भारत (यानी शहडोल) जल युद्ध के मुहाने पर ….? (त्रिलोकीनाथ)

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भाजपा के पूर्व सांसद रमेश बिधूड़ी के नेतृत्व में हुआ दिल्ली जल बोर्ड के कार्यालय पर हमला: आतिशी

नयी दिल्ली: 16 जून (भाषा) दिल्ली की जल मंत्री आतिशी ने रविवार को आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व सांसद रमेश बिधूड़ी ने छतरपुर में दिल्ली जल बोर्ड के कार्यालय पर हमले का नेतृत्व किया।आतिशी ने भाजपा पर राष्ट्रीय राजधानी के निवासियों के खिलाफ साजिश रचने का भी आरोप लगाया।

     वैसे तो भारत का उपनाम सोने की चिड़िया रखा गया है लेकिन जैसे यह सोने की चिड़िया होने के बावजूद भी 81 करोड लोगों को पेट भरने के लिए सरकारी सहायता पर मजबूर है ठीक उसी प्रकार से इस देश में जल युद्ध का संकट मंडराने लगा है ।ऐतिहासिक प्राचीन और हमारे गौरव गाथा में माता की तरह पोषण करने वाली के मां नाम से जुड़ने वाली महान नदियां इस जल संकट का निदान करने में क्या अक्षम हो रही है ? अन्यथा क्या कारण है कि देश जल-युद्ध के ओर धकेला जा रहा है ।इस पर गहन चिंतन मनन की जागरूकता आवश्यक हो चुकी है लेकिन माफिया गिरी में फंस गई देश की राजनीति शराब के नशे की तरह है ..उसे इस जल-युद्ध से दूर किए हुए हैं… वह इस दिशा पर सोच ही नहीं पा रहा है की क्या जल हमें पीने को पानी की गारंटी मिलेगी…?

———————(त्रिलोकीनाथ)————————
हालांकि अभी जल-युद्ध, मणिपुर जैसे गृह-युद्ध की तरह तब्दील नहीं हुआ है। फिलहाल देश में राजनीतिक रूप से जो निर्णय लिए जा रहे हैं देश की राजधानी में खासतौर से जल-संकट का जो हंगामा खड़ा किया जा रहा है और यमुना के जल को लेकर के जो ट्रेनिंग दिल्ली के जनता को दी जा रही है उससे यह समझा जा सकता है कि देश की राजनीति जल-युद्ध की मानसिक घोषणा कर चुकी है, वह लोगों को प्रशिक्षित कर रही है कि किस प्रकार से जल की लड़ाई लड़ना पड़ेगा । हालांकि यह पूरी घटना कम राजनैतिक है लेकिन इसे आने वाली फिल्म का ट्रेलर मान लेने में कोई हर्ज नहीं है।

क्योंकि सरकारों के पास जैसे तमाम प्रकार की तुष्टिकरण की नीतियां होती है और स्वार्थ के लक्ष्य पूरी किए जाते हैं इस तरह इस प्रकृति दत्त उपहार जल को भी एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा है। दिल्ली के अखबारों में यह साहित्य के रूप में मिलने लगा है ताकि भारतीय नागरिक इसे भी आम समस्याओं की तरह जैसे बेरोजगारी, बेकारी ,पर्यावरण का प्रदूषण या फिर महत्वपूर्ण महामारी कोविड जैसी समस्याओं की तरह ही इसका सहज रूप से राजनीतिक निर्णय देखने की आदत नागरिक डालने और इसे पैदा होने वाली तमाम प्रकार की शोषणवादी व्यवस्था जिसे हमारे कारपोरेट अपने फायदे के लिए उपयोग करते हैं उनके लिए बलिदान हो जाने का प्रेरणा का सके।
यह बात यूं ही नहीं कहीं जा रही है बल्कि आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल में जिस प्रकार से राजनीतिक निर्णय लागू किए जाते हैं उसमें कोई दूरदर्शिता नहीं दिखती।भारत को अगर हम शहडोल मान ले तो स्पष्ट रूप से दिखता है कि किस प्रकार से हरा भरा शहडोल होने के बाद भी उसमें नकली जल संकट उद्योगपतियों के हित में खड़े किए जा रहे हैं और उसकी आदत शहडोल के नागरिकों को पड़          जाए वह इस शोषणवादी व्यवस्था को स्वीकार कर ले, इसलिए तमाम प्रकार के सरकारी नीतियों की तरह जल संवर्धन की नीतियां, जल अभियान ,वाटर सेड और अन्य तमाम प्रकार के पाखंड रचे जा रहे हैं …‌ताकि यह स्लो-प्वाइजन स्वीकार करने की क्षमता शहडोल के नागरिकों में सहज रूप से स्थापित हो जाए। और  जब नागरिक इसका आदी हो जाएगा तो वह इस पर हंगामा खड़ा नहीं करेगा।
जबकि शहडोल में ऐसा कोई जल संकट कभी रहा नहीं, शहडोल क्षेत्र उन महान नदियों का केंद्र है जिससे नर्मदा नदी के माध्यम से मध्य प्रदेश के हृदय रेखा का निर्माण हुआ और गुजरात जिंदा होने कगार पर आयाऔर उत्तर प्रदेश तथा बिहार के जल संकट का शहडोल की ही सोननदी से समाधान सुनिश्चित किया गया है। क्योंकि इसमें एक प्रकार का कॉरपोरेट और भ्रष्टाचार का जबरदस्त अवसर था। किंतु मूल जड़ में इन नदियों को सुरक्षित करने के लिए कोई सुनिश्चितता नहीं की गई है। राजनीतिक रूप से इसमें पाखंड और प्रोपेगेंडा ज्यादा दिखाई दे रहा है।

जब से कमिश्नरी बनी है एक प्रदूषण नियंत्रण इकाई भी शहडोल में स्थापित हुई है वह भ्रष्टाचार की पवित्र जननी के रूप में मंदिर की तरह रख दी गई है जो भी भ्रष्टाचारी वहां जाते हैं चढ़ावा चढ़ाते हैं और वहां के देवी देवताओं को प्रसन्न करते रहते हैं ताकि उनका अपना धंधा फलीभूत हो सके। इसके अलावा वहां के अधिकारी अपना कोई कर्तव्य नागरिकों को प्रति नहीं समझते और नागरिक भी यह नहीं समझते कि यह इकाई शहडोल को सुरक्षित करने की शायद लोकतंत्र की सबसे बड़ी इकाई है क्योंकि पर्यावरण संरक्षण का पहला और अंतिम दायित्व इसी प्रदूषण निर्माण केंद्र से जुड़ा हुआ है। लेकिन वहां पर भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। नागरिक दायित्व के नाम पर वह भी राजनीतिक पाखंड पर विश्वास करता है।
यही कारण है की शहडोल मुख्यालय में कार्यालय होने के बाद भी शहडोल नगर के करीब 200 से ज्यादा तालाबों को प्रदूषण और अतिक्रमण का शिकार होने दिया गया उसके लिए कोई योजना नहीं है नगर के ही नदी और नालों को अब दुर्गंध युक्त नाली के रूप में या तो बदला जा रहा है या फिर उसे रियल स्टेट के कारपोरेट जगत के भ्रष्टाचार को समर्पित कर दिया गया है । कई नालों और तालाब पर कॉलोनिया स्थापित हो गई है। किंतु इसे चिन्हित करने वाला प्रशासन तंत्र लगभग पुरुषार्थ हीनता है। वह इस पर कोई काम नहीं करना चाहता। मुख्यालय की बात इसलिए की जा रही है क्योंकि जब आसपास शासकीय विभागों को देखने की क्षमता नहीं है तो वह शहडोल संभाग के भारत के संविधान में गारंटी युक्त पांचवी अनुसूची में तथाकथित रूप सेसुरक्षित इस आदिवासी विशेष क्षेत्र के पर्यावरण और परिस्थिति को कैसे देख सकता है…?

ऐसे विभाग जब तक नागरिकों से संबंध नहीं करेंगे तब तक वह सिर्फ कागजों को काला करने का और दागदार बनाने का काम कर रहे होते हैं। शहडोल में इस पर टिप्पणी करते हुए भाजपा के ही नेता कैलाश तिवारी ने तमाम तात्कालिक रूप से पैदा हुई जल अभियान को प्रश्न चिन्ह में खड़ा करते हुए स्पष्ट कहा है कि जब तक मुड़ना नदी और सोन नदी साफ नहीं होती है पूरा का पूरा कार्य असफल है।

इसे नागरिक हितों में का भाजपा के अंदर एक दायित्व के रूप में देखना चाहिए किंतु भाजपा के नेता भ्रष्टाचार की दलदल में बुरी तरह से फंस चुके हैं। शायद उन्हें ट्रेनिंग ही इस प्रकार की दी गई है वह इस दिशा में कोई नागरिक संवाद करना ही नहीं चाहते वह तो प्रशासनिक अमले के साथ स्वयं को फोटो खिंचाने में व्यस्त है।
शहडोल नगर का जलस्तर बुरी तरहसे नीचे जा रहा है इसके आंकड़े कभी ग्राम अथवा विकास विकासखंड या तहसील बार बार प्रदर्शित नहीं किए गए हैं। की हर वर्ष कितना जलस्तर घट रहा है…? केंद्र और राज्य की नीतियों भ्रष्टाचार की शहडोल के संदर्भ में अपनी चरम लक्ष्य को प्राप्त कर रही है.. जिसमें कोयला खदानों के ब्लॉक शहडोल में रिलायंस गैस की मनमानी तरीके से हजारों फीट नीचे तक खुदाई मनमानी तरीके से कहीं भी चालू करने की अनुमति दी गई है प्रदूषण नियंत्रण का कार्यालय इसका पहला चौकीदार है  क्योंकि वह चोरी करके अपने अधिकारियों को अपनी सफलता का प्रमाण पत्र देने पर विश्वास रखता है नागरिकों से वह कोई सूचना साझा नहीं करता…. इसी तरह अन्य खदानों के मामले में परिणाम देने वाले सूचनाओं का कहीं कोई संग्रहण कभी प्रकाशित नहीं होता। सार्वजनिक प्रशासन का मतलब ही है नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी ताकि वहां पर उसे पर टिप्पणी हो सके।
अथवा जहां ऐसी खदानें खुल चुकी हैं वहां आए परिणामों से उसकी कोई तुलनात्मक अध्ययन शहडोल के अथवा अमरकंटक स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय विश्वविद्यालय में अध्ययन का विषय नहीं होता है. अगर होते भी हैं तो वह वही किताबों में दफन हो जाते हैं या कॉर्पोरेट जगत को अपने जिम्मेदार गुलामी के लिए प्रतिबद्ध रूप से भेजे जाते हैं। क्योंकि यह विश्वविद्यालय भी भ्रष्टाचार के रोजगार में आनंद ले रहे हैं।जबकि मूल रूप से केंद्रित आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल का मूल मुद्दा उन नदियों और जल धाराओं को नियमित करके बचाए रखना का अध्ययन करना है।
भारत के कई राज्य जल संबंधित हो रहे हैं यदि शहडोल की सोन नदी नहीं होती तो रीवा संभाग अभी तक जल-युद्ध की घोषणा कर चुका होता…आज रीवा के नागरिक यदि पानी को लेकर निश्चित है तो उसका एकमात्र कारण सिर्फ शहडोल की सोन नदी है जिस पर बाणसागर की निर्भरता है । यदि नर्मदा नदी नहीं होती तो गुजरात मॉडल के रूप में दुनिया की सबसे बड़ी सरदार पटेल की स्टैचू आप यूनिटी धड़ाम से गुजरात में गिर गई होती यानी उससे कारपोरेट जगत का आमदनी की संभावनाएं खड़ी ही नहीं होती।
यानी प्रधानमंत्री भी जानते हैं राष्ट्रपति तो स्वयं शहडोल जाकर जान गई है कि शहडोल का क्या महत्व है किंतु इसके पर्यावरण और पारिस्थितिकी के डाटा यानी आंकड़े सार्वजनिक लोगों की जागरूकता के कारण नहीं बन पा रहे हैं। क्योंकि आंकड़े या तो बन ही नहीं रहे हैं अथवा उन्हें जानबूझकर नागरिकों को देने का काम नहीं किया जाता। यही स्लो प्वाइजन… शहडोल के नागरिकों में शासन और प्रशासन की नीतिगत तरीके से जो डाला जा रहा है वही दरअसल देश के जल-युद्ध का कारण बनेगा।

   क्या कारण है की जो चिपको आंदोलन मध्य प्रदेश की राजधानी वृक्षों को काटने से रोकने के लिए बाध्य कर रहा है भोपाल में नागरिकों को जागरूकता का कारण बनी है वह शहडोल में मृत है…? दर्शन इसकी ट्रेनिंग प्रशासन स्तर पर दिया जाना चाहिए था..। लेकिन दुर्भाग्य से शहडोल में रहे कलेक्टर मुकेश शुक्ला ने सदु नगर के पूरे पेड़ नगर विकास के नाम पर कटवा डालें यदि कुछ नागरिकों ने अपने पेड़ लड़ कर नहीं बचाए होते तो मुख्य मार्ग में छाया और सांस के लिए वह भी जिंदा नहीं होते।लगातार कभी सड़क निर्माण के नाम पर कभी कॉलोनी विकास के नाम पर कभी कोयला खदानों के नाम पर अथवा अन्य कर्म से पेड़ काटे जा रहे हैं किंतु कोई विरोध नहीं करता।
संविधान की पांचवी अनुसूची में संरक्षित शहडोल क्षेत्र की ग्राम सभाएं तब जिंदा होती है जब प्रशासन उन्हें जिंदा करने की घोषणा करता है… और वह सुनिश्चित तारीखों के बाद इस तरह मर जाती हैं जिस तरह 15 अगस्त और 26 जनवरी को लोग भूल जाते हैं। जबकि हर महीने इन ग्राम सभाओं के जरिए पर्यावरण और परिस्थिति को बचाए रखने की जिम्मेदारी ग्राम सभा की है किंतु हमारे ग्राम सभा में एक भी पर्यावरण और पारिस्थितिकी को जिंदा रखने के ना तो कोई आंकड़े दिए जाते हैं और ना ही उनके बारे में चर्चा होती है। वह नाम मात्र की औपचारिकता भी एक शोषणकारी व्यवस्था का हिस्सा बनकर रह गई है। इससे यह अनुभव होता है कि भारत क्या इस प्रकार के जल संकट के मुहाने में खड़ा है जैसे शहडोल में यह दिखने लगा है। यह आश्चर्यजनक निर्णय था कि जो पानी मुफ्त में शहडोल को कुएं से मिल जाता था अब कुएं सूख गए हैं क्योंकि असीमित तरीके से बोरिंग के जरिए उनका पूरा प्राकृतिक ढांचा प्रशासनिक लापरवाही से नष्ट हो गया। जो पानी शहडोल नगर में ₹10 माह नगर पालिका से मिलता था उसे एक झटके में एक मामूली से एसडीएम ने प्रशासनिक अधिकारी बनकर के ₹100 माह कर दिया और नागरिक पुरुषार्थ हीनता का परिणाम यह है की सब उसे सहज रूप से स्वीकार कर लिए…? कवि नगर पालिका में इस पर कोई बहस ही नहीं हुई.. जो पानी देश की राजधानी दिल्ली में मुफ्त देने की व्यवस्था इसलिए की गई है क्योंकि वह नागरिकों की पहली जिंदा रहने की शर्त है वह पानी शहडोल में तमाम संभावनाओं के बावजूद भी तालाबों के रूप में नदी और नालों के रूप में बचा कर रखने की ना तो नगर परिषद में योग्यता दिखती है और ना ही प्रशासनिक अधिकारियों की प्रशिक्षण में वह योग्यता दिखाई देती है । आखिर शहडोल नगर पालिका अथवा अन्य नगर पालिका परिषद पानी की कीमत नागरिकों से लेती ही क्यों है यदि उन्होंने शहडोल के तमाम तालाबों को नष्ट करने में तालाबों का जलस्तर नष्ट करने में अपनी भूमिका सुनिश्चित की थी तो क्या नगर का तालाब जलस्तर इसलिए नष्ट किया गया था ताकि आम जनता के जेब में डाका डाला जा सके और पानी के नाम पर उनसे पैसा वसूला जा सके जबकि हर घर में अपने पड़ोसी को पानी देने के लिए सक्षम कुआं था।
दरअसल यह नपुंसकता हमारे भ्रष्ट राजनीतिक प्रणाली का परिणाम है जिसमें माफिया गिरी ने अपनी जगह बना ली है। और वह नगर परिषद के जरिए नागरिकों पर ढाका डालने का हथियार बन गया है। और इसलिए जल-युद्ध सुनिश्चित है। यह अभी नहीं तो कभी ना कभी होना ही है.. किंतु किंतु तब तक इसका कितना भयावह रूप होगा क्या नेताओं अथवा जिम्मेदार अधिकारियों को को घर में घुसकर मारा जाएगा…? इसका इंतजार हो रहा है? जैसे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 1 साल शोषण देखने के बाद कहा की 1 साल से मणिपुर अपनी शांति का इंतजार कर रहा है …?

वह उसी प्रकार से सहज हो जाएगा जैसे रूस और यूक्रेन का युद्ध सालों से सहज हो गया है.. जब कॉरपोरेट जगत के लिए लाभकारी होगा तब वह शांति का कारण बनेगा। इसका आम नागरिकों से इस प्रकार से कोई संबंध नहीं दिखता है जैसे कि इसराइल और हमास ,फिलिस्तीनियों के बीच में मर रहे नागरिकों के बारे में कोई चिंता नहींहै । जब तक की कारपोरेट जगत का इसमें हित सुनिश्चित नहीं होगा यह युद्ध समाप्त नहीं होंगे।
भविष्य में शहडोल जैसे दिल्ली में जल संकट राजनीतिक रूप से खड़े किए जा रहे हैं यह प्राकृतिक रूप से जल्द ही दिखाई देने लगेंगे। क्योंकि अत्यधिक शोषण होने के बाद क्रांति, संभावित प्रक्रिया है और इस क्रांति के लिए हमारे नागरिकों को राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित किया जा रहा है। ऐसा समझा जाना चाहिए। अन्यथा आदिवासी क्षेत्र को लक्ष्य रखकर के यहां के पर्यावरण और परिस्थिति की को लक्ष्य रख करके अगर शहडोल संभाग मात्रा के कमिश्नर और कलेक्टर और अन्य बौद्धिक अधिकारी आईएफएस यानी हमारे लोकतंत्र जिसमें न्यायपालिका और पत्रकारिता भी शामिल है आपस में बैठकर चिंतन करें उसमें नागरिकों की समन्वयता की भागीदारी सुनिश्चित करें तो निश्चित रूप से शहडोल का पर्यावरण संकट देश के जल संकट निदान का कारण बन सकता है। और यह मॉडल होगा देश को जल युद्ध से बचने के लिए।

क्योंकि शहडोल क्षेत्रअगर जल-युद्ध से खत्म होगा तो देश भी इसी जल-युद्ध में झोंक दिया जाएगा…. और यह युद्ध राजनीतिक स्वार्थी राजनेताओं और कारपोरेट जगत के लाभ का कारण होगा इसमें कोई शक नहीं…. क्योंकि शांति भी उनके लाभ पर आधारित होगी इसमें भी कोई शक नहीं…..


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