
तो पहले हम आदिवासी विशेष क्षेत्र के शहडोल नगर में तमाम जल स्रोतों की जिसमें तालाब हैं ,नदियां हैं नाला हैं और जल बावली जल स्रोत हैं उनकी हत्या करते हैं… जलस्तर नष्ट करते हैं ..बाद में शुल्क लगाकर आम जनता का खून चूसने का कानून बनाते हैं.. यही शहडोल की नियत बनती जा रही है..? क्या अगर हम किरण टॉकीज के पास स्थित जल बावली की रक्षा करने वाले जन लोक आंदोलन को सुरक्षा और प्रोत्साहन नहीं दे रहे हैं… यही शहडोल की कड़वी सच्चाई और हमारी गुलामी का मॉडल है…?
( त्रिलोकी नाथ )
भारत के संविधान निर्माता दल में शहडोल के निवासी पंडित शंभूनाथ शुक्ल भी एक सदस्य थे, वह बिन्ध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री भी थे फिर बाद में मध्य प्रदेश शासन में भी मंत्री रहे। संविधान निर्माण करते वक्त संविधान की पांचवी अनुसूची में विशेष आदिवासी क्षेत्र का चयन किया गया और उसमें शहडोल क्षेत्र जिसमें उमरिया और अनूपपुर जिला भी उस समय रहा, उसे शामिल किया गया. निश्चित तौर पर उस समय हमारे बुद्धिमान नेताओं ने कुछ तो सोच रहा होगा.. इस आदिवासी क्षेत्र को भी लेकर इसकी प्राकृतिक संसाधन से पूर्ण संरचना और इसके पिछड़ेपन के विकास के बारे में लिखते वक्त और इसीलिए उन्होंने शहडोल को विशेष आदिवासी प्रक्षेत्र में अनुसूचित कर पांचवी अनुसूची में शामिल किया. 1996 में विशेष आदिवासी क्षेत्र के लिए कानून को स्पष्ट किया गया ग्राम सभा की ताकत को पृथक से बताया गया।
अब जब भी कभी कहीं जैसे दिल्ली राजधानी में, जो अति विकसित होने का खामयाजा भुगत रही है.. वहां पर भारत के सर्वोच्च पढ़ा लिखा डिग्री होल्डर समाज मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में जब सत्ता में आया तो उसने पहले काम यह किया की दिल्ली को मुफ्त पानी और मुफ्त बिजली की सुविधा प्रदान करने की घोषणा की अन्य सुविधाओं को भी दिया गया. यह उनके राजनीतिक निर्णय थे जिसे कहीं ना कहीं सार्वजनिक सहमति भी मिली. वह दिल्ली के अति विकसित होने का मुआवजा भी था इसमें कोई शक नहीं..
अब हिमाचल प्रदेश की सरकार ने शिमला में नई घोषणा की है उसके अनुसार नए अनुसूचित शहरी क्षेत्रों को पानी शुल्क और संपत्ति कर में छूट दी जाएगी हिमाचल की प्रदेश सरकार ने प्रदेश में हाल ही मेंनवगठित और अपग्रेड हुए शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के अंतर्गत आने वाले लोगों को बड़ी राहत प्रदान की है। इन क्षेत्रों में आगामी तीन वर्षों तक जल आपूर्ति की दरें ग्रामीण दरों पर ही लागू रहेंगी। यह निर्णय हाल ही शहरी स्थानीय निकायों में शामिल लोगों को सुगम और सहज रूप से शहरी व्यवस्था में शामिल करने के उद्देश्य से किया गया है। सरकार के प्रवक्ता ने जानकारी देते हुए बताया कि इस निर्णय से प्रदेश भर के 47,820 उपभोक्ता लाभान्वित होंगे। पानी शुल्क में रियायत के अलावा इन क्षेत्रों के निवासियों को संपत्ति कर में भी छूट प्रदान की गई है। हाल ही में किए गए प्रशासनिक पुनर्गठन के अंतर्गत सरकार ने प्रदेश में 14 नई नगर पंचायते गठित की हैं, जिनमें संघोल, धर्मपुर, बलद्वाड़ा, बनीखेत, खुंडियां, कोटला, नगरोटा सूरियां प्रशासनिक पुनर्गठन के अंतर्गत सरकार ने 14 नई नगर पंचायतें गठित की हैं। कुनिहार, झंडूता, स्वारघाट, बड़सर, भराड़ी, बंगाणा और शिलाई शामिल हैं। इसके अतिरिक्त हमीरपुर, ऊना और बद्दी को नगर निगमों में अपग्रेड किया गया है, जबकि नादौन और बैजनाथ-पपरोला को नगर परिषदों का दर्जा प्रदान किया गया है। उन्होंने बताया कि यह निर्णय शहरी निकायोंके पुनर्गठन के कारण यहां रहने वाले लोगों पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ से राहत प्रदान करने के उद्देश्य से लिया है। इससे शहरी निकायों के पुनर्गठन के दौरान इन क्षेत्रों में शामिल होने वाले लोगों का जीवन स्तर प्रभावित नहीं होगा। पानी की दरों में रियायत और संपत्ति कर में छूट से इन क्षेत्रों के निवासी बिना किसी अतिरिक्तआर्थिक दबाव के जीवनयापन कर सकेंगे।
अब हम वापस आते हैं शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र में पिछले एक महीने से शहडोल के इतिहास में पानी की समस्या को लेकर और उसकी सुरक्षा को लेकर एक लोग जन आंदोलन धरने पर बैठा हुआ है
उसकी मांग कोई ज्यादा नहीं है, उनका कहना है की जो पानी किरण टॉकीज के पास बावली के रूप में स्थापित था उसे सुरक्षित किया जाए…, क्योंकि उस बावली और उसके सामने रिक्त शासकीय भूमि ही एक मात्र ऐसी जगह है जो बाजार क्षेत्र के लोगों के जल स्तर को और जनसंख्या घनत्व के दबाव को राहत देने का काम कर सकती है. इस जल आंदोलन के क्रमिक धरना के नेता धर्मेंद्र श्रीवास्तव और उनके सभी एक महीने में क्रमिक धरना आंदोलन में धरना देने वाले तमाम लोगों का समर्पण लोक जागरूकता के लिए हमेशा इतिहास में दर्ज हो गया है इसमें कोई शक नहीं है।
हो सकता हैउस बावली जमीन के खसरा नंबर को लेकर विवाद कि जहां बावली है उसे खसरे नंबर को चिन्हित जांच डालने न किया हो… क्योंकि कलेक्टर द्वारा निर्धारित राजस्व अमले का जांच दल इस धरना आंदोलन की मांग पर जांच नहीं कर रहा था, बल्कि वह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के नजदीक होने के कारण जिला भाजपा अध्यक्ष अमिता चपरा और क्षेत्रीय विधायक मनीष सिंह तथा अन्य पार्टी संगठन के मांग के आधार पर उनके बताए हुए खसरा नंबर को चिन्हित करते हुए जमीन की जांच किया. यह अलग बात है कि उसे जांच दल ने जो जांच में पाया उससे श्रीमती अमिता चपरा का परिवार अतिक्रमण के घेरे में कथित रूप पर आ गया और उन्हें नोटिस भी दी गई है.. यह अलग बात है कि वह उस जमीन को लेकर स्थगन लेते हैं या अन्य कार्यवाही करते हैं..।
किंतु इस संपूर्ण कार्यवाही में लोक जल आंदोलन जो करीब एक महीने से चल रहा है उसकी मांगों पर कोई कार्यवाही होती दिखाई अब भी नहीं दे रही है…? यह प्रशासनिक संवेदनहीनता है उन्हें चिन्हित क्यों नहीं करना चाहिए था. कि जो जल आंदोलन की महत्वपूर्ण मांग किरण टॉकीज के पास स्थित जल बावड़ी की सुरक्षा और उसे लगी जमीन की सुरक्षा की जांच न सिर्फ गंभीरता से करनी चाहिए थी बल्कि उसे सार्वजनिक कर स्पष्ट करना चाहिए था या फिर उन धरना आंदोलन वाले लोगों को उसकी जानकारी देनी चाहिए थी कि उन्होंने जो जांच किया है वह धरना आंदोलन की गंभीरता को देखते हुए कियाहै।
ऐसा नहीं है कि जिला प्रशासन करीब 1 महीने से चल रहे इस धरना आंदोलन को नजरअंदाज कर किया हो… दो बार तहसीलदार धरना स्थल पर गई और उन्होंने धरना को खत्म करने की भी बात कही ; क्योंकि तथाकथित जांच जो जगत प्रकाश नड्डा की नजदीकी श्रीमती अमिता चपरा और विधायक की मांग पर की गई है वह पूरी हो चुकी है. और उसमें कारवाई हो रही है। तहसीलदार ने यह नहीं बताया की जल बावली को बचाने के संबंध में उनकी जांच का क्या निर्णय है…? क्योंकि खबर तो यह है की जल बावली जिस खसरे नंबर में का हिस्सा है वास्तव में उसकी जांच ही नहीं हुई… ऐसा सूत्र बताते हैं। यह प्रशासनिक संवेदना और क्रमिक धरना आंदोलन के बारे में एक पक्ष है जिसे जांच निर्णय कानिश्चित तौर पर दुर्भाग्यपूर्ण अफवाह के रूप में क्यों नहीं देखा जाना चाहिए।
अब हम आते हैं मूल मुद्दे पर जिस शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र को पांचवी अनुसूची में संरक्षित किया गया है क्या प्रशासनिक अधिकारी या मध्य प्रदेश का प्रशासन या केंद्र का प्रशासन उसको लेकर अगर संवेदनशील है तो शहडोल के तमाम जल स्रोतों की हत्या कैसे हो गई…? या हो रही है…? भूमाफियाओं के द्वारा, प्रशासनिक अधिकारियों की लापरवाही के कारण या उनके संरक्षण में नेताओं की माफिया गिरी के कारण अगर यह घटनाएं घटी तो संविधान की पांचवी अनुसूची का प्रोपेगेंडा क्यों पाल कर रखा गया है..,.? जब आदिवासी विशेष क्षेत्र को शोषण और दमन का शिकार ही सत्ता और प्रशासन दोनों मिलकर आजादी के बाद से लगातार कर ही रहे हैं तो इस नाटक की क्या जरूरत है….? उसे क्यों नहीं पांचवी अनुसूची से मुक्त कर देना चाहिए ताकि एक सशक्त नेतृत्व निकालकर इस क्षेत्र की रक्षा कर सके….।
क्योंकि हमने देखा है की एक तरफ हिमाचल की सरकार नई शहरी क्षेत्रों को भी पानी और संपत्ति कर की शुल्क में विकास के नाम पर माफी दे रही है क्योंकि वह उस संवेदना को चिन्हित करती है तो दूसरी तरफ दिल्ली में आती जागरूक बौद्धिक डिग्री होल्डर समाज भी यही काम करता है… वह बिजली पानी को मुक्त करता है लेकिन शहडोल जैसे पांचवी अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्र में न सिर्फ तालाबों, नदियों और जल बावड़ी को शासन और प्रशासन की गठजोड़ पूर्ण मदद से नष्ट किया जा रहा है.. उन्हें प्रदूषित किया जा रहा है बल्कि लगातार ऐसे जल स्रोत पर कॉलोनिया बसाई जा रही है.. यह अलग बात है कि इनका भविष्य इतना तो सुनिश्चित है की अमरकंटक प्राचीनतम बिन्ध्य मैकल पर्वत क्षेत्र से निकलने वाली विभिन्न नदियां और नाले इस तरह के विकास में नष्ट हो जाएंगे बल्कि मध्य प्रदेश की हृदय रेखा नर्मदा नदी भी सूख जाएगी और मध्य प्रदेश बिहार और उत्तर प्रदेश को हरा भरा रखने वाली सोन नद भी सूख जाएगा इसमें कोई शक नहीं….।
क्योंकि अगर शहडोल क्षेत्र में मुख्यमंत्री मोहन यादव आकर करिए घोषणा करते हैं के शहडोल नगर की पानी की प्यास शहडोल से करीब 100 किलोमीटर दूर बाणसागर से पानी लाकर प्यास बुझायेंगे… तो इतना तय है कि शहडोल पानी की भयानक समस्या से गुजर रहा है, हां उन्होंने यह जरूर नहीं कहा कि वह अमरकंटक ले जाकर नर्मदा और सन तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों को भी पानी देंगे.., यह अलग बात है…?
हम भटक जाएंगे क्योंकि बातें ही ऐसी हैं इसलिए हम मुद्दे को शहडोल तक सीमित रखें कैसे प्रशासनिक अधिकारी शहडोल में अपनी अभिवेक पूर्ण कार्य शैली से शहडोल को शोषण और दमन को आगे बढ़ते रहे हैं यह क्यों नहीं देखा जाना चाहिए…? शहडोल में नगर पालिका है वह ₹10 महीने पानी का शुल्क लेती थी एक एसडीएम गजेंद्र सिंह नाम का कुछ दिन के लिए नगर पालिका में प्रशासक हुआ, एक झटके में उसने इस मासिक शुल्क को कहते हैं ₹40 मा बढ़ा दिया यानी चार गुना कर दिया.. और अब नगर पालिका परिषद उसी को आगे बढ़कर उसमें मनमानी टैक्सेशन कर रही है. नगर परिषद ने जरा भी नहीं सोचा कि अगर प्रशासनिक अधिकारी का यह निर्णय विवेकपूर्ण था…? तो पिछली नगर पालिका परिषद है भी कुछ बुद्धिमान लोगों से भरी रही होगी उन लोगों ने इस टैक्स को दुगना भी क्यों नहीं किया…? और अंध भक्तों की तरह जो भी पालिका परिषद आई उसने उसे प्रशासनिक अधिकारी का गुलामी पूर्ण निर्णय जनता पर ठोक दिया। मान लेते हैं यह राजस्व विकास का एक नजरिया है।
तो फिर यह क्यों नहीं देखा जाना चाहिए कि शहडोल नगर में जल स्तर पर पूर्ण था इसका कारण था शहडोल में आसपास कई तालाबों की संरचनाएं नदी नालों की संरचनाएं सुव्यवस्थित रही उनके बरसात मेंपरिपूर्ण जल होने के कारण ही हमारी पानी की समस्याएं कों से भी पूर्ण हो रही थी जिन्हें विकसित कर और उत्कृष्ट किया जाना था. लेकिन तालाबों में कॉलोनिया बनाकर जनसंख्या को बसाकर भूजल स्तर को सुखाया गया और फिर यह बताया गया कि पानी हम महंगा दे रहे हैं… इसलिए महंगाई की मार आम जनता पर थोपी गई. अभी तक यही सीमित रखते हैं यह सोचकर कि दिल्ली और हिमाचल के शिमला के नगरी क्षेत्र में जो जल और संपत्ति कर या बिजली को मुक्त बांटने का काम हो रहा है वहां के नेता या तो महान भ्रष्टाचारी रहे हैं और हैं या फिर बेहद मूर्ख लोग उसे सत्ता पर बैठे हुए हैं.., बुद्धिमान लोग हमारे यहां शासन और प्रशासन प्रणाली में शहडोल का विकास कर रहा इसलिए बुद्धिजीवी समाज की नई नस्ल शहडोल नगर को मिलने वाली₹10 मासिक जल शुल्क को बढ़ाकर ₹40 कर दिया गया….?
तो अगर ऐसे ही हालत में एक माह से किरण टॉकीज के पास जन आंदोलन के जरिए जल जागरुकता को बढ़ाने का काम जनता क्रमिक अनशन धरना के सहारे जागरूकता पैदा करना चाहती है तो उसे प्रोत्साहित क्यों नहीं किया जाता.. कहने को तो जल गंगा अभियान शासन के पैसे से चलाया जा रहा है लेकिन जंगल में मोर नाचा किसने देखा, किरण टॉकीज के पास वह जल गंगा अभियान आत्महत्या क्यों कर लेता है…? क्योंकि जगत प्रकाश नड्डा जो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं उनके नजदीकी जिला भाजपा अध्यक्ष अमिता चपरा का दबाव वहां बना हुआ है.. ऐसा क्यों नहीं माना जाना चाहिए…? तो के प्रशासन पूर्ण रूप से इन इस आदिवासी विशेष क्षेत्र में भी गुलामी के तौर पर एक बेहतर गुलाम के रूप में अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य निष्ठा को निभा रहा है..? उसकीप्राथमिकता किरण टॉकीज के जल बावली को बचाने के लिए अथवा उसके आसपास की भूमि को यदि वह निजी क्षेत्र की भी है तो परिवर्तित कर भूमि स्वामी को अनियंत्रित जमीन क्यों न दी जाए इस दिशा में सोच विकसित क्यों नहीं हो पा रही है, तो क्या हम एक बेहतरीन गुलामी-प्रथा को आगे बढ़ने का काम कर रहे हैं… यदि हम ऐसे निर्णय नहीं ले रहे हैं, यदि हम एक माह से चल रहे जल आंदोलन की रक्षा के लिए जन लोक आंदोलन क्रमिक धरना अनशन को और उसके निष्कर्ष को संवेदनशील तरीके से न्याय पूर्ण नहीं देख पा रहे हैं.. तो क्या हम गुलाम नहीं है…?, चाहे हम चुने हुए पार्षद हो.., अध्यक्ष हो.. विधायक हो.. या फिर प्रशासन में बैठे हुए लोक सेवक; क्या हम गुलाम मानसिकता में निर्णय को जनता पर ठोक रहे हैं …कम से कम संविधान निर्मातादल ने जिसमें हमारे शहडोल के पंडित शंभूनाथ शुक्ला भी एक सदस्यथे उन्होंने ऐसी कल्पना नहीं की रही होगी…..
यह सही है कि देश आज भी गुलाम नहीं है लेकिन अगर हम मानसिक तौर पर गुलाम या गुलामी को स्वीकार कर रहे हैं तो आदिवासी विशेष क्षेत्र इसका मॉडल इसी रूप में विकसित दिखाई दे रहे हैं ऐसा क्यों नहीं समझ जाना चाहिए अन्यथा तत्काल किरण टॉकीज के पास जल बावली को बचाने के लिए तमाम कानूनी हथियार अपने शस्त्रागार से निकलकर उन सभी भू माफिया के खिलाफ उपयोग करना चाहिए अथवा उन्हें राहत देते हुए भूमि के बदले अनियंत्रित भूमि देते हुए भी जल बबली को सुरक्षित करना ही चाहिए यही देश के आजादी में भाग लेने वाले शहीदों का संकल्प था इसमें कोई शक नहीं अथवा हम मूर्ख समाज के हिस्सा है ऐसा भी समझ कर एक बेहतर गुलाम प्रणाली को अनुगमन कर रहे हैं और यह दुर्भाग्य है…..।


