
12 मई 2003 को तत्कालीन कलेक्टर एवं पंजीयक लोक न्यास के द्वारा जिला न्यायालय से निर्देश चाहे गए यही किसी भी ट्रस्ट में विवाद होने की स्थिति में जबकि पूरा ट्रस्ट ही भ्रष्ट कार्यों में लिप्त हो कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाती है, ऐसा अयोध्या स्थित प्रसिद्ध राम मंदिर ट्रस्ट के मामले में नहीं किया गया। जबकि वहां भी करोड़ों रुपए की चोरी में करीब 80 लख रुपए बरामद की जा चुकी थी। अरबो रुपए संपत्ति के जमीन खरीदी बिक्री में खुर्द-बुर्द होने के भी आरोप लग रहे थे।लेकिन शहडोल के मामले में कलेक्टर शहडोल में ट्रस्टी नहीं थे, वह कलेक्टर थे. अयोध्या के मामले में स्वयं कलेक्टर न्यासि के रूप में सदस्य होना बताया जाता है। और जब ट्रस्ट ही, भ्रष्ट हो तो कलेक्टर भी भ्रष्टाचार की संदेह में शामिल होना स्वाभाविक है।ऐसी हमारी आदिवासी विशेष क्षेत्र की ज्ञान हमें बताता है.
अब अयोध्या में न्यास का महान ज्ञानी लोग रहते हैं जिनका दिल्ली तक संपर्क, उनके लिए कोई अलग न्यास का कानून बना हो वह अलग बात है। या फिर कितने ताकतवर हैं की कानून से ऊपर स्वयं को सुरक्षित रख सकते हैं जैसा कि देखने में भी आ रहा है। जांच के नाम पर विशेष जांच दल (एस आइ टी)का गठन गैर कानूनी प्रक्रिया है या फिर सत्ता में अपनी ताकत का इस्तेमाल करके भ्रष्ट ट्रष्टियों को बचाने की रास्ते खोजने का विभिन्न कानून विशेषज्ञों की कमेटी है.. जिसकी रिपोर्ट जो गोपनीय है किंतु सार्वजनिक रूप से पारदर्शी है की एक भी भ्रष्ट ट्रस्टी को इस रिपोर्ट में दोषी नहीं बनाया गया। कुछ चिरकुट चोर दिखाए गए हैं। इसलिए पूरा ट्रस्ट ही भ्रष्ट लोगों की कमेटी है जिसे भंग किया जाना ही न्याय संगत होगा. किंतु ऐसा ना करके करोड़ों के भ्रष्टाचार्यों को बचाने के लिए जांच दल ने काम किया। जांच दल की रिपोर्ट फिर आगे बताएंगे की कितनी पारदर्शी है…।
किंतु शहडोल के राम मंदिर ट्रस्ट में जब कलेक्टर शहडोल ने धारा 26 का उपयोग करते हुए आदेश पारित किया ताकि धारा 27 के तहत इसका निराकरण जिला न्यायालय कर सके तब जिला न्यायालय ने दिनांक 16-12-2011 को इस पर अपना निर्णय सुनाया जो शहडोल के इतिहास बन गया..
बहरआल देखेंगे कि शहडोल का रघुनाथजी रामजानकी शिवपार्वती मोहनराम मंदिर ट्रस्ट जिसे हम मोहन राम मंदिर ट्रस्ट कहते है और जगह-जगह संबंधित न्यास से जुड़े लवकुश जैसे लोग अपनी प्रॉपर्टी बना रहे हैं। अयोध्या की राममंदिर में एक लवकुश का नाम आया जो भ्रष्टाचार का चेहरा बना. ठीक उसी तरह शहडोल में भी एक लवकुश अपनी षड्यंत्र कारी गतिविधियों से मोहनराम मंदिर को क्षति पहुंचता रहा। उसने मंदिरों की मूर्तियों की हेराफेरी करने के लिए गैरकानूनी तरीके से मंदिर की मरम्मत करवाई वह निर्माण के नाम पर करोड़ रुपए चंदा इकट्ठा किया जो पैसा आया उसमें से ही मोहनराम मंदिर की जमीन खसरा नंबर 138 की 33 डिसमिल शहडोल शहर की महत्वपूर्ण जमीन पर अवैध रूप से निर्माण भी कर लिया जिसका उसे अधिकार नहीं था. आज वहां उसका परिवार कब्जा करके रह रहा है जो जांच का विषय है। इसकी कहानी भी आगे बताई जाएगी…
फिलहाल जिला न्यायालय ने कलेक्टर का आवेदन प्राप्त करने के बाद क्या निर्देश दिए और उसका क्या परिणाम हुआ उस पर चर्चा करते हैं. जिला न्यायालय 17-5-2003 में इस प्रकार को प्राप्त करने के बाद विस्तार से प्रकरण के 8 साल बाद निर्णय दिनांक 16-12-2011 में विद्वान न्यायाधीश सनत कुमार कश्यप प्रथम अपर जिला न्यायाधीशशहडोल (म.प्र.) द्वारा आदेश पारित किया गया।
“साक्षी हरप्रसाद पाण्डेय (सह अना0सा0 -2) ने कथन किया है कि स्व0मोहनराम पाण्डेय का प्रपौत्र है और माननीय उच्च न्यायालय म०प्र० जबलपुर द्वारा व्यवहार अपील क्रमांक- 87 / 1979 ” तीरथ प्रसाद पाण्डेय
बनाम म०प्र० शासन एवं अन्य” निर्णय दिनांक – 27.10.86 के अनुसार पंजीयक लोक न्यास शहडोल द्वारा दिनांक – 22.11.01 को लोक न्यास का ट्रस्टी नियुक्त किया गया है। इस प्रकार वर्तमान में एन० भास्कर राव एवं हरप्रसाद पाण्डेय ट्रस्टी के रूप में नामित हैं किन्तु इन दोनों साक्षियों के साक्ष्य से यह दर्शित होता है कि ट्रस्टीगण द्वारा उन्हें ट्रस्ट के काम-काज से बेदखल कर दिया गया है और समस्त कार्यवाही स्वयं कर रहे हैं।
ट्रस्ट डीड के नोटिफिकेशन अनुसार स्वामीजी महंत गद्दी पुरानी लंका चित्रकूट को सर्वाकार नामित किया गया था और उन्हें ऑफिस बेयरर भी नामित किया गया था । सर्वाकार निजी मंदिर का मैनेजर या न्यासी के रूप में होता है किन्तु लोक न्यास होने के कारण सर्वाकार को मैनेजर की प्रस्थिति प्राप्त नहीं होती है फिर भी ऑफिस बेयरर के रूप में स्वामी जी महंत गद्दी पुरानी लंका चित्रकूट की प्रस्थिति को नकारा नहीं जा सकता है ।उपरोक्त विवेचना के आधार पर अधिनियम की धारा 27 (2) के अन्तर्गत् पंजीयक लोकन्यास शहडोल जिला शहडोल को निम्न निर्देश दिये जाते हैं:-
(1) “श्रीरामजानकी मंदिर पाण्डेय मोहनराम जी शहडोल ” जिसे तत्पश्चात् “श्री रघुनाथ जी रामजानकी शिवपार्वती मोहनराम मंदिर ट्रस्ट” के रूप में पंजीयक लोक न्यास द्वारा पंजीयन किया गया, के वर्तमान न्यासीगण एन०भास्कर राव एवं हरप्रसाद पाण्डेय को छोड़कर शेष न्यासीगण को न्यासी के पद से हटाया जाता है।
(2) वर्तमान न्यासीगण न्यास की समस्त संपत्ति के दस्तावेज एवं न्यास के क्रियाकलाप संबंधित समस्त दस्तावेज 15 दिवस के भीतर पंजीयक लोक न्यास शहडोल के समक्ष प्रस्तुत करेंगे ।
(3) श्री एन०भास्कर राव एवं हर प्रसाद पाण्डेय न्यास के न्यासी के रूप में कार्यरत रहेंगे। जब तक अन्य न्यासियों की नियुक्ति नहीं हो जाती तब तक श्री एन०भास्कर राव कार्यकारी न्यासी के रूप में कार्य करेंगे। न्यास के निर्माता पाण्डेय मोहनराम की भावना के अनुकूल ऑफिस बेयरर के रूप में न्यास मंडल में स्वामी जी मंहत गद्दी पुरानी लंका चित्रकूट के प्रतिनिधि भी शामिल रहेंगे।
(4) पंजीयक लोक न्यास शहडोल जिला शहडोल को यह निर्देशित किया जाता है की 30 दिवस के भीतर न्यास डीड की मंशा के अनुसार न्यासियों के रिक्तियों की पूर्ति के लिये कार्यवाही प्रारंभ करेंगे। उन्हें यह भी निर्देशित किया जाता है की न्यास की समस्त संपत्ति को सुरक्षार्थ रखने एवं अवैध रूप से हस्तान्तरित की गई भूमि / मकान, अतिक्रमणकर्ताओंगण द्वारा अतिक्रमण की गई भूमि का रिक्त आधिपत्य न्यास को दिलाने के संबंध में 30 दिवस के भीतर कार्यवाही प्रारंभ करेंगे। न्यास का गठन होने के पश्चात् न्यास की संपत्ति को अतिक्रमणकर्ताओं से मुक्त कराने के लिये न्यासीगण विधिवत् कार्यवाही संचालित करेंगे ।
(5) तालाब, धर्मशाला के जीर्णोद्धार के लिये आवश्यक कदम उठाये जावें।
इस तरह पुराने न्यासियों को पृथक कर नई कार्यवाही का निर्देश होने के बाद नए षड्यंत्रकारी न्यायासियों ने गैर कानूनी तरीके से तत्कालीन लोकन्यास गजेंद्र सिंह के साथ मिली भगत करके न्यास में चित्रकूट से जुड़े लोगों को न्यास गठन बनाने का काम किया जिसका विरोध जिला न्यायालय द्वारा बनाए गए न्यासी हर प्रसाद पांडे ने करते हुए उच्च न्यायालय जबलपुर से इस न्यास गठन की प्रक्रिया पर स्थगन आदेश लाया किंतु षड्यंत्रकारी तबका भाजपा के स्थानीय नेताओं की मिली भगत से ट्रस्ट पर कब्जा करने की पूरी हिमाकत की. इस पर आगे कहानी फिर बताएंगे की हरप्रसाद पांडे जब न्यास गठन के लिए काम कर रहे थे तब चित्रकूट से जुड़े भगवावस्त्र पहने लोग किस प्रकार से अन्याय और असत्य के सहारे राम मंदिर में कब्जा करने का प्लान बना रहे थे. बतौर ट्रस्ट एक बड़े भ्रष्टाचार को नींव रख रहे थे.. जिसका एक सीधा उदाहरण देखने को भी मिला की मोहनराम मंदिर से जुड़ी शहर की करोड़ों रुपए की 33 डिसमिल जमीन पर सत्ता के दबाव में यह जानते हुए यह मोहनराम मंदिर ट्रस्ट की प्रॉपर्टी है एक बेनामी संस्था के जरिए कब्जा कर लिया और जब तहसीलदार न्यायालय सोहागपुर ने कब्जा करने के दौरान स्थगन आदेश पारित किया . वह फाइल आज भी तहसीलदार कार्यालय से गायब कर दी गई है और प्रकरण गायब होने की स्थिति में न्याय की हालत कई सालों बाद भी लंबित है। हम आगे यह भी बताएंगे की किस प्रकार से लवकुश ने उच्च न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास किया जो अपराध छुपाने का एक बड़ा प्रयास है ताकि उसके पूरे मोहनराम मंदिर ट्रस्ट को खुर्द-बुर्द करने का प्रमाण प्रमाणित ना होने पाए…. यह उतना ही पारदर्शी और ईमानदारी से दिखने वाली बेईमानी है जितनी वर्तमान में अयोध्या के राम मंदिर में पारदर्शिता से सत्ता के सहारे किया जा रहा प्रयास है ( त्रिलोकी नाथ )
(…….जारी तीन)

