
सौगंध राम की खाते हैं. मंदिर वहीं बनाएंगे;रामलला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे… ऐसा कहने वाले लोग अयोध्या में क्रांति कर दिए और फिर मंदिर वहीं बनाए, रामलला का नहीं.. चंपत राय बंसल वाला राममंदिर।
भ्रष्टाचार और घोटाले का मंदिर.. रामलला, जो टेंट में बैठे थे उन्हें भी कहीं मंदिर में बैठा दिया गया… की चुपचाप बैठकर वह देखें की कैसे लोगों की भावनाओं के चढ़ावा की चोरी की जाती है, और चोर को सुरक्षा कैसे दी जाती है…? कुछ ऐसा ही वहां प्रमाणित हुआ…भारत की लोकतांत्रिक परंपरा में कुछ स्थान सिर्फ भौगोलिक बिंदु नहीं होते। वे प्रतीक बन जाते हैं। अयोध्या का राम मंदिर और दिल्ली का जंतर मंतर—दोनों ही हाल के वर्षों में भावुकता, शक्ति और न्याय की बहस के केंद्र रहे हैं। (त्रिलोकीनाथ)
फिर राजनेता कहते हैं जनता जनार्दन है, यानि भगवान है… उन्होंने अपने को भगवान तो घोषित नहीं किया लेकिन उस कम भी घोषित नहीं किया… यह नहीं कह सकते, पूरा प्रयास किया. एक भगवान आदिवासियों में भी घोषित किया जिन्हें भगवान बिरसा मुंडा कहा गया.. जबकि वहां भगवान शायद होते ही नहीं.. बड़ा देव की आराधना होती है,हमारे यहां।
तो जनता जनार्दन है, और वह जाकर जंतर-मंतर में जब बैठ जाती है दिल्ली में तो वहां उसे इस तरह न्याय मिलता दिखता है या आभास होता है जैसे विक्रमादित्य के टीला में जब कोई बालक बैठ जाता था तो उसे ज्ञान अपने आप मिल जाता था वह न्याय करता था… कथा कहती है वह उस टीला ( जिस स्थान में वह बैठता था) का चमत्कार था क्योंकि वहां विक्रमादित्य न्याय-प्रिय राजा का सिंहासन था. सिंहासन बत्तीसी की कहानी में कुछ ऐसा ही कहा गया है…
आजादी के पहले महात्मा गांधी का प्रिय भजन था महात्मा गांधी का प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ दूसरे के दर्द को समझने की बात करता था। स्वतंत्र भारत में जंतर मंतर उसी भावना का व्यावहारिक मंच बना। तो दूसरे का दर्द पीड़ित व्यक्ति के दर्द को महसूस करने की एक लोकतांत्रिक मंच जंतर-मंतर में पिछले तीन दशक से भारत की लोकसत्ता के निकट ही चुना गया था, आम आदमी जाता था, दर्द बताता था.. दर्द देखा जाता था, न्याय होता उसे महसूस होता था कि उसके दर्द की आवाज जंतर-मंतर में बैठकर जब व्यक्त की जाती है तो उसका जादू ऐसा होता है की लोकसत्ता उसे महसूस करती है और न्याय देती है… कुछ ऐसा ही की राज दरबार में बाहर एक घंटा लगा होता है और पीड़ित आदमी न्याय पाने के लिए उसे घंटे को बजाता है और राजा न्याय देता है लोकतंत्र में वह घंटा जंतर मंतर में जादूगरी करता रहा अब तक..
“सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे” सौगंध खाने वाले जब सत्ता में आए तो उन्हें लगा कि जंतर-मंतर मैं जो जनार्दन (भगवान )आते हैं, वह एक समस्या है.. उन्होंने उस समस्या को ही खत्म करने का आदेश पारित कर दिया… जंतर मंतर में अब कोई भी पीड़ित व्यक्ति या उसका प्रतिनिधि परिंदा भी पर नहीं मार सकता, दिल्ली में करीब आधा लाख पुलिस और अन्य सशस्त्र बल को लगाकर जंतर-मंतर को पहचाना गया कि यही समस्या की जड़ है….
क्योंकि पिछली बार जब न्यायपालिका के मुखिया ने अपनी सरस्वती वाणी से भारत के कॉकरोच को आवाहन किया तो पूरे कॉकरोच जंतर-मंतर में आ धमके, उन्होंने जो पीड़ा बताइ, उस भ्रष्टाचार के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा.. जो सौगंध राम की खाने वाले लोगों को सूट नहीं किया।
अबकी बारी जंतर-मंतर में भ्रष्ट निर्वाचन आयुक्त गुप्ता जी के गुप्त करनामें के पर्दाफाश हो जाने से उनके इस्तीफा की थी.. किंतु गुप्ता जी, कोई शिक्षा मंत्री नहीं थे, वह राक्षस के वह तोता बन गए थे जिस पर राक्षस की जान ( प्राण)सुरक्षित रहती थी. इसलिए तोते की सुरक्षा, राष्ट्र की सुरक्षा के समकक्ष रखकर आधा लाख प्रशासनिक बल को जंतर-मंतर की सुरक्षा में लगा दिया गया… ताकि तोता सुरक्षित हो सके, क्योंकि तोता गुप्ता जी का जब गला दबाया जाता तो टे से बोल देता कि उनकी गुप्त कार्य-प्रणाली के सूत्रधार कौन-कौन थे…? और राक्षस मारा जाता है. दशहरा के पहले रावण का वध अनुचित था.. इसलिए जंतर-मंतर को मार देना ज्यादा सरल समझ गया….
लेकिन एक और अराजक तत्व /देशद्रोही (उनकी नजर में) शिवजी की बारात लेकर निकल पड़ा.. क्योंकि उसी से कहा गया था की निर्वाचन प्रणाली में भ्रष्टाचार के जो आरोप लगाए गए हैं.. पत्रकारवार्ता में, वह शपथ पत्र में दे नहीं तो मांन-हांनि का मुकदमा होगा। देश के संसद के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ठहरे लोकतंत्र के सबसे बड़े राजनेता परिवार के सदस्य.. क्यों शपथ देने चले और जब शपथ देना ही है तो सुप्रीम कोर्ट के सामने दिया जाए… इसलिए ज्ञापन देने के लिए पहले वह राष्ट्रपति महोदय के पास गए, वहां भी यही बात कही गई की साक्ष्य दिए जाएं..। फिर सुप्रीम कोर्ट जा रहे थे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश श्री सूर्यकांत जी की चमक से फिर से सरस्वती प्रकट हुई… उन्होंने कहा याचिका दीजिए, अब तो शपथ देना ही था… नेता प्रतिपक्ष सहित 11 लोकतांत्रिक राजनीतिक दल के नेताओं ने अब शपथ सहित अपनी बात न्यायपालिका में दे दी है… कि समयसीमा में इसमें न्याय हो सके…।
कहते हैं 24 घंटे में एक बार कम से कम हर व्यक्ति के मुंह में सरस्वती निकलती है यानी सच बात निकलती है.. उसको सच होना होता है, तो जब न्यायपालिका के शीर्ष पद पर बैठे हुए मुख्य न्यायाधीश के मुख से कोई भी बात निकलती है तो वह सरस्वती यानी सत्य बन ही जाती है, ज्यादातर देखा गया है… इसलिए शिवजी की बारात लेकर पहुंचे राजनेता भारत के सुप्रीम कोर्ट में उसे सत्य का इंतजार कर रहे हैं… जो ज्ञान के ईश्वर (ज्ञानेश) गुप्ता जी अब तक अपने गुप्त तरीके से सत्य को दबा रहे थे.. अब तो उन्हें बताना ही पड़ेगा की क्या वास्तव में वह देश के साथ गद्दारी करते हुए वोट-चोरी का प्लान बना रहे थे या वोट-चोरी करवा रहे थे.. या फिर यह एक संयोग है. क्योंकि शिवजी की बारात लेकर पहुंचे राजनेता कई प्रेस कांफ्रेंस करके प्रमाणित कर चुके हैं की गुप्ता जी गुप्त तरीके से लोकतंत्र में डाका डलवा रहे थे…?
एक गुप्त तरीका तो खुद न्यायपालिका ने ट्रेस आउट किया है की फॉर्म 6 मतदाता का प्रपत्र में संशोधन की बात उन्होंने कभी नहीं कही, फिर कैसे गुप्ता जी ने कह दिया की सुप्रीम कोर्ट सहमत है… तो देखते हैं कि आगे आगे क्या होता है… फिलहाल हमें भी लगता है की गुप्ता जी गुप्त तरीके से कुछ गुणा तो जरूर कर रहे थे.. अन्यथा मतदान प्रपत्र-फार्म 6 जो वास्तव में सिर्फ बालिक होने की दशा में पहली बार नागरिकों को भरने के लिए हमारे लोकतंत्र में कानून बना है, इस फॉर्म 6 में पुनः प्रवेश यानी जिनको गुप्ता जी ने गुप्त तरीके से गायब कर दिया था उनकी संख्या करीब 9 करोड़ नागरिकों की है उनमें से कुछ लोगों को स्वयं छूट दे रहे हैं कि वह फिर से प्रपत्र 6 भर कर मतदाता बन सकते हैं… मजे की बात यह है या विरोधाभाषिया है.. कहते हैं इसमें शपथ का भी एक कलम है कि इसके पहले वह कभी देश का मतदाता कहीं भी नहीं रहा है जबकि गुप्ता जी ने उसे गायब कर दिया था इसके कारण वह मतदाता सूची से गुप्त हो गया था.. उसे अब इस प्रपत्र 6 में झूठी शपथ भरवा कर मतदाता बनाया जा रहा है.. तो भाई बहुत कुछ गड़बड़-झाला है इन्हीं सब चीजों के लिए जंतर-मंतर का वह टीला यानी स्थान बना था, जहां नागरिक अपने दर्द को बयां कर सके यानी घंटा बजा सकेलोकसत्ता की दरबार का और उसे वहां न्याय मिल सके… तो जंतर-मंतर के जादू को खत्म करने का घोषणा कर दी गई है. तो क्या न्याय मिलेगा…? देखते हैं, लोकतंत्र की न्यायपालिका में अभी भी बहुत दम है… पंच परमेश्वर की कथा मुंशी प्रेमचंद जी ने लिखा था की कैसे पद में बैठने के बाद व्यक्ति न्याय की भाषा बोलने लगता है अब तक तो न्यायपालिका से यही आशा है…. (फोटो जनसत्ता आभार)

