आज़ाद भारत की दोहरी सच्चाई: विभीषिका से स्वतंत्रता तक का सफर -( त्रिलोकी नाथ )

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आज़ाद भारत की दोहरी सच्चाई: विभीषिका से स्वतंत्रता तक का सफर
       भारत का इतिहास दर्द और उम्मीद की अनगिनत कहानियों से भरा पड़ा है। 14 अगस्त को मनाया जाने वाला ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ (Partition Horrors Remembrance Day) उस दर्दनाक अतीत की याद दिलाता है, जब 1947 में देश का बंटवारा हुआ और लाखों लोग विस्थापित होकर अपनी जड़ों से उखड़ गए। इस दिन को आधिकारिक रूप से 2021 में घोषित किया गया था, ताकि विभाजन की विभीषिका को याद रखा जाए और एकता की सीख ली जाए। लेकिन आज, 21वीं सदी के इस आज़ाद भारत में, जहां 2014 के बाद एक नई ऊर्जा का अनुभव किया गया, स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) का उत्साह कुछ फीका पड़ता नजर आ रहा है। मीडिया में ध्वजारोहण की तस्वीरें तो छप रही हैं, लेकिन उसमें वह पुराना जोश नहीं। क्या वजह है? शायद वह सामाजिक और मीडिया विभाजन, जो देश को दो टुकड़ों में बांट रहा है – एक वह जो पारंपरिक पत्रकारिता और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा है, और दूसरा जो आधुनिक ‘आजादी’ के नाम पर विभेद पैदा कर रहा है।

———————( त्रिलोकी नाथ )——————————

पत्रकारिता का दोहरा चेहरा: 20वीं vs 21वीं सदी

    21वीं सदी के अब तक के 50 सर्वश्रेष्ठ टीवी शो, रैंकिंग   “20वीं सदी की आजादी का भारत की पत्रकारिता चाहे नाम मात्र की हो, वह आजाद भारत की आभासी दुनिया का आत्मा की तरह हमेशा बरकरार रहेगी।” लेकिन 21वीं सदी में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ‘फूट डालो और राज करो’ की ब्रिटिश नीति की याद दिलाता है। यह विभाजन साफ दिखाई देता है – एक वर्ग जो राष्ट्रीय मुद्दों पर समर्पित है, और दूसरा जो सनसनीखेज खबरों में खोया हुआ है। परिणाम? ज्वलंत मुद्दे या तो नजरअंदाज हो जाते हैं या सेकेंडरी न्यूज बनकर रह जाते हैं।
उदाहरण के तौर पर, सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2024 में इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक घोषित कर दिया, क्योंकि यह मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करता था और कंपनियों को असीमित गुमनाम दान की अनुमति देता था। Electoral Bonds पर 'सुप्रीम' रोक, जानें इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर क्या है  विवाद?कोर्ट ने इसे ‘ब्लैकमेलिंग’ जैसा बताया, लेकिन मीडिया में इस पर गहन चर्चा क्यों नहीं हुई? क्यों इस ‘महान भ्रष्टाचार’ की राशि जब्त नहीं की गई? इसी तरह, पेगासस स्पाइवेयर कांड, जो 2021 में सामने आया, जिसमें विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और एक्टिविस्टों पर जासूसी के आरोप लगे,e6511c आज भी अनसुलझा है। Amnesty International की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत सरकार ने Pegasus का इस्तेमाल हाई-प्रोफाइल पत्रकारों पर किया, लेकिन मुख्यधारा की मीडिया में यह मुद्दा दबा रहा।

न्याय की आग और मौन की साजिश
हाल ही का जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला और भी चौंकाने वाला है। मार्च 2025 में उनके दिल्ली स्थित आवास में आग लगी, जहां आग बुझाने के दौरान जले हुए नोटों के बंडल मिले। जांच समिति ने इसे ‘अत्यधिक संदिग्ध’ बताया और मिसकंडक्ट का आरोप लगाया। लेकिन मीडिया की चर्चा जस्टिस वर्मा को दंडित करने पर ज्यादा रही, न कि उन नोटों की मात्रा, स्रोत या उद्देश्य पर। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस पर सवाल उठाया कि अगर अपराध हुआ तो सजा क्यों नहीं दी गई, लेकिन उन्हें भी निशाना बनाया गया। क्या यह कोई ‘माफिया’ है जो प्रेस को नियंत्रित कर रहा है? धनखड़ ने FIR की देरी पर सवाल उठाया, लेकिन मीडिया का मौन विचारणीय है।

वोट चोरी चुनावी ‘आवारगी’ से कुत्तों की आवारगी तक
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल ही में प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया, दावा किया कि  चुनावी प्रक्रिया से छेड़छाड़ हो रही है। उन्होंने सैकड़ों पत्रकारों को बुलाकर इसे ‘भ्रष्टाचार’ बताया, लेकिन मीडिया का एक हिस्सा इसे नजरअंदाज कर रहा है। इसके विपरीत, सुप्रीम कोर्ट का आवारा कुत्तों पर फैसला – जहां दिल्ली में स्ट्रे डॉग्स को शेल्टर में रखने का आदेश दिया गया – को प्रमुखता दी जा रही है। कोर्ट ने हाई-रिस्क इलाकों से कुत्तों को हटाने को कहा, और विरोध प्रदर्शनों में दर्जनों गिरफ्तारियां हुईं। लेकिन विपक्षी सांसदों की गिरफ्तारियां (जैसे राहुल गांधी की हिरासत) को कम महत्व दिया गया। क्या आवारा कुत्ते चुनावी ‘आवारगी’ से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं? यह लाखों बलिदानों का अपमान लगता है।

धार्मिक स्वतंत्रता की हत्या:औरंगजेब की नीति  विश्व प्रसिद्ध बांके बिहारी जी मंदिर वृंदावन  का मामला

     उत्तर प्रदेश विधानसभा में हाल ही में ‘श्री बांके बिहारी जी टेम्पल ट्रस्ट बिल 2025’ पेश किया गया, जो वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर को एक सरकारी ट्रस्ट के अधीन लाने का प्रस्ताव करता है। यह बिल मंदिर की संपत्ति और विकास को नियंत्रित करेगा, लेकिन स्थानीय पुजारियों और गोस्वामी समुदाय ने इसका विरोध किया है, दावा किया कि यह धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी सरकार की आलोचना की, इसे ‘पाप’ बताया। क्या यह औरंगजेब की नीतियों की याद नहीं दिलाता? मीडिया का मौन यहां भी राष्ट्रीय दायित्व की विफलता दर्शाता है।

उमा भारती की जागृत आत्मा: एक संत का सपना
      मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का हालिया इंटरव्यू चर्चा में है, जहां उन्होंने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को ‘आतंकवादियों से भी ज्यादा खतरनाक’ बताया। उन्होंने कल्पना की कि अगर गांधी 20 साल और जीते होते, तो भारत इतना विकसित होता कि कर्ज की जरूरत नहीं पड़ती। भारती, जो खुद संत-राजनीतिज्ञ हैं, कहती हैं कि गोडसे का अपराध ‘आतंकवाद’ शब्द से बड़ा है – यह एक महापाप है। यह सपना भारतीय पत्रकारिता का भी होना चाहिए, जो गलतियों से सीखकर आशा का निर्माण करे।

 नई गुलामी की चुनौतियां
विभीषिका दिवस स्वतंत्रता दिवस पर इतनी जल्दी हावी हो रहा है कि हमें नई ‘आभासी गुलामी’ के लिए तैयार रहना चाहिए। X पर हाल की पोस्ट्स दिखाती हैं कि लोग विभाजन की स्मृति को जीवित रखने के लिए कविताएं, फोटो और वीडियो शेयर कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विभेद बढ़ रहे हैं। क्या हम उस एकता को बचा पाएंगे जिसके लिए लाखों ने बलिदान दिया? पत्रकारिता की भूमिका यहां निर्णायक है – अगर वह मौन रही, तो पतन अवश्यंभावी है। लेकिन उम्मीद बाकी है, क्योंकि भारत की आत्मा नदियों, जंगलों और आम आदमी में बसती है।मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रही उमा भारती की आत्मा जाग गई है हाल में उनका एक इंटरव्यू चर्चित है जिसमें वह महात्मा गांधी के हत्यारेनाथूराम गोडसे को आतंकवादियों से भी ज्यादा खतरनाक बताया उन्होंने महात्मा गांधी को20 साल और की कल्पना की थी कि अगर वह जिंदा होते तो भारत की आत्मा जो पहाड़ नदियों जंगल और आम आदमियों मे बसती है उसे भारत इतना विकसित होता कि उसे दूसरे से कर्ज नहीं लेना पड़ता एक संत राजनीतिक होने के जीवन के अंतिम पड़ाव में उमा भारती का सपना भारतीय पत्रकारिता का सहज सपना होना चाहिए आखिर हमआदमी ही हैं अपनी ढेर सारी गलतियों से अपनी आशाओं का भविष्य आकार देते हैं

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