
भलाई दुनिया में पर्यावरण दिवस यानी 5 जून हमें स्वस्थ पर्यावरण के प्रति सतर्कता और जागरूकता का कारण बताता है किंतु भारत में खासतौर से शहडोल जैसे आदिवासी हलचल में इसका कोई महत्व नहीं दिखाई देता बल्कि यह एक पाखंड दिवस के रूप में स्थापित हो गया लगता है, जब अमरकंटक जैसे आध्यात्मिक रूप से तपस्वी संवेदनशील क्षेत्र के निकट में ही सिर्फ विलासिता के सड़क बनाई जाती है ताकि यह आध्यात्मिक नगर, पर्यटन का केंद्र बने और पैसा पैदा करने की मशीन पैदा हो, सड़कों का जाल बिछाने के लिए लाखों की संख्या में पेड़ काटे जाते हैं सड़क के आसपास तालाब नष्ट किए जाते हैं, यूकेलिप्टस प्लांटेशन को गंगा का कछार क्षेत्र या नर्मदा कछार क्षेत्र में सरकारी योजना बनाकर जैव विविधता को नष्ट किए जाने का योजना बनाई जाती है ताकि हम पूंजीपतियों की गुलामी का प्रदर्शन कर सकें..
ऐसे में शहडोल मुख्यालय में जब “जल गंगा अभियान” नामक छिछोरी योजनाओं को प्रचार प्रसार मिलता है तु सिर्फ कागजी औपचारिकता के अलावा कुछ नहीं होता.. कुछ न करते तो 5 जून को यही आंकड़ा प्रस्तुत कर देते की कुल कितना चारागाह कर रकबा बचा है , कुल कितने तालाबों की संख्या बची है उनका रकबा बचा है..? कुल कितना नदी क्षेत्र बचा है…? तो शायद हम ईमानदारी से आजाद भारत के नागरिक दायित्व निभा रहे होते, किंतु हम ईमानदार नहीं है.. अपने ही आईने से झूठ बोलना योग्यता समझ लिए… क्योंकि हम गुलाम होने की दिशा में काफी आगे निकल गए हैं…
संभाग मुख्यालय शहडोल में पिछले साल करीब 3 महीने एक जलस्रोत को बचाने की लड़ाई जनआंदोलन के द्वारा लड़ी गई। और इसका समापन इस आश्वासन केसाथ हुआ किसी समस्या का निदान सर्वोच्च प्राथमिकता से किया जाएगा पूरा जल गंगा अभियान समापन की ओर है उस किरण टॉकीज का जलस्रोत को भ्रष्टाचार के लिए दफन कर दिए गए जल बाबड़ी से एक बूंद पानी हम नहीं निकाल पाये.. तो हम शहडोल के तालाबों को बचाने की दिशा में क्यों काम करेंगे….?
माना कि आपने उसे बलिदानी जल बावड़ी के रूप में चिन्हित किया है तो बाकी जल क्षेत्र भी आपको बलिदान करने होंगे, सत्ता की चाटुकारिता पूर्ण कर्तव्य निष्ठा में। यह नियम है चमचागिरी का स्थापित सिद्धांत भी और यही कारण है कि पर्यावरण दिवस शहडोल के लिए “पाखंड दिवस” के अलावा कुछ नहीं….।
एक विभाग है प्रदूषण नियंत्रण विभाग अस्पताल के पास जो “वायु गुणवत्ता मापक” जो साइन बोर्ड लगा है वह उसके बेहोश होने का प्रमाण पत्र है। जब “वाड़ी ही खेत खाने लगेगी” तो रक्षा कोन करेगा… समस्या यहां है…. इसलिए 6 जून को दिल्ली में लोकतंत्र की सड़ी हुई राजनीति ने जो “कूड़े के पहाड़” पैदा कर दिए हैं उसमें कॉकरोच निकल आये है जो नकारात्मक और विद्वंषक राजनीति का परिणाम है शायद इनसे कुछ हो जाए…, शासन और प्रशासन में बैठे हुए सिस्टम से तो कुछ नहीं हो पाया… शिवाय गंदगी पैदा करने के, और पर्यावरण को विनष्ट करने की योजना बनाने के…। “पर्यावरण दिवस बनाम पाखंड दिवस” में है
शहडोल में सोन नदी के बगल में दिया पीपर में इंडस्ट्रियल हब बनाने का मध्य प्रदेश शासन का बड़ा पहल सामने आया किंतु शहडोल में इंडस्ट्रियल एरिया के प्रदूषण से अगर बगल का तालाब जहरीला हो गया हो उसे आप बच्चा नहीं पाए तो यह इस बात की गारंटी है कि आप सोन नदी शहडोल में हत्या की योजना बना रहे हैं क्योंकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का वहां पर अभी तक कोई भी पहल दिखाई नहीं दिया जमीन में कोई भी फिल्टर प्लांट इंडस्ट्रियल एरिया के लिए नहीं बनाया जा रहा है यानी पूरी तरह से सोन नदी को नष्ट करने का क्या जहरीला करने का काम किया जा रहा है ऐसा क्यों नहीं समझना चाहिए पर्यावरण सप्ताह में पर्यावरण दिवस में आपके समझ में आ जाए यह हमारी शुभकामनाएं शायद आपने प्रदूषण नियंत्रण के वायरस जिंदा हो जाए….?

