
जल संरक्षण-शहडोल अजब है, अजब-गजब है…; कांग्रेस की पत्रकार वार्ता में क्यों नहीं उठा मुद्दा….
शहडोल में जल स्रोत “किरण टॉकीज की बावड़ी” बचाने के लिए जल आंदोलन का क्रमिक अनशन करने वाले आंदोलनकारी हो दो महीना होने वाले हैं.. कोई उनकी बात सुने, जल स्रोत की रक्षा करें… लेकिन ऐसा कुछ दिखाई अभी दूर तक नहीं देता। कांग्रेस पार्टी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस किया भी तो उन्होंने भी हिम्मत नहीं दिखाई इस आंदोलन के बारे में अच्छा या बुरा बोल सके। उन्हें अपने आका से मिले टारगेट को औपचारिक कर्मचारियों की तरह पूर्ण करना था। सेनाओ का अपमान करने वालों की निंदा करना था। और उसकी का जानकारी हेड क्वार्टर भेजनी थी। सिस्टम यही है। लेकिन यह सिस्टम कांग्रेस का नहीं हुआ करता था यह बीजेपी का सिस्टम था। औपचारिकता पूरी करिए और उसकी सूचना फोटोग्राफ्स हेड क्वार्टर भेजिए। खास तौर से 2014 के बाद का भाजपा इसी रंग-ढ़ग में चल रहा है… तो भाजपा भी अपना काम कर रही है, तिरंगा यात्रा के जरिए औपचारिकता पूरी कर रही है।
(त्रिलोकीनाथ )
और कांग्रेस को भी खानापूर्ति करना चाहिए तो वह भी कर रही है इनका अन्य स्थानीय जन सरोकारों से कोई लेना-देना दिखाई नहीं देता।आखिर किरण टॉकीज के पास जल स्रोत बढ़ाने के लिए जो धरना आंदोलन स्थानीय नागरिकों द्वारा किया जा रहा है अगर वह झूठ है, गलत है या इसमें भ्रांति पैदा की जा रही है तो भी कांग्रेस की जिम्मेदारी यह होनी चाहिए थी कि वह इस पर टिप्पणी करती कि ऐसे जन आंदोलन नहीं चलने चाहिए। किंतु कांग्रेस ने मूकबधिर की तरह इस आंदोलन से तटस्थता बना ली। क्योंकि शायद उसे लग रहा है कि आज भाजपा के राजनेता को जनमानस प्रताड़ित कर रहा है कल धोखे से सत्ता में आने के बाद यही जनमानस कांग्रेस को प्रताड़ित कर सकता है
और ऐसा होता भी है तब कांग्रेस का शासन था प्रभारी मंत्री अजय सिंह ने एक पत्रकार वार्ता किया कि प्रदेश भर में तालाबों का संरक्षण किया जाएगा। पत्रकार वार्ता में मैं भी था मैं वहीं पर शादे कागज में हस्तलिखित एक प्रश्न आवेदन बनाया और उनसे कहा कि आप प्रदेश स्तर पर शहडोल में बैठकर अगर तालाब संरक्षण के लिए बात कर रहे हैं तो क्यों ना इसकी शुरुआत शहडोल से ही कर दी जाए। उन्हें राय दी की शहडोल में जहां अभी पत्रकार वार्ता के बाद बाल संप्रेषण गृह का शिलान्यास करने जा रहे हैं दरअसल में तालाब है जो जेल भवन के बगल में है उसकी जमीन है और उसे भांठा जा रहा है यदि आप इस शिलान्यास का बहिष्कार करेंगे अथवा इस रद्द कर देंगे तो प्रदेश में यह संदेश जाएगा कि आपने तालाब बचाने का काम किया। उन्होंने अपने नौकरशाह लोगों से पूछा तब संजय दुबे जिला पंचायत अधिकारी थे उन्होंने उन्हें राय दिया कि नहीं गलत बोला जा रहा है, वह तालाब की जमीन नहीं है । बल्कि तालाब से दूर है। मौके में जब वह गए तो मौका स्थल बने हुए अच्छे खासे तालाब के मेड़ पर लगे पेड़ों को देखने से मना कर दिया और तालाब पर ही शिलान्यास कर दिया।
क्योंकि तब ब्यूरोक्रेट्स को यह अहंकार टूट रहा था रहा था कि उनकी योजना को कोई पत्रकार कैसे फेल कर सकता है।कोई 25 साल पहले यह घटना घटी थी। यह अलग बात है की बाद में पर्यावरण मंत्री इंद्रजीत पटेल आए वह भी कांग्रेस के थे और ऐसे ही एक पत्रकार वार्ता में एक बहस हुई, प्रश्नोत्तरी हुई। उसके पश्चात कलेक्टर पंकज अग्रवाल से उन्होंने प्यार से कहा कि अब तो यह सिद्ध हो गया है कि वह तालाब है तो आप इसका गहरीकरण कब कर रहे हैं। तब तक जल संरक्षण के नाम पर तालाब बचाने का फैशन गति पकड़ चुका था। कलेक्टर पंकज अग्रवाल को लगा की जायज भी है और उन्होंने इस तालाब की रक्षा के लिए जितना भी बचा-कुचा तालाब था उसे संरक्षित करने के लिए आदेश दे दिया।
करीब 8 से 10 लाख रुपए में यह तालाब जो जेल भवन के बगल में है गहरीकरण हुआ उसे पर नालियां बनाई गई ताकि अतिक्रमणकारियों आगे ना बढ़ सके। यह अलग बात है कि इस तालाब में कुछ महत्वपूर्ण लोगों को पट्टे जारी कर दिए गए थे क्योंकि शहर के मुख्य मार्ग की करोड़ों रुपए की इस तालाब की जमीन की कीमत हो चुकी थी। इसलिए अफसर नेता और अन्य लोग इस तालाब को विनाश का सपना बुनने लगे थे। क्योंकि इस पर बार-बार चर्चा हो रही थी। इसलिए यह मॉडल बन रहा था। शहर के अन्य तालाब फिर भी कॉलोनी के रूप में परिवर्तित हो रही थी माफिया की सक्रियताऔर प्रशासनिक अधिकारी की निष्क्रियता मिलकर तालाबों की हत्या कर रहे थे।
फिर भी यह मॉडल तालाब बचने में कामयाब रहा। क्योंकि लगातार इस पर निगाह रखी जा रही थी। बहरहाल समय बदला भाजपा सरकार अपने प्रधानमंत्री की गुणगान के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना को क्रियान्वित करने के चक्कर में जैसा कि अक्सर होता है तालाबों पर अतिक्रमणकारियों को पट्टा देने का काम किया। शासन का पैसा भी लगाया और मकान भी बना दिया। तालाब भांटने का पूरी व्यवस्था कर दी है। तो एक तरफ तालाब खोदने का पैसा दे रही थी तो दूसरी तरफ तालाब भांटने के लिए अपने वोटर पैदा करने के लिए अतिक्रमण कार्यों को पट्टा भी दे रही थी और पैसा भी दे रही थी।
जो भारतीय जनता पार्टी की वोटर थे उन्हें छूट थी कि वह किसी भी तालाब पर कब्जा करें और सरकार से धन लेकर मकान बना ले। शहडोल नगर और आसपास के गांव में में कई तालाब कानूनी के रूप में भी परिवर्तित हो गए। सैकड़ो तालाबों में किसी भी एक तालाब को अगर देखा जाए तो उसमें तालाब हत्या की यह योजना अप्रत्यक्ष तौर पर स्थापित और सफल होती दिखेगी।बहरहाल तालाबों का मॉडल बनाया हुआ जेल बिल्डिंग के तालाब पर भी कई पट्टे जारी कर दिए गए थे। बची जमीन पर प्रधानमंत्री आवास बनाकर उसे भांटने की योजना बनादी गई।
लेकिन अब इस योजना को विकास की नजर से देखा जाने लगा है मुख्य मार्ग में करोड़ों रुपए की जमीन पर बने
प्रधानमंत्रीआवास अब अप्रत्यक्ष तौर पर बेचे जाने लगे हैं। जेल बिल्डिंग के तालाब पर यह चमत्कार प्रमाणित हुआ है आगे प्रधानमंत्री आवास तो पीछे तालाब को और भी ज्यादा पाट कर पक्का कंक्रीट डालकर पिलरदार टीन सेड का गोदाम बना दियागया है। कुछ लोग कहते हैं यह आवास बिक चुका है, बिना रजिस्ट्री के। क्योंकि हितग्राही के पास इतना पैसा तो है नहीं। लेकिन सामने आवास अभी जिंदा है इसलिए आगे आवास है, पीछे गोदाम है। जो आगे धीरे-धीरे बढ़ाते हुए तालाब को भांटने का एक योजना है। यह भी अलग बात है कि इसे रोज जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी यानी अपर कलेक्टर ( विकास), कमिश्नर शहडोल और जिला न्यायाधीश शहडोल अपने घर आते जाते वक्त एक नजर देखते हैं तो वह क्या देखते हैं कि भ्रष्टाचार ठीक से चल रहा है अथवा नहीं, अन्यथा इस पर कुछ तो दहशत होती और यह प्रधानमंत्री आवास गोदान के रूप में परिवर्तित होकर तालाब को भांठता नजर नहीं आता। इसी को अन्य लोग आगे जल क्षेत्र में बढ़कर तालाब को नष्ट करने में आमादा है। क्योंकि तब बचे हुए तालाब को बचाने की कयामत में 10 लख रुपए खर्च किए गए थे। इसमें शासन को कोई राजस्व मिल भी नहीं रहा है।
इस कर्तव्य निष्ठ अधिकारियों न्यायाधीश और अन्य लोगों की की नजर में प्रतिदिन गुजरने वाले इस तालाब की दुर्दशा में जब गहराई में जब गया तब पता चला की 25 साल पहले जिस तालाब में गहरीकरण का काम 10 लाख रुपए खर्च करके किया गया दरअसल वह सरकारी रिकॉर्ड में तालाब है ही नहीं। क्योंकि इस तालाब को प्लाट बनाकर बेचने का और अपने लोगों को उपकृत करने का काम तब के शासन ने किया था। शासन भाजपा और कांग्रेस दोनों के थे। और इसीलिए अपने आदमी को अतिक्रमण कर कर भाजपा नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत भी किया। और अब गुलाम हितग्राही अपने नेता के आदेश पर उसे गोदाम में बदलकर बेचने का काम कर रहा है। यह कर दिया है। ऐसा क्यों नहीं समझा जाना चाहिए।
तो प्रश्न यह खड़ा होता है कि जब प्लाट बन ही गया था तालाब के अंदर ,तो तालाब को जिंदा क्यों किया गया…? क्या पत्रकारिता में उसे समय कुछ ताकत जिंदा थी या फिर उसकी हत्या नगर पालिका और शासन और नेता मिलकर तत्काल क्यों नहीं कर दिए 10 लाख रुपए तो बच जाते शासन के..? लेकिन अगर विरासत का तालाब हत्यारों के प्रयासों के बावजूद भी तालाब बन ही गया है तालाब को भू अभिलेख में तालाब क्यों नहीं चढ़ाया गया है…? अब तो यह करोड़ों रुपए का कीमती तालाब नुमा प्लाट या प्लाट नुमा तालाब है । इसे किसी बड़े बिल्डर को देखकर शासन करोड़ों रुपए विकास के नाम पर संग्रहित कर सकती है..?
क्या इसी सोच के कारण इस तालाब को तालाब के रूप में नहीं दर्ज किया जा रहा है.. यह बड़ा प्रश्न है और शायद इसीलिए किरण टॉकीज के पास वाली जल स्रोत बावड़ी को भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी दोनों मिलकर जिंदा नहीं करना चाहते है अन्यथा कोई कारण नहीं है कि कांग्रेस पार्टी की पत्रकार वार्ता में दो महीने से चल रहे लोक जन आंदोलन पर आंखें मूंद ली जाए… और चल रही आंदोलन की धीमी आंधी मैं शुतुरमुर्ग की तरह सर अपना रेत में डाल लिया है। कि हमने कुछ नहीं देखा।
सत्ता में रहने वाले नेता नुमा भू माफियाओं का चरित्र एक जैसा होता है। अन्यथा इस जन आंदोलन को झूठा साबित करना चाहिए या फिर उसके सच के साथ खड़े होकर जल गंगा संवर्धन अभियान या कांग्रेसियों के तालाब संरक्षण अभियान जल बचाने जैसे योजनाओं के पक्ष में खड़े होकर आंदोलनकारी को प्रोत्साहित करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो यह आदिवासी क्षेत्र है इसका शोषण, इसका दमन इस क्षेत्र की लूटपाट इसकी नियति है । चाल, चरित्र, चेहरा अलग-अलग हो जाने से नेताओं का मूल रूप बदल नहीं जाता। क्या यही जल संरक्षण हकीकत है… सोचते रहिए…

