
उद्योगपतियों को राहत, आम आदमी को सजा: कर वसूली में दोहरा मापदंड?
जब अरबों रुपये के बकाया वाली बड़ी कंपनी को वर्षों की मोहलत मिल सकती है, तो मजदूरी करने वाला आम आदमी क्यों नहीं? उसके लिए संपत्ति कर या जल कर का कुछ हजार या लाख रुपये का बकाया भी उतना ही बोझिल होता है, जितना वोडाफोन आइडिया Vi के लिए उसके बकाया। Vi को राहत इसलिए मिली क्योंकि टेलीकॉम राष्ट्रीय महत्व का क्षेत्र है, लेकिन क्या जल आपूर्ति और नगर सेवाएं कम महत्वपूर्ण हैं?
भारत में कर वसूली और बकाया भुगतान की नीतियां अक्सर सवालों के घेरे में रहती हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने वोडाफोन आइडिया (Vi) कंपनी को उसके समायोजित सकल राजस्व (AGR) बकाया में बड़ी राहत दी है। दिसंबर 2025 में कैबिनेट ने Vi के लगभग 87,695 करोड़ रुपये के AGR बकाया को फ्रीज कर दिया और प्रमुख भुगतानों पर 5 साल का मोरेटोरियम (स्थगन) प्रदान किया। अब ये भुगतान मुख्य रूप से 2031-32 से 2040-41 के बीच होंगे। सरकार का तर्क है कि इससे टेलीकॉम सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बनी रहेगी, 20 करोड़ उपभोक्ताओं के हित सुरक्षित होंगे और सरकार की खुद की 49% हिस्सेदारी की रक्षा होगी। यह राहत राष्ट्रीय हित और डिजिटल इंडिया मिशन से जुड़ी बताई गई है।दूसरी ओर, आम नागरिकों के लिए नगर पालिकाओं द्वारा लगाए जाने वाले संपत्ति कर, जल कर और अन्य शुल्कों के बकाया में ऐसी लंबी राहत दुर्लभ है। शहडोल जैसी नगर पालिकाओं में वर्षों पुराने बकाया (15-20 साल तक) पर लोक अदालतों के माध्यम से एकमुश्त भुगतान या ब्याज/जुर्माने में छूट दी जाती है। कई नगर निगमों (जैसे पुणे, इंदौर, चेन्नई, कोयंबटूर) में लोक अदालत या विशेष अभियानों में बकाया चुकाने पर 50-100% तक जुर्माने की माफी मिलती है, लेकिन लंबी किस्तों (5-10 साल) में भुगतान की सुविधा सामान्य नहीं है। कुछ जगहों पर सालाना किस्तों का विकल्प होता है, लेकिन यह बड़े बकाया के लिए सीमित और सख्त शर्तों वाला होता है। न चुकाने पर नोटिस, संपत्ति कुर्की या सेवा कटौती जैसी कार्रवाई होती है।
शहडोल का उदाहरण और गंभीर है। वहां तालाबों पर अतिक्रमण के हैं, और कथित तौर पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान भी ऐसे क्षेत्रों में बने हैं। यदि नगर पालिका खुद प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रभावित करने वाली गतिविधियों में शामिल है, तो जल स्तर गिरने का ठीकरा केवल नागरिकों पर फोड़कर सख्त वसूली करना अन्यायपूर्ण लगता है। जल आपूर्ति पर एकाधिकार होने से नागरिकों पर दबाव बनाना तानाशाही जैसा प्रतीत होता है।
समानता की जरूरत
बड़े उद्योगों के लिए राहत का आधार: सार्वजनिक हित, रोजगार, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता कल्याण।
आम आदमी के लिए क्यों नहीं? मजदूर या मध्यम वर्गीय परिवार के लिए बकाया चुकाना मुश्किल होता है। लंबी किस्तें (5-10 साल) देने से वसूली आसान होगी, अदालती मामले कम होंगे और राजस्व भी बढ़ेगा। नगर पालिकाओं में बकाया के लिए आय-आधारित किस्त सुविधा शुरू की जाए। लोक अदालतों को और सशक्त बनाकर छूट के साथ लंबी किस्तें अनुमति दी जाएं। भ्रष्टाचार मुक्त प्रणाली से कर वसूली “गुलाब में महक” जैसी हो सकती है – जहां गुलाब (नागरिक) जिंदा रहे और महक (राजस्व) बरकरार रहे।यदि नेता और अधिकारी भ्रष्टाचार से मुक्त होकर सोचें, तो स्थानीय संस्थाएं आम आदमी के लिए वरदान बन सकती हैं। अन्यथा, कोर्ट-कचहरी का चक्कर और सिस्टम की जटिलताएं बनी रहेंगी। समय है कि नीतियों में समानता लाई जाए – बड़े के लिए जो राहत, आम आदमी के लिए भी वही न्याय।

