
शहडोल के रघुनाथ जी राम जानकी शिव पार्वती मोहन राम मंदिर ट्रस्ट में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के 2012 के आदेश की अनुपालना में बाधाएं
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने प्रकरण FA-177 वर्ष 2012 में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया था, जिसमें शहडोल जिले के रघुनाथ जी राम जानकी शिव पार्वती मोहन राम मंदिर ट्रस्ट के विवादित पक्षकारों को अलग करते हुए, एसडीएम सोहागपुर को एक स्वतंत्र कमेटी गठित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस कमेटी का उद्देश्य ट्रस्ट का संपूर्ण प्रबंधन तब तक संभालना था, जब तक मामले का अंतिम निराकरण उच्च न्यायालय द्वारा नहीं हो जाता। यह आदेश ट्रस्ट में व्याप्त विवादों और संभावित अनियमितताओं को ध्यान में रखते हुए दिया गया था। हालांकि, आदेश की अनुपालना में कई बाधाएं आईं, जिनमें राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक अनिच्छा प्रमुख रूप से शामिल रही। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इन घटनाक्रमों का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है।
(त्रिलोकीनाथ)
उच्च न्यायालय का आदेश (2012): न्यायालय ने ट्रस्ट के विवादित पक्षकारों को अलग कर एसडीएम सोहागपुर को निर्देश दिया कि वे एक स्वतंत्र कमेटी बनाई गई। तब इस कमेटी में डॉ राजेंद्र श्रीवास्तव, (पूर्व जिला अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी), मार्तंड त्रिपाठी (तत्कालीन जिला अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी) रमेश प्रसाद त्रिपाठी अधिवक्ता, चंद्रशेखर त्रिपाठी पत्रकार, राजेश्वर उदानिया समाजसेवी के अलावा सरकारी पदासीन पदेन अधिकारी तहसीलदार सोहागपुर, राजस्व निरीक्षक सोहागपुर, एवं उपसंचालक जिला संग्रहालय शहडोल को सदस्य बनाया गया था इस कमेटी वाद पक्षकार लवकुश पांडे को सदस्य के ऊपर में रखने का दबाव बनाया गया था और उसका नाम भी आ गया था इस कमेटी को ट्रस्ट का प्रबंधन तब तक देखना था, जब तक मामले का अंतिम फैसला नहीं हो जाता।
तत्कालीन एसडीएम एल.एल यादव ने शुरू में कमेटी गठन से परहेज किया, क्योंकि उन पर दबाव था कि वे इसकी स्थापना न करें।उच्च न्यायालय द्वारा दूसरी बार फटकार लगाए जाने के बाद, फरवरी माह में उन्होंने एक आदेश पारित किया, जो न्यायालय की मंशा के विपरीत था। जब इसकी जानकारी दी गई, तो उन्होंने एक दिन में ही अपने आदेश में संशोधन कर दिया। परिणामस्वरूप, प्रकरण के पक्षकार लवकुश पांडे को स्वतंत्र कमेटी से हटाना पड़ा। क्योंकि इसी लवकुश पांडे को स्वतंत्र कमेटी को प्रभार सौपना था। शायद साजिश कारों की योजना यह थी कि लवकुश पांडे को जब सदस्य बना दिया जाएगा तो स्वतंत्र कमेटी का सचिव भी उसी को बना दिया जाएगा से प्रभार देने की स्थिति पैदा नहीं होगी। लेकिन एसडीएम यादव ने संज्ञान आने के बाद अपनी नौकरी बचाने के लिए लवकुश पांडे को स्वतंत्र कमेटी से हटा दिया। और नई स्वतंत्र कमेटी का गठन किया।
किंतु जिस प्रकार से आज तक 12 साल बाद भी प्रभार नहीं लिया गया प्रतीत होता है गठित कमेटी में जानबूझकर ऐसे सदस्य शामिल किए गए, जो न्यायालय के आदेश का पालन सुनिश्चित न कर सकें। कमेटी में शामिल सदस्यों पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के जिला अध्यक्ष पद पर रहे डॉ. राजेंद्र श्रीवास्तव और तत्कालीन अध्यक्ष मार्तंड त्रिपाठी ने अन्य सदस्यों पर ऐसा वातावरण बनाया कि वे उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में रुचि न दिखाएं, विशेष रूप से अपदस्त किए गए ट्रस्ट के सचिव लवकुश आदि ट्रस्टियों से प्रभार लेने में क्योंकि यह स्पष्ट था कि जैसे ही प्रभार दिया जाएगा लव कुश पांडे वगैरा के समस्त आर्थिक अपराध कांच के आईने की तरह साफ दिखने लगेंगे। और इसीलिए संभावित रूप से ट्रस्ट में बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश होने का डर था, जो राजनीतिक हितों को प्रभावित कर सकता था।
बाद के एसडीएमों का प्रयास और असफलता
एल.एल. यादव के बाद आने वाले एसडीएमों ने भी आदेश की अनुपालना का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली:
लोकेश कुमार जांगिड़: भाजपा के सत्ता दबाव के बावजूद प्रयास किया, लेकिन विफल।
धर्मेंद्र मिश्रा: अनुपालन कराने की कोशिश की उन्होंने बताए थे पत्र जारी कर अपने पत्र संख्या 1157 दिनांक 22 10 2019 को लव कुश पांडे को प्रभार देने का आदेश दिया, किंतु राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण वे हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं कर सके।
एसडीएम प्रगति वर्मा: आदेश पालन में रुचि दिखाई, लेकिन जैसे ही उन पर मंदिर में कब्जा करने वाले साजिश कारों फिर राजनीतिक आकाओं का दबाव पड़ा उन्होंने अपना हाथ खींच लिया और प्रभार दिलाने में असफल हो
गई । शायद उन्हें अंग्रेजी के आदेश समझ में नहीं आए।
वर्तमान एसडीएम अरविंद शाह: वर्तमान ने में भी अपनी कर्तव्य निष्ठा के चलते हाई कोर्ट के आदेश पालन पर कार्यवाही प्रारंभ की उन्होंने अपने पत्र क्रमांक 549 दिनांक 13. 6. 2024 को लवकुश को पत्र जारी कर प्रभार सौंपने का 3 दिन का अवसर दिया, किंतु मंदिर में गैर कानूनी कब्जा बनाए रखने वाला माफिया नुमा नेटवर्क का यह दबाव ही था कि आज तक प्रभार नहीं हो पाया। इस तरह कथित रूप से सत्ताधारी भाजपा के नेताओं की इच्छा न होने के कारण उच्च न्यायालय के आदेश का पूर्ण अनुपालन नहीं हो सका।
संभावित प्रभाव और निहितार्थ
भ्रष्टाचार का पर्दाफाश: कमेटी की निष्क्रियता के कारण ट्रस्ट में संभावित बड़े भ्रष्टाचार पर पर्दा पड़ा रहा। राजनीतिक दबाव ने प्रशासनिक अधिकारियों की स्वतंत्रता को प्रभावित किया, जिससे न्यायिक आदेशों की अनुपालना में बाधा आई।
मामला अभी भी उच्च न्यायालय में लंबित है, और अनुपालन की कमी से अवमानना के मामले उठ सकते हैं।उपलब्ध जानकारी के आधार पर, उच्च न्यायालय के 2012 के आदेश की अनुपालन में राजनीतिक दबाव प्रमुख बाधा रहा है। किंतु हाई कोर्ट स्वयं संज्ञान यदा कदा लेता है इसलिए अवमानना की कार्रवाई अभी निरर्थक है।
शहडोल की मोहन राम मंदिर का दुर्भाग्य हैभाजपा नेताओं के हस्तक्षेप ने प्रशासनिक प्रक्रिया को प्रभावित किया, जिससे ट्रस्ट का निष्पक्ष प्रबंधन सुनिश्चित नहीं हो सका।
और दूसरी महत्वपूर्ण राजनीतिक कांग्रेस पार्टी मामले में नूराकुश्ती करते हुए भाजपा के साथ खड़ी दिखाई देती है शायद इसलिए भी किसी भी कांग्रेसी नेता ने इस महत्वपूर्ण मोहन राम मंदिर को अतिक्रमण कार्यों और गैर कानूनी कबजाधारियों से बचने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।
सार्वजनिक हित: ट्रस्ट जैसे धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता की कमी से आम जनता के विश्वास पर असर पड़ता है।
जिससे ट्रस्ट का निष्पक्ष प्रबंधन सुनिश्चित नहीं हो सका।
ऐसा नहीं है कि मोहनराम पांडे के परिवार के वंशज अपनी विरासत की मंदिर को बर्बाद होता देख रहे हैं उनकी तरफ से सूर्य प्रकाश पांडे ने अपना पक्ष रखा और मंदिर को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के अधीन गठित स्वतंत्र कमेटी को संपूर्ण प्रबंधन प्रभार दिलाने का प्रयास किया लेकिन किसी अज्ञात दबाव से आज तक मोहन राम की वंशज मंदिर को निष्पक्ष प्रबंधन दिला पाने में फिलहाल असफल दिखाई दे रहे हैं क्योंकि जिस प्रशासन को हाई कोर्ट के आदेश का पालन करना है वह अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से निर्वहन नहीं कर रहा है एक पक्ष का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी के लोग इस मंदिर में बद-नियति रखते हैं और चित्रकूट से आए लवकुश पांडे के साथ मिलकर करीब 12 साल से मंदिर में भ्रष्टाचार का पारदर्शी व्यवहार कर रहे हैं। क्योंकि चित्रकूट के रोहिणी प्रपन्नाचार्य मिलकर भारतीय जनता पार्टी गैर कानूनी कार्यों का साथ देती दिखाई दे रही है इस आशय का आरोप सूर्य प्रकाश पांडे कई बार प्रशासकीय अधिकारियों के सामने लगा चुके हैं और जिस प्रकार से प्रणाली दिख रही है उसे यही प्रतीत होता है की कोई मोहनराम पांडे के परिवार की विरासत की इस मंदिर को कुदृष्टि रखे हुए हैं और वह उसका राजनीतिक दुरुपयोग करना चाहता है शायद इसीलिए पिछले 12 साल से हाई कोर्ट का आदेश का पालन कर पाने में प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं।….

