
तो संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंटोनिया गुतारेस की नजर भारत में राहुल गांधी के मानहानि के मामले में हुई सजा पर नजर है, यह बात उनके उपप्रवक्ता फरहान हक के हवाले से सामने आई है. हक की माने तो कॉन्ग्रेस पार्टी क्या अपील कर रही है इस पर भी नजर रख रहे हैं… यानी पल-पल की नजर संयुक्त राष्ट्र.., भारत की लोकतंत्र के मामले में रखा जा रहा है. भलाई भारत के प्रधानमंत्री लोकतंत्र में चल रहे नकारात्मक आंधी पर कोई टिप्पणी न करना चाहे किंतु देश और दुनिया इस बात को नजरअंदाज नहीं कर पा रही है कि कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष के मामले में भारत की न्यायपालिका की कार्यप्रणाली क्या है…? और वह किस प्रकार से न्यायिक व्यवस्था को स्थापित कर रही है..? क्योंकि मामला मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का है इसलिए इस पर भलाई कोई असहमति हो सब भारत के न्यायपालिका के सम्मान के कारण फिलहाल कुछ बोलने से बच रहे हैं ….किंतु इस फैसले से असहमति जता रहे हैं. क्योंकि यह लोकतंत्र के नैतिक तौर तरीके और बोलचाल की भाषा की सहज प्रवृत्ति के खिलाफ है… ( त्रिलोकीनाथ )
इसमें कोई शक नहीं है कि कानून अपना काम करता है और हजारों साल की परंपरा रही है कि जब भी कोई बारात किसी के घर जाती है तो उसका स्वागत गालियों से होता रहा है… यानी भरे समाज में गालियां दी ही जाती रही है.. यह जब सकारात्मक माहौल होता है, तब होता है और दूसरा पक्ष गालियों के देने की कीमत गारी नामक ढेर सारे मिठाई फल और मेवे के रूप में उपहार में दिए जाते रहे हैं ताकि टोटका या बहुत मिठास में कीड़े ना पड़ जाए, यह भी एक नजरिया हो सकता है.. किंतु यह परंपरा रही. अब हम लोकतंत्र में आ गए हैं, एक ऐसे लोकतंत्र में जहां उनके अनुसार 2014 में आजादी स्थापित हुई है.. तब से लगातार प्रयोग चल रहे हैं की गाली देने वाली परंपरा की हत्या कर दी जाए या कोई भी व्यक्ति यदि विरोध में बोलता है तो उसकी मूलवंश को ही नष्ट कर दिया जाए…
विरोधी या आलोचना के मामले में एक बात और कही गई है निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय बिन साबुन पानी बिना निर्मल करे सुभाय यानी आलोचक को अपने आंगन में कुटिया के अंदर रखना चाहिए, जो आपको सतर्क करता रहता है और पवित्र/निर्मलता भी आपके स्वभाव में लाता रहता है… अब वह दौर खत्म हो चला है, न्यायपालिका एकमात्र भारतीय लोकतंत्र की ऐसी संस्था बची है जिससे इस प्रकार की निर्मलता की अपेक्षा पूरी तरह से जिंदा है… राहुल गांधी के मामले में जिस तरह की फैसला आया है वह कानूनी नजर से भलाई सही हो किंतु आलोचना या आलोचक उसे लोकतंत्र की भाषा में फ्रीडम आफ स्पीच, बोलने की स्वतंत्रता भी कहा जाता है… उस पर ताला लगाती नजर आती है. और यह बात इस फैसले में अप्रत्यक्ष रूप से स्थापित होती है ….?
भलाई फैसला गुजरात इंडिया (ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं )के वातावरण में सूरत शहर में हुआ हो, किंतु इसका असर पूरे भारतीय लोकतंत्र और संयुक्त राष्ट्र संघ में भी सीधा प्रभाव डाल रहा है.. संयुक्त राष्ट्र संघ प्रमुख के प्रवक्ता के हवाले से यह बात स्थापित भी होती है. तो क्या अब हमें गुजरात इंडिया (ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं )के एक अन्य कारोबारी अंबानी के शहडोल में स्थापित रिलायंस इंडस्ट्रीज के मामले में यह धारणा बना लेनी चाहिए कि उनके खिलाफ हम सूचना बंद कर दें…?
वैसे भी शहडोल का खनिज विभाग, मध्यप्रदेश का खनिज विभाग आंख-कान-नाक सब बंद करके रिलायंस इंडस्ट्रीज कंपनी के द्वारा बिना अनुबंध के शहडोल से निकाली जा रही सीबीएम गैस लगातार काम कर रही है… ऐसे में क्या हमें भी यह संदेश न्यायपालिका के हवाले से मिल रहा है कि हमें अब चुप हो जाना चाहिए…? क्योंकि जब भी हम गैर कानूनी अनुबंध के गैस निकाली के मामले में बात करते हैं तो कहीं ना कहीं भाषा थोड़ा सा सिस्ट तरीके से अशिष्ट हो जाती है… और इसी अशिष्टता को अगर उन्होंने स्थापित किया…; न्यायपालिका में यह मानहानि है,तो हम उसे उनके वातावरण में कैसे सही कर पाएंगे…? क्योंकि न्यायपालिका बोलने की मंशा पर अपना निर्णय नहीं सुना पाई है…. बल्कि बोले गए शब्दों पर उन्होंने राहुल गांधी को 2 साल की सजा सुना दी है…, जबकि राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया था की उनकी कोई ऐसी मंशा नहीं थी.. अब सवाल उठता है कि अगर हमारी मनसा यह हमारी सोच य हमारी धारणा कितनी भी पवित्र क्यों ना हो किंतु अगर हमने शब्दों का चयन मर्यादित भाषा में नहीं किया है तो कानून का डंडा हमारे सिर पर चल जाएगा… उनकी इच्छा होगी तो… क्योंकि यह मामला स्वविवेक से न्यायपालिका के पीठासीन सीजीएम को करना होता है…
तो हमें 100% अब यह डर सताने लगा है इस लोकतंत्र में जो कानूनी दांवपेच में बोलने पर प्रतिबंध लगाता है हमें कितना बोलना चाहिए…? अथवा यह बोलने का रिस्क क्यों लेना चाहिए हमें…
तो ठीक कहा था सुब्रमण्यम स्वामी (पूर्व मंत्री) ने की डर कर रहना चाहिए… तब जबकि एनडीटीवी ग्रुप में पहली बार छापा पड़ा था. अब तो एनडीटीवी ग्रुप को गुजरात इंडिया (ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं )के कारोबारी ने हाईजैक कर लिया है या खरीद लिया है.. यह अलग बात है की इसकी कीमत उस कारोबारी को बड़ी भयानक चुकानी पड़ी है. और उसी भयानकता का यह परछाई है.. कि जो भारतीय लोकतंत्र में बोलने की आजादी को कानून की जंजीर में जकड़ ने जा रही है….
बहरहाल हमने तो तय किया है की लोकतंत्र हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.. और अगर इसे लाखों लोगों के बलिदान के बाद धोखे से पा ही लिया गया है… तो चाहे किसी भी कीमत पर इसे बचाया जा सके तो बचाना चाहिए…. बहरहाल जनसत्ता में एक खबर इस हंगामे के दौर से निकलकर जबरदस्त आई है की संसद ने संचित निधि से 45 लाख करोड़ रुपए निकालकर खर्च करने का अधिकार सरकार को पारित कर दिया है… तो भविष्य में पैसे की जबरदस्त बरसात भारत में देखी जा सकती है.. जिससे लूटते बने, वह लूट ले… यह अलग बात है कि यह भी गुजरात इंडिया कंपनी( ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं )के लोगों के लिए ही हितकारी साबित होगी..
हम पांचवी अनुसूची के मूल आदिवासी प्रकृति के निवासियों को इससे कितना लाभ मिलेगा फिलहाल तय कर पाना कठिन है.. अगर आप में बोलने की आजादी फ्रीडम आफ स्पीच या बारात को गाली देने की प्रवृत्ति बदल देने या उनके अनुसार गाली देने की प्रक्रिया स्वीकार कर लेने की क्षमता है तो आप भी इस 45 लाख करोड़ रुपए के हितग्राही को सकते हैं… जिन्हें लाभार्थी भी कहा जा सकता है.
तो राम की चिड़िया, राम का खेत.. चुग ले चिड़िया भर भर पेट….. जब तक आप राम की चिड़िया नहीं बनेंगे आपको पेट भरने के अवसर नहीं मिलने वाले… यह नए भारत की आहट है, अब इसे बधाई का अवसर माने अथवा मुंह बंद करने का यह अपनी-अपनी सोच है.. फिलहाल 2014 के बाद के इस भारत का यही प्रत्यक्षण किम् प्रमाणम है (सभी कार्टून श्री आर के लक्ष्मण से साभार है)

