
नव-धर्मसंप्रदाय संस्थापनार्थाय…. ,

अब सब कुछ पारदर्शी है यह शिकायत भी निराधार है की कुछ छुपा कर हो रहा है इतना पारदर्शी प्रशासन इतिहास में कभी नहीं देखा गया तो हम नए धर्म की चर्चा करेंगे, बलात-कार्य का धर्म …|
क्या आजाद भारत में बलात-कार्य का भी एक धर्म स्थापित हो रहा है और उसे मान्यता मिल रही है..? यह प्रश्न 21वीं कि भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान दौर में कहा जाता है भारत में 40% युवा जनसंख्या है यानी युवा भारत को बलात-कार्य का धर्म उसकी दशा और दिशा को प्रभावित कर सकता है… कि उसे किस मार्ग पर चलना है।
………………………..( त्रिलोकीनाथ )……………………………
तो सबसे पहले बलात-कार्य शब्द का अर्थ समझ लें, “ऐसा कार्य जो बलात किया जाए, जिसमें स्वीकार्यता ना हो… वही बलात-कार्य कहलाता है” फिर वह शारीरिक संबंधों की बात हो अथवा अन्य क्षेत्र धर्म , राजनीति इत्यादि की बात हो सबका बलात-कार्य हो सकता है।
हाल में जिन दैहिक यानी शारीरिक बलात्कारों को भारतीय मीडिया में चर्चा मिली है
यानी वह चर्चित रहे हैं उसमें मणिपुर में बलात्कार, भारतीय कुश्ती संघ में भारतीय जनता पार्टी के सांसद बृजभूषण का बलात-कार्य और यौन प्रताड़ना तथा काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आई.आई.टी. छात्रा के साथ गैंगरेप (सामूहिक बलात्कार) का घटना सर्वाधिक चर्चा का विषय रहा है। और इन बलात्कारों को सत्ता का संरक्षण भी जमकर मिला। यदि न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं करती तो यौन प्रताड़ना और शारीरिक बलात्कारों के बलात्कारी चर्चित( यानी उनके अपने समाज में लोकप्रिय) नहीं होते…
इन सबसे हटकर के 2024 के शुरुआत में न्यायपालिका ने करीब दो दशक पहले हुए गुजरात में एक युवा लड़की बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार कि उसे सार्वजनिक मान्यता को और उसकी स्वीकार्यता को खत्म कर दिया है । अपने फैसले में बलात्कारियों को महिमा मंडित किया जाने और उन्हें छूट दिए जाने पर प्रश्न चिन्ह उठाते हुए गुजरात सरकार को बलात्कारियों के पक्ष में, पक्षपाती होने और न्यायपालिका को धोखा देकर के बलात्कारियों के संरक्षण पर कई प्रश्न चिन्ह खड़े किए हैं( यह अलग बात है की मुख्यमंत्री या मंत्रियों की शपथ में “बिना-पक्षपात…” की बात की भी शपथ शर्त की बात लिखी होती है ) तथा छोड़ दिए गए बलात्कारियों को पुनः दंड भोग के लिए जेल जाने कानिर्देश दिया है।
यह भारतीय संविधान की निष्पक्षता और न्याय को और आम भारतीय में लोकप्रिय बनता है। 21वीं सदी का राजनीति में बलात-कार्य प्रेमियों और उस समाज के लिए यह चेतावनी भी है की शारीरिक बलात्कार को मान्यता नहीं दी जा सकती है। यह अपराध की श्रेणी में ही आता है। यही भारतीय दंड विधान ने सुनिश्चित कर रखा है।
किंतु अन्य क्षेत्रों में बलात्कार की स्वीकार्यता को अभी भी अलग-अलग तरीके से महत्व मिलता है और उसे कानून सम्मत भी बना दिखाया जाता है जैसे वोट बैंक की ताकत से हरियाणा का डेरा सच्चा सौदा का राम-रहीम बाबा न्यायालय से तो दंडित हो गया दो-दो बलात्कार के लिए और हत्या के लिए भी ,लेकिन सरकार ने अपने वोट के लिए उसे कानून सम्मत छूट देती रही है।
यानी सत्ता को अगर जरूरत है तो वह *बलात्कार के धर्म” को स्वीकार्यता देती है यह बात उसकी वोट-बैंक की ताकत से सुनिश्चित होती है। जबकि उनके अपने करोड़ों शिष्यों के बीच में लोकप्रिय बलात्कारि संत आसाराम और उसके लड़के को यह छूट नहीं मिलती क्योंकि उसकी वोट बैंक की ताकत नहीं है। इसलिए इसके बलात्कार के धर्म को खारिज कर दिया जाता है । 21वीं सदी में बलात-कार्य का धर्म की सत्ता की नजर में यही व्याख्या है…..।
यह शारीरिक बलात्कार करने वालों के अन्य ढेर सारी कई उदाहरण देखने को मिल जाएंगे जैसे मणिपुर में बलात्कारियों के मामले में नजरअंदाज किया जाना या उन पर कड़ी कार्यवाही के लिए मौन-साधना रखना भी एक प्रकार का बलात्कार धर्म है…
अब अयोध्या में नए प्रकार के भव्य इमारत पर अरबो रुपए लगाकर के राम-मंदिर की स्थापना की गई है इसमें बहुमत वाले संतो के और वोट बैंक के आधार पर “लोकतंत्र के राम” की स्थापना होने वाली है। जिसकी प्राण-प्रतिष्ठा, आधे अधूरे मंदिर में ही आगामी लोकसभा के चुनाव के मद्दे नजर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जागरूकता और चेतना के साथ हजारों करोड रुपए लगाकर की जा रही है।
जिसका सनातन धर्म से मतभेद है क्योंकि सनातन धर्म के प्रवर्तक आदि गुरु शंकराचार्य के चारों पीठ की शंकराचार्य की उपस्थित सुनिश्चित नहीं की गई है। दो शंकराचार्यों ने तो खुलकर इस “लोकतंत्र के राम” के मंदिर की स्थापना के तौर तरीके पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहे हैं और इसे स्थापित धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ बता रहे हैं। एक शंकराचार्य जी ने तो इस अरबो रुपए के बना रहे मंदिर को “एक संस्था का मुख्यालय” बता दिया है। जहां से राजनीति सत्ता को प्रभावित करती है। और इसमें कुछ बुरा भी नहीं है क्योंकि इस राम-मंदिर के निर्माण कर्ताओं ने इसे “राष्ट्रवाद का मंदिर” कहा है, तो क्या यह बलात् “लोकतंत्र के राम” की स्थापना हो रही है..? जो सनातनी मर्यादा पुरुषोत्तम राम से पृथक राम होंगे..,अथवा नई भव्य इमारत के प्रमुख प्रवक्ता चंपत राय के शब्दों में विष्णु के अवतार नरेंद्र मोदी वाले राम होंगे ..?
जिसमें सनातन प्रवर्तकों को कुछ इसी प्रकार से खारिज किया जा रहा है जैसे राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरे रहे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, प्रवीण भाई तोगड़िया आदि आदि नेताओं व लोकतांत्रिक संतों को बकायदे पारदर्शी तरीके से पत्रकार वार्ता में बन रहे राम मंदिर के वर्तमान प्रवर्तक चंपत राय ने यह कह कर निमंत्रण दिया है कि उन्हें इस राम मंदिर में नहीं आना चाहिए… क्योंकि वह उम्र-दराज हो चुके हैं तो क्या हमारी व्यवस्था इतनी कमजोर और अक्षम हो गई है की मंदिर के प्रमुख आंदोलनकारी को ही खारिज कर रही है… उनके साथ वैचारिक पारदर्शी बलात्कार कर रही है की निमंत्रण तो दिया जाएगा किंतु आप आएंगे नहीं…? अन्यथा इन बयो-वृद्ध चेहरों को अपमानित किया जा रहा है कि वह अपने घर में बैठकर यह प्रायश्चित करें कि उन्होंने जो कार्य किया था अद्यतन स्थिति में उसके साक्षी वह नहीं बन सकते…? क्या उनके साथ वैचारिक बलात्कार हो रहा है…?
अन्यथा उनके अपने विचारधारा के ही लोगों को उम्र के हिसाब से उन्हें समुचित व्यवस्था देकर सम्मानित तरीके से लोकतंत्र के राम का दर्शन लाभ प्रत्यक्ष में क्यों नहीं दिया जा सकता..? हो सकता है लोकतंत्र में उनके इस आंदोलन में रामलला के दर्शन से मोक्ष प्राप्त हो जाए…? अथवा चंपत राय जैसों को मालूम है कि जिस राम को वह स्थापित करते हैं कर रहे हैं वह “लोकतंत्र के राम” हैं जहां पर इन मतभेद वाले राजनीतिक पृष्ठभूमि के नेताओं की कोई जरूरत नहीं है…? क्योंकि इससे वोट बैंक बिगड़ सकता है…?
और इसीलिए इस उम्र में भी उनके विचारों के साथ बलात-कार्य करते हुए उन्हें खारिज किया जा रहा है , यह प्रश्न हमेशा मंदिर के भविष्य के साथ भी खड़ा रहेगा कि यह कैसा बलात का धर्म है…? क्योंकि अगर बलात्कार का विचार याने शारीरिक बलात्कार अथवा मानसिक बलात्कार का कोई स्थापित भी किया जा रहा है तो उसमें भी प्रदर्शित क्यों नहीं है…? क्या नैतिकता का धर्म, बलात-कार्य के धर्म से अब ऊंचा हो चला है.…. और राजनीति में नैतिकता और सुचिता कि संभावना अभी भी जिंदा है…? यह भी बड़ा प्रश्न है….
क्योंकि जब तक राजनीति का रहस्य पारदर्शी नहीं होगा तब तक यह भ्रम बरकरार रहेगा। धीरे-धीरे पूरे समाज में इस धर्म की स्थापना हो जाएगी रहस्य के और रोमांच के धर्म की निरंतर उसका नाम जरूर परिवर्तित कर देगी। तो कहा जा सकता है अ-धर्म (अतिरिक्त धर्म) की स्थापनाकर नव-धर्म, कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री का बलात-कार्य ही है और यदि वह है तो यह किस प्रकार के समाज का निर्माण करेगी…? जो आदि शंकराचार्य सिद्धांतों से मुक्त होगा,जिसमें शंकराचार्य खारिज कर दिए जाएंगे, जो सनातन धर्म का नकाब तो ओड़ेगी लेकिन उसे मुरली मनोहर जोशी लालकृष्ण आडवाणी जैसे लोगों की तरह मार्गदर्शक मंडल में रखना पसंद करेगी । क्योंकि यही उनके “राष्ट्रवाद के मंदिर” में लोकतंत्र के नए राम की चाहत है…? बावजूद इसके उनमें साहस नहीं है कि वह उसे रामलला को छोड़ सकें जो पूर्व से प्राण प्रतिष्ठित हैं जिनकी कौशल्या माता है.. क्योंकि यह कड़वा सच है उन्हें प्रतिष्ठित रामलला को सामने रखकर राष्ट्रवाद का यह मंदिर जाकर लिया था पवन अयोध्या की धरती पर जो अब उन आदि शंकराचार्य के सिद्धांतों को खारिज करके नव धर्म संस्थानार्थाए की घोषणा कर रहा है एक नई मूर्ति के साथ इस प्रकार का प्रयास पूर्व में लोकतंत्र में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपने सत्ता के दुरुपयोग करके स्वयं की मूर्तियां स्थापित करते हुए प्रदर्शन किया था जिसे सत्ता जाने के बाद लोकतंत्र के हीसुप्रीम कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया है। अब अब कॉर्पोरेट पॉलिटिकल इंडस्ट्री ने अपने लक्षण की प्राप्ति के लिए नव-धर्म संस्थापनार्थाय शंकराचार्य से मुक्त एक नए हिंदू सनातन धर्म की घोषणा करने जा रही है इसका भविष्य सत्ता के बरकरार रहने पर ही टिका होता क्योंकि मूल रूप से भारत आदि शंकराचार्य किस सिद्धांतों पर ही हजारों साल से सनातन धर्म को स्वीकार करता रहा है और करता रहेगा इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए जैसे अयोध्या राम की है और राम अयोध्या के हैं वैसे ही हिंदू सनातन धर्म शंकराचार्य से प्रभावित होता है और शंकराचार्य ही हिंदू धर्म के अब तक प्राण हैं और शायद यही कारण है वर्तमान सत्ता से प्रभावित नवधर्म मोदीनंदाचार्य चंपत राय जैसी लोग नरेंद्र मोदी को विष्णु का अवतार बताकर उन्हें इस राष्ट्रवाद के मंदिर में रामलला के सहारे स्थापित करने लगे हैं।
आरएसएस के हिंदुओं की यह मजबूरी है कि वह इसे स्वीकार कर लें किंतु आदि गुरु शंकराचार्य के सनातन चारों पीठ के शंकराचार्य की यह मजबूरी क्यों होगी..? क्यों वह नरेंद्र मोदी को और उसके उनके इस अघोषित नव-धर्मसंप्रदाय मोदीनंदाचार्य को स्वीकृति देंगे…?
वह युग गया, जब रथ में आडवाणी, राम बनकर घूमते थे अब विष्णु के नए अवतार नरेंद्र मोदी की घोषणा चंपत राय अपने नए राष्ट्रवाद के मंदिर से कर चुके हैं तो क्या आडवाणी जैसे लोगों के लिए यही उनका दंड भी है या उनके पुण्य का प्रतिफल भी..? और इसी के तले नवीन समाज यानी लोकतंत्र के राम की स्थापना अर्ध निर्मित मंदिर में हो रही है… क्योंकि यही वर्तमान जगत सत्य है और ब्रह्म मिथ्या है…की घोषणा भी है..? और इसी भ्रम और भ्रामक आवरण में 21वीं सदी का भारत कुलांचे भर रहा है। युवाओं को भविष्य या भविष्य के युवा गढे़ जा रहे हैं…? और यही लोकतंत्र के नव-धर्मसंप्रदाय संस्थापनार्थाय…. धर्म का सत्य है, यानी प्रत्यक्ष है, और घट रही घटनाएं प्रमाण है…. यही आज का प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम् है.. (त्रिलोकी नाथ)

