मित्र से ज्यादा उनके सेवक बनना ज्यादा पसंद करते हैं। दिग्विजय सिंह में जो परंपरा चालू की थी वह यहां तक आज गिरी।
मुझे तब सूर्य प्रताप सिंह परिहार आइ ए एस कलेक्टर शहडोल से काफी कुछ सीखने को मिला। कलेक्टरपंकज अग्रवाल भी उसमें एक थे बदले दौर में आईएएस अधिकारियों ने जो कंप्रोमाइज विधायिका के प्रतिनिधियों के साथ करना सीख लिया था उससे भी हमने सीखा।और पतन का दौरा इस स्तर तक चला गया की पदोन्नति से आए इस में एक ऐसे भी कई अधिकारी मिले जो पद की गरिमा की तिलांजलि दे चुके थे। इसलिए स्पष्ट तौर पर डायरेक्ट आईएएस अधिकारी और पदोन्नति से प्राप्त आईएएस अधिकारियों के कार्य प्रणाली में पारदर्शी गुणवत्ता दिखने लगी। इस प्रकार से हमने उनसे भी व्यवहार करना सीख लिया की किससे मिलना है बात करना है किससे नहीं मिलना है।
हाल के दौर में देखें तो कलेक्टर के पद में रहते हुए एक अतिक्रमण आदेश पारित हो जाने और पूरी तैयारी हो जाने के बाद कलेक्टर पद पर बैठे हुए कोई व्यक्ति तहसीलदार की अतिक्रमण हटाने के कार्यवाही को रोकने के लिए चंद्रलोक वस्त्रालय में जाकर 1 घंटे से ज्यादा खरीदारी करता है यह भी हमने देखा । और फिर प्रशासन की पूरी तैयारी धरी रह जाती है। भ्रष्टाचार की तमाम सीमाओं को पार करते हुए इस के पतन के इस दौर को महसूस किया। इसलिए जब भी कभी खासतौर से इस से मिलना होता है या काम कराना होता है तो पहले तय करना होता है कि गुणवत्ता का यह अधिकारी है ..। क्योंकि अगर उसने ना कर दिया तो भी कोई कारण होगा अन्यथा वह कानून के प्रति समर्पित होता है।
लेकिन जब भी कभी शहडोल के मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में 2012 के हाई कोर्ट के आदेश के पालन करने के संबंध में अधिकारियों से मिलने की स्थिति आती है तो स्पष्ट तौर पर प्रयास करता हूं कि गैर आईएएस अधिकारियों से मुलाकात ना हो। क्योंकि लगभग वे गुलाम होते हैं उनका विल पावर भ्रष्टाचार अथवा अपने आका के लिए तो समर्पित होता है। किंतु कानून सम्मत अच्छे कामों के लिए वह अपने नेताओं का बहाना ले लेते हैं ताकि विवाद से बच सके ।भलाई वह हाई कोर्ट का आदेश ही क्यों ना हो।
इसी कारण 12 वर्ष से हाई कोर्ट जबलपुर का आदेश शहडोल प्रशासनिक व्यवस्था में धक्के खा रहा है। उसका पालन करने की क्षमता अथवा योग्यता सिर्फ आईएएस अधिकारी में ही संभावना के साथ खोजी जा सकती है।
यह अपवाद है की एक कट्टर ईमानदार एसडीम रहे धर्मेंद्र मिश्रा आइएएस ना होते हुए भी वह इस गुणवत्ता को महसूस करते थे। उनकी कार्य प्रणाली में कानून के प्रति समर्पण दिखता था और कानून का मजाक उड़ाने पर वह बहुत नाराज भी हो जाते थे। दुर्भाग्य है की कम समय में उन्होंने सर्विस से इस्तीफा दे दिया क्योंकि वह बीमारी से ग्रसित हो गए थे और उनका निधन हो गया। ऐसे व्यक्तियों को अवसर क्यों नहीं देता है…?
बहरहाल मोहनराम मंदिर मामले में धर्मेंद्र मिश्रा ने एसडीएम रहते हुए 2019 में एक आदेश पारित किया था ताकि हाईकोर्ट के आदेश 2012 का पालन हो सके। ठीक इसी प्रकार के आदेश का स्मरण पत्र कहना चाहिए शहडोल एसडीएम अरविंद शाह जो एक आईएएस अधिकारी हैं उन्होंने भी पारित किया है कि 13 जुलाई को तीन दिन के अंदर मंदिर का समस्त प्रभार हाई कोर्ट के आदेश के अनुरूप स्वतंत्र समिति को सौंप दिया जाए । यह अलग बात है की आदेश जैसे 2012 में फेल हो गया 2019 में फेल हो गया वैसे अभी फेल होता साबित दिख रहा है। ऐसा नहीं है की तत्कालीन एसडीएमरहे आईएएस अधिकारीलोकेश कुमार जांगिड़ ने प्रयास नहीं किया था किंतु उन्होंने आदेश पारित नहीं किया था उन्हें अवसर मिलता इसके पहले भ्रष्ट राजनीति ने उन्हें शहडोल से स्थानांतरित कर दिया।
मोहन राम मंदिर के मामले में हाई कोर्ट के आदेश पालन का मामला बटुआ का भाग है जो अधिकारियों की योग्यता क्षमता और उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता को प्रदर्शित करता है
मैंने कमिश्नर रहे राजीव कुमार शर्मा से एक बार कहा था की आईएएस अधिकारी और पदोन्नति से आईएएस अधिकारियों में गुणवत्ता और भ्रष्टाचार की संभावना में क्या अंतर आप देखते हैं उन्होंने कहा की भ्रष्टाचार में दंडित होने वाले जोशी दंपति आइएएस थे। इसलिए इस नजर से देखना ठीक नहीं है

पूजा खेड़कर ने आईएएस और यूपीएससी दोनों की धज्जियां उड़ा कर रखती है। और दबाव में आकर के यूपीएससी ट्रेनिंग में भेजे गए पूजा खेडकर को न सिर्फ वापस बुलाना पड़ा बल्कि उनके खिलाफ फिर भी करना पड़ा यूपीएससी पर जो कॉलिख लगी है वह वह पूरी चयन प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर चुकी है की कैसे-कैसे लोग जमीन पर

Pune IAS Pooja Khedkar: ट्रेनी IAS पूजा पर UPSC ने दर्ज कराई FIR

 भेजे जा रहे हैं एकमात्र सामान्य आदर्श पद पर यानी कलेक्टर के पद पर इस तरह राज्य प्रशासनिक सेवा के और आईएएस अधिकारी और भारतीय प्रशासनिक सेवा के चयनित लोग में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया है‌
         क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगा यूपीएससी से ही प्रवाहित होने लगी है ऐसा प्रतीत होता है यह अलग बात है इस शीर्ष पद में भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद डॉक्टर संजय सोनी जो यूपीएससी के मुखिया रहे उनका जमीर जिंदा हो गया और उन्होंने इस्तीफा दे दिया है।
हालांकि वह विधायिका के शिक्षा मंत्रालय को देखने वाले धर्मेंद्र प्रधान की तरह इस्तीफा नहीं भी देते तो कुछ बिगड़ता वाला नहीं था जैसे नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के अपने मध्य प्रदेश के जोशी जी ने अभी तक इस्तीफा नहीं दिया है और सुप्रीम कोर्ट खुद 24 लाख विद्यार्थियों के मामले में धड़ाधड़ निर्देश दे रहा है ।जोशी जी को या    धर्मेंद्र प्रधान को आदर्श बनाकर डॉक्टर संजय सोनी ने उसे पद पर चिपके रहने का जोखिम क्यों नहीं उठाया इसका अर्थ यह है कि यूपीएससी में अथवा इस समाज में नैतिकता और लोकतंत्र की प्रति गुणवत्ता की पहचान की लालच अभी भी जिंदा है बहरहाल ऊपर क्या होता है हम आदिवासी क्षेत्र के लोग उतना नहीं जान पाए क्योंकि हम आदिवासी स्टार के पत्रकार हैं पर जब जमीन में हाई कोर्ट के आदेश का पालन कर पाने में अगर आईएएस अधिकारी फेल हो जाते हैं तब पूजा खेड़कर आइकन बन जाती है की क्या वह भी इसी रास्ते से चलकर इस नौकरी में अपनी संभावना ढूंढ रहे हैं अन्यथा कोई कारण नहीं इतना सुरक्षित भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी उसका विल पावर लोकतंत्र को जिंदा रखने में कानून के प्रति उदासीन अथवा मृत प्राय: क्यों दिखने लगता है जबकि प्रत्येक फाइल एक आईएएस अधिकारी के लिए उसकी पहचान को प्रमाणित करता है ऐसा हम आदिवासी क्षेत्र के पत्रकार सोचते हैं और उसका कर्म उसकी कर प्रणाली उसकी कर्तव्य निष्ठा कानून के प्रति जब गुणवत्ता पूर्ण तरीके से समाधान के रास्ते निकलते हैं तब वह यह भी प्रमाणित कर रहे होते हैं कि हां वह यूपीएससी से चयनित एक ईमानदार योग्य व्यक्ति हैं जिन्हें इस पद पर होना चाहिए अन्यथा चंद्रलोक वस्त्रालय में उधर का कपड़ा खरीद कर तहसीलदार के आदेश के अतिक्रमण को मौखिक तौर पर रोक देना और आज तक अतिक्रमण न हटाया जाना पदाधिकारी की शैक्षणिक योग्यता को भी प्रमाणित करता है क्योंकि इस अधिकारी का दोहरा चरित्र नहीं होता उसकी निष्ठा लोकतंत्र के और कानून के प्रति होती देखनी चाहिए ऐसे अन्य कई मामले हैं रिलायंस कंपनी द्वारा शहडोल से बिना अनुबंध के गैस निकाल करके बाहर बेचना एक आईएएस अधिकारी के योग्यता पर पृष्ठ चिन्ह खड़ा करता है ओरिएंट पेपर मिल के मामले में सूर्य प्रताप सिंह परिहार ने कार्यवाही करके यही साबित किया था कि वह आईएएस अधिकारी हैं और उनको प्रभावित करना चाहे वह आर्थिक भ्रष्टाचार का मामला हो अथवा राजनीतिक भ्रष्टाचार का मामला हो बहुत मुश्किल कानून से प्रभावित किया जा सकता है‌ किंतु सीधे तौर पर उनकी निष्ठा लोकतंत्र के प्रति समर्पित होती दिखती रही ।
इसको उन्होंने प्रमाणित भी किया इसी वजह से करीब 300 करोड रुपए का जलकर ओरिएंट पेपर मिल के ऊपर 3 दसक बाद लागू हुआ, यही हाल रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी जी के साथ भी होना ही होना है। किंतु इसे कौन आईएएस अधिकारी प्रमाणित करेगा यह उसकी योग्यता पर निश्चित होगा कि वह पूजा खेड़कर की तरह शॉर्टकट तरीके से यूपीएससी से चयनित होकर आया है अथवा उसकी अपनी योग्यता भी कुछ थी…?
बहरहाल पूजा खेड़कर ने पूरी यूपीएससी पर और आइएएस समाज पर गहरी कालिक पोती है और इस कालीख को लगाने वाले दागदार डॉक्टर संजय सोनी के यूपीएससी की पद से इस्तीफा देने से यह दाग मिटने वाला नहीं है। बल्कि संपूर्ण इसकी नई पीढ़ी पर वह प्रश्न चिन्ह खड़ा करके चली गई है । अब उसे नई पीढ़ी को खुद साबित करना होगा नैतिक तौर पर कानून के प्रति कर्तव्य निष्ट होकर कि नहीं उसने ईमानदारी से शिक्षा ग्रहण करके पात्रता हासिल की है और वही आईएएस अधिकारी चमकते हुए सितारे की तरह चिन्हित होगा जो जमीन पर अपने कार्यपालिका कर्तव्य निष्ठा से लोकहित में कानून का पालन करने में समर्पित दिखेगा।
शहडोल आदिवासी बहुल क्षेत्र में हालांकि इस बात की संभावना कम है फिर भी आईएएस अधिकारी में कुछ तो अलग होता है जो उन्हें सुपर बनता है। किंतु उनकी सहजता सरलता और कर्तव्य निष्ठा उन्हें वह पहचान देते हैं जिससे हमारा यूपीएससी के लिए गर्व से देखने के अवसर प्रदान करता है इसलिए युवा आईएएस अधिकारियों पर यह बोझ और बढ़ गया है। अब उन्हें विधायिका से उसकी मनमानी पर अंगूठा लगाना बंद करना होगा। कानून समझ दिखने वाले कार्यों पर अमल करना होगा अन्यथा गुलाम अधिकारी और आईएएस अधिकारी में फर्क धीरे-धीरे धूमिल होता चला जाएगा और कोई बात नहीं….

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