
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता की डिग्रीधारी भाजपा प्रवक्ता बालबुद्धि नेता की भाषा में समझे तो “हर कोई जानता है कि राहुल गांधी एक अपरिपक्व नेता है..” जनसत्ता के अनुसार भाजपा ने कहा है “राहुल गांधी भारतीय लोकतंत्र के लिए काला धब्बा हैं” वैसे भी भाजपा ने कथित तौर पर प्रायोजित रूप से करोड़ों रुपए राहुल गांधी को पप्पू घोषित करने के लिए खर्च कर दिए बावजूद इसके महात्मा गांधी के बताए रास्ते पर लोकतंत्र को नजदीक से देखने वाले विपक्ष के नेता राहुल गांधी की परिपक्वता इन दिनों सर चढ़कर के बोल रही है।
—————-( त्रिलोकीनाथ )——————
हां उनकी भाषा शैली आम आदमी की समझ में आने वाली हो, चाहे ना हो किंतु आम आदमी की भावनाओं के समझ के अनुरूप प्रदर्शित होती प्रमाणित होने लगी है। जिसके कारण कांग्रेस पार्टी को उन्होंने लोकतंत्र के रास्ते में दोबारा अपेक्षाकृत नए बहुमत से भारतीय संसद में स्थापित किया है, इसमें कोई शक नहीं। इसके बावजूद भी कि वे सब जो राहुल गांधी को खारिज करते रहे हैं अब राहुल गांधी के भाषा का जवाब देते उन्हें नहीं आ रहा है। जबकि भारतीय सदन में विविध भाषा भाषी लोगों को समझने के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। इसलिए “खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे” के तर्ज पर वही प्रायोजित पप्पू-कथा तंत्र-मंत्र को बार-बार वह दोहराने का प्रयास करते हैं।
जबकि राहुल गांधी ने जो-जो कहा वह सब सत्य होता दिखा… दुनिया में सदी की नई महामारी कोविड- काल में सबसे पहले राहुल गांधी ने ही कोविड को भारत में फैलने की आशंका जताई थी। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ गुजरात में जोरदार भीड़ भरी रैलियां कर रहे थे।नया हंगामा इस बात पर है कि “अमेरिका में राहुल गांधी ने कहा है भारत एक विधिध विचारों वाला देश है एक विचार वाला नहीं, जैसा भाजपा और आरएसएस मानती है”।
बहरहाल रूस और यूक्रेन के युद्ध में समाधान की संभावना या कहना चाहिए फिर पर्यटन की संभावना की तलाश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां का दौरा किया, किंतु देश में गृह-युद्ध की हालत में जी रहा भारत का मणिपुर राज्य अपनी चरम स्थिति में आ पहुंचा है। यह सही है कि उग्रवादियों ने राजभवन और सचिवालय के अंदर घुसकर बांग्लादेश जैसे अभी तक ना तो तोड़फोड़ की है और ना ही वहां के बिस्तर और रसोइ सामग्री को लूटा है। बावजूद इसके मणिपुर अघोषित गृह-युद्ध में गत डेढ़ साल से जल रहा है किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को अभी तक मणिपुर के समाधान के लिए एक भी यात्रा का अवसर नहीं मिला है। सबको याद है कि भारतीय जवान की महिलाओं को निर्वस्त्र करके जुलूस नुमा अंदाज में वहां उग्रवाद नंगा नाच कर रहा था, तब सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए इस पर टिप्पणी की थी।
करीब डेढ़ साल बीतने को है अभी तक कोई समाधान में भारत सरकार नहीं पहुंची है। और ना ही प्रधानमंत्री मणिपुर पहुंचे हैं क्योंकि वह भारत संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी विशेष क्षेत्र बाहुल्य वाला राज्य है। हो सकता है उस राज्य में भाजपा, आरएसएस और मोदी सरकार के दुश्मन नागरिकों का निवास हो किंतु वह है तो भारतीय गणराज्य का हिस्सा ही तो फिर उसका समाधान आखिर क्यों नहीं हो रहा है…? क्या इसलिए भी की वहां के लोग अपने तरीके से अपनी भाषा बोलना जानते हैं या फिर कोई विदेशी रणनीति वहां सफलता से कब्जा कर ली है..? क्योंकि शहडोल जैसे आदिवासी विशेष क्षेत्र पांचवी अनुसूची वाले मध्य प्रदेश के इस क्षेत्र में आम आदिवासी प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित करने में कभी बोलता हुआ नहीं देखा गया… गैर कानूनी तरीके से तमाम प्रकार के अवैध काम राष्ट्रीय विकास के नाम पर लूट के संसाधन बने हुए हैं…जो इस क्षेत्र की पर्यावरण और परिस्थिति की दोनों के लिए खतरनाक साबित होने वाली है… तो क्या अगर यहां के आदिवासी भी मुखर हो गए होते तो क्या वह भी मणिपुर के आदिवासियों की तरह उग्रवादी या नक्सलवादी घोषित कर दिए गए होते…? यह प्रश्न खड़ा ही रहेगा।
क्योंकि आदिवासी क्षेत्र की समस्याएं लगभग एक ही तरह की हैं इस प्रकार से भी क्यों नहीं समझना चाहिए.. तो अगर शहडोल में प्रमाणिक तौर पर पारदर्शी रूप में कानून की धज्जियां उड़ाकर कानून-व्यवस्था, शांतिपूर्ण और नियंत्रित चल रही है तो क्या यह दमन और शोषण का प्रमाण नहीं है …? इस पर भी चिंतन क्यों नहीं होता..?
शहडोल के व्योहारी क्षेत्र में अब के विपक्ष के नेता राहुल गांधी आए थे तब उन्होंने कहा था मध्य प्रदेश, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रयोगशाला है तो क्या जितने भी अवैध और गैर कानूनी काम शासन और प्रशासन की संज्ञान में होने के बाद भी चल रहे हैं तो वह भी प्रयोगशाला में सफलता का मॉडल बन रहा है…? क्या देश में अन्य क्षेत्रों में भी यही मॉडल कम कर रहा है…? यह भी क्यों वर्तमान घटनाओं से नहीं सीखना चाहिए।
शहडोल में हाईकोर्ट ने जिस आदेश को लागू करने के लिए 12 साल पहले आदेश पारित किया था वह हिंदुओं का निजी संपत्ति का दान किया हुआ मंदिर-ट्रस्ट आज भी हाई कोर्ट के आदेश के पालन के लिए मोहताज है….? जबकि अघोषित तौर पर ही सही हिंदू-राज्य के रूप में मध्यप्रदेश को स्थापित हुए करीब 20 साल बीत गए हैं… फिर भी हिंदू मंदिर ट्रस्ट क्यों लुटवाया जा रहा है…?
जब से तथाकथित राम-राज्य स्थापित हुआ है तब से अब विपक्ष के नेता राहुल गांधी अंबानी और अडानी के भ्रष्टाचार की चर्चा अवसर करते रहते हैं इन्हीं में एक मुकेश अंबानी जी की इंडस्ट्री शहडोल में कैसे चल रही है इस पर चर्चा कर देखते हैं; 2009 में इस आदिवासी विशेष क्षेत्र से एशिया का बड़ा कोयला आधारित प्राकृतिक गैस सीबीएम भंडार उत्पादन के लिए मुंबई निवासी उद्योगपति मुकेश अंबानी की नेतृत्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज ने भारत सरकार से सहमति पर काम चालू किया था राज्य के खनिज नियमों के अनुसार उसे गैस खनन करना चाहिए था.. शहडोल का प्रशासन लगातार 2009 से लगभग हाथ-पैर जोड़कर उद्योगपति से विनती करता चला आ रहा है कि वह खनिज नियमों के अनुसार अनुबंध का निष्पादन करें, ताकि राजस्व के साथ आम आदिवासी क्षेत्र के निवासियों की सुरक्षा की भी गारंटी सुनिश्चित हो सके किंतु अब तक रिलायंस इंडस्ट्रीज ने “अंग्रेजी बोल बोल करके मामले को घूमाते नजर आ रहे हैं..” क्योंकि स्थानीय आदिवासी नेताओं में वह मुखरता नहीं है कि वह इस क्षेत्र में अवैध रूप से चल रही इस इंडस्ट्री पर नियंत्रण कर सकें। हो सकता है अगर नेताओं ने या फिर आम आदमियों ने इस पर अपनी बात रखी तो उन्हें भी मणिपुर की तरह गृह-युद्ध के हालात में फेंका जा सकता है.. शायद यही डर सांसद और नेताओं को अभिव्यक्त होने से रोकता है ऐसे में यदि विपक्ष के नेता राहुल गांधी राज्य को संघ की प्रयोगशाला कहते हैं तो वह पप्पू कहां से हो जाते हैं…? यह बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
तो क्या विविध विचारों की स्वीकृति को सहमति देना अथवा हजारों साल से जन्मजात रोजगार जनित गारंटी वाले गुणवत्तापूर्ण स्किल से भरमार रायबरेली के चाहे वह मोची हो अथवा सब्जी बेचने वाले को तलाश करने या फिर कैब ड्राइवर के साथ या फिर जमीन में किसानो कि उनके श्रम की गुणवत्ता को सम्मान दिलाने के प्रयास में काम करने वाला भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष का नेता राहुल गांधी यदि उनकी भाषा में “अपरिपक्व”, “काला धब्बा” या फिर “पप्पू” है तो सदन का नेता भी इन्हीं सब प्रकार की संज्ञाओं से क्यों नहीं चिन्हित होना चाहिए..? क्या विवाह करने के बाद उसे सफलता से निर्वाह योग्यता है..? अथवा विवाह जीवन छोड़कर अकेले दुनिया में विकास की संभावनाओं की तलाश में भटकना आखिर कितनी परिपक्वता है…? यह प्रश्न चिन्ह भी स्वाभाविक रूप से खड़ा ही होता है। इसलिए भारतीय लोकतंत्र को समावेशी समाधान की ओर क्यों नहीं बढ़ना चाहिए.. गाली-गलौज, अभद्रता और अपमानजनक संवादों से कोई हल होता दिखाई नहीं देता बल्कि इससे उन सब प्रकार की गैरकानूनी राज को बल मिलता वह अराजक हो जाता है। जिससे आदिवासी विशेष क्षेत्र शहडोल जैसे क्षेत्र में भी हाई कोर्ट का आदेश दम तोड़ने लगता है… और अवैध सीबीएम करीब 600 खदानें करीब गैर कानूनी तरीके से कार्यपालिका और विधायिका के संरक्षण में उन्हें मुख-बधिर बनाने को विवश करती हैं …क्या इन पर सुधार होना चाहिए…? यह भी बड़ा प्रश्न चिन्ह है।

