
अगर मोहन राम मंदिर ट्रस्ट शहडोल के मामले में हाई कोर्ट के आदेश जो 2012 में दिए गए थे उसका पालन जिला प्रशासन के द्वारा करवा दिया गया होता तो 100% गारंटी थी की मोहन राम मंदिर के दोनों तालाब जो शहर के बीचो-बीच हैं उन्हें कम से काम बचा तो लिया ही जाता जो आज भयानक प्रदूषण के शिकार हैं क्योंकि प्रशासन भाजपा के लोगों के दबाव में आकर हाई कोर्ट के आदेश को पालन नहीं होने दिया ऐसा आप आज स्थापित है इसमें कोई शक नहीं तो क्या हाई कोर्ट का आदेश ही शहडोल के पर्यावरण विनाश का एक कारण बन गया है अगर वह पालन नहीं हुआ तो यह कैसा न्याय है इसको इस नजरिए से भी क्यों नहीं देखा जाना चाहिए तो क्या शहडोल के पर्यावरण को पूरा लोकतंत्र मिलकर विकास के नाम पर न्याय के नाम पर भ्रष्टाचार का प्रयोगशाला बना रहा है बड़ा विषय है सोचते रहिए…?पर्यावरण दिवस पर यह कड़वी सच्चाई उभर कर आती है ऐसे में आदिवासी विशेष क्षेत्र में पर्यावरण का भविष्य भयावह परिणाम देता नजर आता है। क्या अमरकंटक के चिरंजीवी जल स्रोत जोहिला सोन और नर्मदा जैसी बड़ी नद और नदियां को हमारा लोकतंत्र बचा पाने में सक्षम भी है अब तो यह प्रश्न भी उठना जायज लगने लगा है, यदि हम समय रहते कर्तव्य नष्ट होकर पर्यावरण के प्रति मानवीय जागरूकता की पहल नहीं करते हैं तो हम निश्चित रूप से शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र के जल जंगल और जमीन के साथ स्वच्छ पर्यावरण के घोषित हत्यारे साबित होंगे इसमें कोई शक नहीं..?
(त्रिलोकी नाथ)
अभी कुछ दिन पहले बरा-बरसाइत नामक व्रतका लोकप्रिय बट वर्षों के साथ में कुछ जगह पीपल के वर्षों की कच्ची सूय से बांधकर स्थानीय लोगों ने पूजा पाठ किया और लोकमंगल की कामना की शहडोल में विकास के नाम पर मुख्य मार्ग के पूरे पेड़ काट डाले गए और नगर पालिका की नालियां आज भी अधूरी बनी है कई साल हो गए इस साल भी गांधी चौक अपनी बाद से बद सेबदकर हालत में दिखाई देगा पानी को लेकर क्योंकि इस बार गांधी चौराहे को एक्सीडेंट में तोड़ दिया गया है उसे पर चार चांद लग गए हैं और वह जैसे नालियां वर्षों से ठीक नहीं हुई शहडोल नगर कुप्रशासन का शिकार है जल भराव जगह-जगह होने होने हैं
इस तरह विकास के नाम पर एक मुस्त काट डाले गए पेड़ों में राजेंद्र टॉकीज के पास यह बट वृक्ष पत्रकारिता की ताकत के कारण संतोष शुक्ला रवि शुक्ला कृष्णा तिवारी विनय तिवारी लोगों ने इसे बचा लिया क्योंकि वह एकत्र होकर तब कलेक्टर मुकेश शुक्ला पर यह दबाव डाल चुके रहे थे कि इस वट वृक्ष को हम नहीं काटने देंगे थोड़ा बहुत काटा लेकिन आज भी यह इकलौता वृक्ष है जो गांधी चौक से जय स्तंभ चौक तक आते समय गर्मी में एक ही पल के लिए सही ठंड की राहत देता है बट वृक्ष का स्त्रियों ने परंपरागत तरीके से पूजन भी किया
यह हमारी सनातन की ताकत है किंतु अब आदिवासी क्षेत्र में शहडोल में वृक्षों के बचाव के लिए कोई प्रोत्साहित प्रशासकीय स्थिति से होने वाले रास्ते कम दिखाई देते हैं। यही तथाकथित विकास का पैमाना बन गया है सरकारी फंड को पैसा खर्च करके ज्यादा से ज्यादा भ्रष्टाचार में नेता और अफसर कमाई करने में लगे हैं यही विकास का पैमाना बन गया है उसमें निहित नैतिकता पर्यावरण संरक्षण आप सब बेमानी होता जा रहा है
आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल में जंगलों का विनाश और अवैध खनिज खदानों से पर्यावरणीय क्षति
शहडोल पर्यावरण को लेकर हमारे शासन और प्रशासन को विरासत के जल जंगल और जमीन को लेकर कोई चिंता दिखाई नहीं देती वह तो सिर्फ इस बात पर काम कर रही है की कहां से पैसा आए और कहां पैसा खर्च किया जाए शहडोल नगर के तालाबों की दुर्दशा और उनकी लगातार जल स्रोतों की हत्या के तौर तरीके भू माफिया और राजनेता मिलकर अंजाम दे रहे हैं. जिसे कार्यपालिका आंख मूंदकर पालन करने में गर्व करने लगी है.
यही कारण है कि शहडोल नगर के कई तालाब कॉलोनी में बदल गए हैं वर्तमान में भी जब जन जागरूकता जैसे कार्यक्रम शासन कर रही है तब भी अपना भूमफिया और दूसरे का भू माफिया के अंदाज पर उन्हें तवज्जो दे रही है एक तरफ गांव चांपा में जनपद उपाध्यक्ष पर ही आरोप लग रहे हैं कि वह तालाब पर कब्जा करने के फिराक में है. जन आंदोलन ग्रामवासी अगर ज्ञापन दे रहे हैं तो दूसरी तरफ किरण टॉकीज के पास स्थित प्राचीन जल स्त्रोत बावड़ी को शहडोल मे बचाने के लिए मोहल्ला वासी 2 माह से ज्यादा हो गया धरना
आंदोलन मौका स्थल पर कर रहे हैं किंतु प्रशासन के कान में जूं नहीं रंग रही है. मोहन राम तालाब का जल स्रोत सदूर नगर का सर्वाधिक बदबूदार जल स्रोत बन गया है क्योंकि शहर का गंदा पानी मलमूत्र इकट्ठा हो रहा है यही हाल लगभग शेड्यूल के सभी तालाबों की बाद से बढ़कर हालात हैं खाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण विभाग का ऑफिस शहडोल में खुल गया है किंतु इसके पहले अधिकारी मेहरा अपने नाम के अनुसार इस कार्यालय को भी कचरा बना दिए थे इस कार्यालय के उपयोगिता निरर्थक साबित हो रही थी.
आज 5 जून पर्यावरण दिवस में फिर से शासन और प्रशासन के लोग नई कसम और खाएंगे किंतु वास्तव में शहडोल आदिवासी विशेष क्षेत्र अवैध खनन भू माफिया और जंगल माफिया का प्रशासनिक अड्डा बनकर उभर कर आया है खनिज विभाग सिर्फ वैध और अवैध राजस्व संकलन का विभाग बन गया है. अंधा बांटे रेवड़ी चिन्ह-चिन्ह कर देय के अंदाज में कार्यवाही होती है.. इसमें कोई शक नहीं है अब तो यह प्रमाणित हो गया है कि शहडोल स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज पूरी तरह से गैरकानूनी होकर अवैध रूप से गैस का उत्खनन कर रही है किंतु शासन और प्रशासन की हिम्मत नहीं है कि वह उसे पर रोक लगा सके ….
मध्य प्रदेश का एक आदिवासी बहुल जिला, अपनी प्राकृतिक संपदा और जैव-विविधता के लिए जाना जाता है। घने जंगल, समृद्ध वन्यजीव, और आदिवासी संस्कृति इस क्षेत्र की पहचान हैं। हालांकि, हाल के दशकों में अवैध खनिज खदानों और जंगलों के अंधाधुंध दोहन ने इस क्षेत्र के पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। यह आलेख शहडोल में जंगलों के विनाश और अवैध खनन से होने वाली पर्यावरणीय क्षति के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालता है।
जंगलों का विनाश: एक चिंताजनक स्थिति
शहडोल के जंगल आदिवासी समुदायों की आजीविका और संस्कृति का आधार हैं। ये जंगल न केवल जलवायु नियंत्रण और जैव-विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, बल्कि स्थानीय समुदायों को लकड़ी, औषधीय पौधे, और अन्य वन उत्पाद प्रदान करते हैं। लेकिन, अवैध कटाई और खनन गतिविधियों ने इन जंगलों को तेजी से नष्ट किया है।
वनों का ह्रास: भारत में 2001 से 2020 के बीच 1.93 मिलियन हेक्टेयर वृक्षावरण की हानि हुई है, जिसमें मध्य प्रदेश के जंगलों का भी बड़ा हिस्सा शामिल है। शहडोल में कोयला, चूना पत्थर, और अन्य खनिजों के लिए बड़े पैमाने पर वन क्षेत्रों को साफ किया गया है, जिससे जैव-विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
आदिवासी जीवन पर प्रभाव: आदिवासी समुदायों का जंगलों के साथ अटूट नाता है। जंगलों का विनाश उनकी आजीविका, सांस्कृतिक प्रथाओं, और सामाजिक संरचना को खतरे में डाल रहा है। वन अधिकार कानून, 2006 के बावजूद, कई आदिवासी समुदायों को उनके वन अधिकारों से वंचित किया जा रहा है, विशेष रूप से जब खनन परियोजनाओं को मंजूरी दी जाती है।
अवैध खनिज खदानों का प्रभाव–शहडोल में कोयला और अन्य खनिजों की खदानों का संचालन, विशेष रूप से अवैध खनन, पर्यावरणीय क्षति का प्रमुख कारण है।मृदा अपरदन और जल प्रदूषण: अवैध खनन से मिट्टी का कटाव बढ़ता है, जिससे उपजाऊ भूमि नष्ट होती है। खनन प्रक्रिया में उपयोग होने वाले रसायन और अपशिष्ट स्थानीय जल स्रोतों को दूषित करते हैं, जिससे नदियों और भूजल का स्तर प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए, अरावली क्षेत्र में अवैध खनन ने भूजल स्तर को कम किया और कृषि को नुकसान पहुंचाया। शहडोल में भी समान प्रभाव देखे जा सकते हैं।
वायु प्रदूषण: खनन गतिविधियों से निकलने वाली धूल और जहरीली गैसें वायु प्रदूषण को बढ़ाती हैं, जिससे स्थानीय निवासियों में श्वसन संबंधी रोग बढ़ रहे हैं।जैव-विविधता का नुकसान: खनन के लिए जंगलों की कटाई से कई स्थानिक प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। शहडोल के जंगलों में पाए जाने वाले वन्यजीव, जैसे तेंदुआ और विभिन्न पक्षी प्रजातियां, अपने आवास खो रहे हैं।
पर्यावरणीय क्षति के सामाजिक और आर्थिक परिणामजंगलों और पर्यावरण के विनाश का प्रभाव केवल प्राकृतिक संसाधनों तक सीमित नहीं है। यह आदिवासी समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित करता है।विस्थापन: खनन परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर वन क्षेत्रों को अधिग्रहित किया जाता है, जिससे आदिवासी समुदायों का विस्थापन होता है। 1990 तक भारत में लगभग 85 लाख आदिवासियों को विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित किया गया।आजीविका का संकट: जंगलों पर निर्भर आदिवासी समुदायों के लिए वन उत्पादों का ह्रास आजीविका के साधनों को सीमित करता है, जिससे गरीबी और बेरोजगारी बढ़ती है।सांस्कृतिक हानि: आदिवासी संस्कृति जंगलों के साथ गहराई से जुड़ी है। जंगलों का विनाश उनकी परंपराओं, रीति-रिवाजों, और आध्यात्मिक प्रथाओं को नष्ट करता है।
समाधान के उपाय
शहडोल में पर्यावरणीय क्षति को रोकने के लिए तत्काल और प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है:
कानूनी कार्रवाई: अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई की जाए, जैसा किसख्त कार्रवाई की जाए, जैसा कि बलौदा बाजार में खनिज विभाग ने 43 ठिकानों पर छापा मारकर किया। ऐसी कार्रवाइयों को शहडोल में भी लागू करने की जरूरत है।
वन संरक्षण: वन अधिकार कानून, 2006 को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और आदिवासियों को उनके वन अधिकार प्रदान किए जाएं।सतत विकास: खनन परियोजनाओं को पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के बाद ही मंजूरी दी ex जाए। साथ ही, पुनर्वनीकरण और पर्यावरण पुनर्जनन पर जोर दिया जाए।जागरूकता और भागीदारी: स्थानीय समुदायों को संरक्षण योजनाओं में शामिल किया जाए, जैसा कि रवांडा के वोलकानो नेशनल पार्क में किया गया, जहां समुदाय की भागीदारी से अवैध शिकार में 85% कमी आई।
निगरानी और प्रौद्योगिकी: ड्रोन और सैटेलाइट निगरानी का उपयोग अवैध खनन और वन कटाई को रोकने के लिए किया जाए।शहडोल के आदिवासी विशेष क्षेत्र में जंगलों का विनाश और अवैध खनन पर्यावरण, समाज, और संस्कृति के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। यह न केवल जैव-विविधता को नष्ट कर रहा है, बल्कि आदिवासी समुदायों की आजीविका और सांस्कृतिक पहचान को भी खतरे में डाल रहा है। सरकार, स्थानीय समुदायों, और पर्यावरण संगठनों को मिलकर सतत विकास और संरक्षण की दिशा में काम करना होगा। यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो शहडोल की प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर को अपूरणीय क्षति हो सकती है।

