मस्क की याचिका ,नूरा-कुश्ती या फिर गुलाम हो चुकी व्यवस्था का संदेश…?

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एक्स’ ने केंद्र के खिलाफ मामला दायर कियाअमेरिकी अरबपति  मस्क की कंपनी ने आइटी अधिनियम के दुरुपयोग का लगाया आरोप

  एलन मस्क की कंपनी 'एक्स' ने कर्नाटक हाईकोर्ट में दायर की याचिका, कहा- आईटी  एक्ट का गलत इस्तेमाल हो रहा है – जनचौक   अगर यह प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिकी मित्र डोनाल्ड ट्रंप की मित्रता का नूर कश्ती का निर्वहन है तो भारत की लोकतंत्र में एक नया अध्याय की शुरुआत मानी जानी चाहिए किंतु अगर यह अधिकारों को पाने की चुनौती है भारत के अंदर घुसकर के लोकतांत्रिक अधिकारों की जागरूकता का प्रमाण है तो यह भारतीय पत्रकारिता के लिए बेहद शर्मनाक और चिंतन का अवसर है कि आखिर भारत की पत्रकारिता अथवा सोशल मीडिया में यह ताकत क्यों नहीं आई कि वह कोर्ट में खड़ा होकर यह कह सके की लोकतांत्रिक अधिकार अभिव्यक्ति का अधिकार उसका सार्वभौमिक अधिकार है और उसे रुक नहीं जा सकता अथवा यह मन की भारतीय पत्रकारिता का मुख्य लाइन की पत्रकारिता लगभग गुलाम हो चुकी थी तब अमेरिकी सोशल मीडिया का प्रमुख एलन मस्क भारत के न्यायालय में आकर के न्याय प्रक्रिया को इस बात का आगाह किया कि उनका लोकतंत्र वास्तव में लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में काम नहीं कर रहा है और वह दबाव बनाकर अनैतिक रूप से लोकतंत्र में सोशल मीडिया को दबा रहा है तो लिए समझते हैं कि इस मामले को जो की डोनाल्ड ट्रंप के मित्र एलन मस्क ने भारत के कर्नाटक राज्य में हाईकोर्ट में सोशल मीडिया के अधिकारों को लेकर के न्यायालय में चुनौती दी है इस मामले में दैनिक जनसत्ता लिखता है।

अमेरिकी अरबपति एलन मस्क की स्वामित्व वाली सोशल मीडिया कंपनी “एकर(पूर्व में ट्विटर) ने भारत सरकार के खिलाफ कर्नाटक हाई कोर्ट में एक बाद दायर करके कथित ‘गैरकानूनी सामग्री विनियमन और मनमाने सेंसरशिप’ को चुनौती दी है।’एक्स’ ने सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) अधिनियम की केंद्र की व्याख्या, विशेष रूप से उसके द्वारा धारा 79 (3) (बी) के उपयोग पर चिंता जताई, जिसके बारे में ‘एस’ ने दलील दी है कि यह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लंघन है और डिजिटल मंच पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमतर करता है। बाद में मस्क की कंपनी एक्स ने मामला दायर करके ‘गैरकानूनी सामग्री विनियमन और मनमाने सेंसरशिप’ को चुनौती दी है। के फैसले के विरोधाभासी है, जिसमें यह स्थापित किया गया था कि सामग्री को केवल उचित न्यायिक प्रक्रिया या धारा 69ए के तहत कानूनी रूप से परिभाषित माध्यम से ही अवरुद्ध किया जा सकता है।
आरोप लगाया गया है कि सरकार गारा ८७८ में उल्लिखित कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए. एक समानांतर सामग्री अवरोधन तंत्र बनाने के लिए उक्त धारा का इस्तेमाल कर रही है। एक्स’ ने दावा किया कि यह दृष्टिकोण श्रेया सिंघल मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2015 सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अनुसार, धारा 79(3) (बी) आनलाइन मंचों को
अदालत के आदेश या सरकारी अधिसूचना द्वारा निर्देशित होने पर अवैध सामग्री को हटाना अनिवार्य करती है। मंत्रालय के अनुसार, यदि कोई डिजिटल मंच 36 घंटे के भीतर अनुपालन करने में विफल रहता है, तो उसे धारा 79(1) के तहत संरक्षण गंवाने का जोखिम होता है। और उसे भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) सहित विभिन्न कानूनों के तहत जवाबदेह

एक्स’ ने केंद्र सरकार के खिलाफ मामला दायर किया सकता है। हालांकि, ‘एक्स’ ने इस व्याख्या को चुनौती दी है और दलील दी कि यह प्रावधान सरकार को सामग्री को अवरुद्ध करने का स्वतंत्र अधिकार नहीं देता है। ‘एक्स’ ने प्राधिकारियों पर उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना मनमाने ढंग से सेंसरशिप लगाने के लिए कानून का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया। 
आइटी अधिनियम की धारा 69ए के तहत, सरकार को डिजिटल सामग्री तक सार्वजनिक पहुंच को अवरुद्ध करने का अधिकार है, यदि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा पैदा हो। हालांकि, इस प्रक्रिया को 2009 के सूचना प्रौद्योगिकी (सार्वजनिक रूप से सूचना तक पहुंच की अवरुद्ध करने की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय)
नियमों द्वारा विनियमित किया जाता है, जिसके तहत अवरुद्ध करने के निर्णय लेने से पहले एक समीक्षा प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। एक्स’ ने दलील दी है कि इन प्रक्रियाओं का पालन करने के बजाय, सरकार 79 (3) (बी) का उपयोग एक ‘शार्टकट’ उपाय के रूप में कर रही है, जिससे सामग्री को आवश्यक जांच के बिना हटाया जा सकता है।
उसने कहा कि सोशल मीडिया मंच इसे उन कानूनी सुरक्षा उपायों के प्रत्यक्ष उल्लंघन के रूप में देखता है जो मनमाने सेंसरशिप को रोकने के लिए हैं। सोशल मीडिया मंच की कानूनी चुनौती में एक और प्रमुख बिंदु सरकार के ‘सहयोग’
पोर्टल का विरोध है। गृह मंत्रालय के तहत, भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आइयसी) द्वारा स्थापित यह पोर्टल धारा 79(3) (सी) के तहत हटाने के अनुरोधों को कारगर बनाने और सोशल मीडिया मंच और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सीधे संवाद की सुविधा के लिए तैयार किया गया था। बाद में दलील दी गई है कि यह न्यायिक निगरानी के बिना आनलाइन मंचों पर विमर्श को नियंत्रित करने का सरकार का एक और प्रयास है।
तो सवाल तो यह उठता ही है कि आखिर भारतीय मुख्य लाइन का पत्रकारिता प्रकार करने वाले अथवा सोशल मीडिया पर नजर रखने वाला समाज क्यों पीछे रह गया अथवा उसे इस बात को सिद्ध करना चाहिए के एलन मस्क की नूरा कुश्ती के कारण ही कर्नाटक में एलन मस्क की कंपनी ने यह मामला तैयार किया है…

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