
एक अधिवक्ता दिल्ली के एनडीटीवी में बता रहे थे; यह बनाए गए कानून अंग्रेजो के सख्त कानून से भी 10 गुना बड़े खतरनाक कानून है। उदाहरणार्थ जिसमें प्रमुख रूप से पुलिस के हिरासत में 15 दिन की बजाय 90 दिन रखे जाने की कानून बनाया गया है इसी प्रकार से अन्य जो सुविधा लोकतंत्र के नागरिक को पुलिस कार्यप्रणाली में राहत देती थी अब वह सभी सुविधाएं लगभग लगभग बंद हो गई है। उसके कई भाग हैं मोटा-मोटा 3 महीने तक पुलिस हिरासत में रखा जाना एक निष्कर्ष भी है। जिसका उद्देश्य राजनीतिक दुरुपयोग होने की स्थिति पर आम आदमी को आर्थिक-मानसिक और शारीरिक तौर पर गुलाम बना दिया जाएगा। उसने अपराध किया हो अथवा न किया हो उसे इस प्रताड़ना और अपमानजनक स्थिति से गुजरना पड़ेगा। यह नए भारत के राम राज्य का नया संकेत है।
…………………………….(त्रिलोकीनाथ)…………………………..
हमारे शहडोल के एक प्रतिष्ठित परिवार के हमारे वरिष्ठ सदस्य अपना अनुभव साझा कर रहे थे, कि किस प्रकार से इमरजेंसी ( आपातकाल) के दौरान तत्कालीन मंत्री कृष्ण पाल सिंह ने उनके पिता जी को अपनी नाराजगी का कारण बनाया, जिसके कारण पूरा परिवार एक महीने से ज्यादा प्रताड़ित हुआ| उन्होंने कहा की पिताजी ने एक ऐसे व्यक्ति की जमानत ली थी जो कृष्णपाल सिंह को पसंद नहीं था| तब इमरजेंसी के दौरान धारा 151 के तहत उनके पिताजी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया । दो-तीन बार एसडीएम के यहां से मिलने वाली जमानत को खारिज कर दिया गया। और खोजते खोजते दयावान अधिकारियों ने धीरे-धीरे बताया कि ऐसे निर्देश कृष्णपाल सिंह की तरफ से आ रहे हैं । तब अंततः भोपाल जाकर वे कृष्णपाल सिंह से मिले। जिसका आवभगत कृष्णपाल सिंह ने बड़ी कूटनीतिक-आत्मीयता के साथ किया और आश्वासन दिया कि वह घर जाएं उनका काम हो जाएगा। ऐसा करके दो चक्कर भोपाल में लगाया गया किंतु पिताजी को जेल से बाहर निकालने के लिए जमानत नहीं मिली।
उन्होंने यह भी बताया की खबर मिली की रिश्वत-राशि अगर दी जाए तो काम हो जाएगा, कृष्णपाल सिंह के तत्कालीन लिंक इटारसी में रहते थे उन्होंने उसके लिए संपर्क साधा और लिंक ने अपना काम भी किया किंतु लौटकर उन्हें बताया कि हमारे क्षेत्र के लोगों से यदि पैसा लोगे तो हमारे लिए अच्छा नहीं कहलाएगा और उन्हें भी वापस लौटा दिया गया । पिताजी को 151 में जमानत नहीं मिली। परिवार में लगातार प्रताड़ना होती रही। पूरा परिवार परेशान था अंततः जब कृष्णपाल सिंह बुढ़ार अपने निवास में आए तो उनकी घेरेबंदी करके मैंने दबाव बनाया और इस दबाव को महसूस करके उन्होंने अपनी नाराजगी को दूर करते हुए कलेक्टर को जमानत देने का आदेश दिया।
यह घटना तत्कालीन भारतीय कानून की धारा 151 के दुरुपयोग की बड़ा उदाहरण है, कि मामूली सा कानून कैसे पूरे परिवार को महीना प्रताड़ित करके रखा। यह संयोग है कि जब यह घटना कि हम चर्चा कर रहे थे उसके बाद हमें पता चला की कानून में फेर बदल के लिए भारतीय जनता पार्टी सरकार ने भारी भरकम बदलाव करके नए कानून व्यवस्था बना दिए ।
तथाकथित तौर पर एक अधिवक्ता दिल्ली के एनडीटीवी में बता रहे थे; यह बनाए गए कानून अंग्रेजो के सख्त कानून से भी 10 गुना बड़े खतरनाक कानून है। उदाहरणार्थ जिसमें प्रमुख रूप से पुलिस के हिरासत में 15 दिन की बजाय 90 दिन रखे जाने की कानून बनाया गया है इसी प्रकार से अन्य जो सुविधा लोकतंत्र के नागरिक को पुलिस कार्यप्रणाली में राहत देती थी अब वह सभी सुविधाएं लगभग लगभग बंद हो गई है। उसके कई भाग हैं मोटा-मोटा 3 महीने तक पुलिस हिरासत में रखा जाना एक निष्कर्ष भी है। जिसका उद्देश्य राजनीतिक दुरुपयोग होने की स्थिति पर आम आदमी को आर्थिक-मानसिक और शारीरिक तौर पर गुलाम बना दिया जाएगा। उसने अपराध किया हो अथवा न किया हो उसे इस प्रताड़ना और अपमानजनक स्थिति से गुजरना पड़ेगा। यह नए भारत के राम राज्य का नया संकेत है।
आम नागरिक को नए कानून के बारे में बहुत सारी चर्चाएं और बहुत सारी बहस की जरूरत होनी चाहिए, किंतु जिस प्रकार से कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपना बयान जारी किया है कि सांसदों का निलंबन पूर्व नियोजित था और तो क्या वह कहना चाहते हैं इसी दौरान लोकसभा और राज्यसभा में इन कानून को पारित किया गया….? तो क्या मानकर चल जाए कि भारत की स्वतंत्रता एक नए स्वतंत्र मार्ग पर चल पड़ी है….?
क्योंकि धारा 151 बहुत छोटी सी धारा थी और उसका दुरुपयोग बहुत बड़ा था जो गैर कानूनी प्रयोग था अब जैसा की तथाकथित पर तौर पर चर्चा हो रही है की जो नई धाराएं बनाई गई हैं उसके तहत धारा 151 या कानूनी धाराएं अब दुरुपयोग की श्रेणी में दुरुपयोग नहीं कही जा सकती की बल्कि वह कानून सम्मत संविधान सम्मत उपयोग की श्रेणी में आ जाएगा। और चुंकी संसद के अंदर इस पर बहस होती और चर्चा होती इसलिए इस बहस को नहीं होने दिया गया.. ऐसा आप नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सांसदों के निलंबन को लेकर लगाया है
और उससे ज्यादा खतरनाक यह है कि यह एक एक्सीडेंटल घटना थी की कुछ तथाकथित बेरोजगार युवक संसद के अंदर घुसकर संसद को धुआं-धुआं कर दिए अथवा यह भी क्या नियोजित था…? यह एक खतरनाक विषय वस्तु है जिसका पारदर्शी होना अति आवश्यक है। किंतु यह भी महिनों सालों होने वाली जांच की श्रेणी में चला गया दिखता है। और अगर संयोग से अथवा दुर्घटना से सांसदों के निलंबन के नियोजित होने के आरोप के दायरे में संसद में सेंधमारी की घटना जुड़ती है तो भारत का भविष्य राम भरोसे ही समझना चाहिए…. और यह भी समझना चाहिए कि भारत का रामराज्य किस सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ चला है…?
पत्रकारिता में काम करने वाले बहुसंख्यक अवैतनिक पत्रकारों को विशेष तौर पर राम-राज्य के लिए अपना रुख सोच समझकर उठाना चाहिए क्योंकि आजाद भारत में सबसे बड़ा जोखिम और धोखा दोनों ही पूंजी सिर्फ पत्रकारों के पास है और वह साधु संत नहीं है.. इसलिए पत्रकारों को लोकतंत्र की चल रही राम-राज्य की आंधी में शुतुरमुर्ग की तरह पारिवारिक सुरक्षा की प्राथमिकता पर सर्वोच्चता से ध्यान देना चाहिए। यही 2023 का विदाई आलेख है और 2024 के राम-राज्य की शुभकामना का संदेश है कि “होई हें वही जो राम रचि राखा…..”
क्योंकि हम गुलाम भारत में नहीं रह रहे हैं कड़वा सच है कि हम स्वतंत्र भारत में अपने ही बने कानून की स्वतंत्रता में रह रहे हैं …..… इसलिए भी अवश्य जो कानून में बदलाव किए गए हैं उन्हेंहर नागरिक को पढ़ने और कमसे कम समझना तो चाहिए ही बाकी तो सब राम-भरोसे है…….

