हाईकोर्ट ने कहा , कमिश्नर को  विवेक इस्तेमाल करना चाहिए। उमरिया कलेक्टर पर 25 हजार की कॉस्ट 

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शहडोल कोतवाली में एक महिला के खिलाफ लगातार 107 16 के फर्जी प्रकरण दर्ज हो रहे थे क्योंकि पुलिस के पास जब मामले सुलझाने के कोई रास्ते समझ में नहीं आते तो वह दोनों पक्षों को ऐसे आरोप में डालकर अपनी तरफ से खाना पूर्ति कर देती है और कभी-कभी जब षड्यंत्रकारी पक्ष पावरफुल होता है तो भी ऐसे फर्जी प्रकरण बनाए जाते हैं ऐसे ही एक प्रकरण के संबंध में जब मैं अपने सामाजिक संगठन की तरफ से पुलिस अधीक्षक श्री गोस्वामी के पास गया तो उन्होंने प्रकरण को सुना और सुनने के बाद शायद पृष्ठभूमि में उनके पास भ्रामक जानकारी थी गुस्सा कर कहा कि इस महिला के खिलाफ₹500000 का मुचलका बांड भरवा दो…फिर कुछ दिनों बाद जब स्थितियां साफ हुई और उनके समझ में आया की विरोधी पक्ष षड्यंत्र करके लगातार झूठी कहानियां गढ़ रहा है तो उन्होंने कहा कि लगता है शिकायत करता ज्यादा शातिर है और पुलिस को बेवकूफ बना रहा है सच बात यह भी है कि पुलिस बेवकूफ बन रही थी क्योंकि षड्यंत्र कारी शिकायत कर् पुलिस विभाग को उंगलियों में खेलना सीख गया था बैक बस कुछ पुलिस वालों को अपने चंगुल में फंसा लो और कुछ उनके परिवार में पेट पालने के लिए पैसा फेंकते रहो और जैसा चाहो वैसा रिपोर्ट लिखते रहो वह सामने वाले की छवि धूमिल करने के लिए 107 16 और अन्य झूठे मुकदमे गणना चालू कर देती है सामने वाले को पता भी नहीं चलता यह अनुभव की बात है की 107/ 16 के मुकदमे झूठ दर्ज किया जा रहे थे.. ताकि विरोधी पक्ष को परेशान करने के लिए ज्यादा मुकदमों की श्रृंखला दिखाई जाए और जिला बदर का प्रकरण बनाकर षड्यंत्रकारी अपने षड्यंत्र में सफल हो जाए.हमने सोचा की 10-12 मुकदमें बनने के बाद ऐसा शहडोल में होता होगा इसलिए पुलिस अधीक्षक के पास पूरी जानकारी देनी उचित समझी बहरहाल मामला लंबित है पुलिस अपने स्वयं के भ्रष्टाचार और षड्यंत्र की दुनिया में भूल भुलैया में फंस गई है यह अलग बात है की प्रताड़ित होने वाला इससे प्रताड़ित होता रहता है.
अब दूसरा पक्ष देखते हैं मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कलेक्टर उमरिया को गलत तरीके से जिलाबदल करने पर₹25000 का जुर्माना लगाया है मामला यह है कि जैसा पत्रिका न्यूज़ नेटवर्कके हवाले से कहा गया कि उमरिया जिले की एक महिला के खिलाफ जिला बदर की कार्रवाई पर हैरानी जताते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने शहडोल संभागायुक्त के कामकाज को लेकर तल्ख टिप्पणी की। जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने जिला बदर की कार्रवाई को निरस्त करते हुए कहा कि संभागायुक्त को डाकघर में काम करने वाले अधिकारी की तरह नहीं काम करना चाहिए कि डाक आई और मार्क कर दिया। अखबार के अनुसार उच्च न्यायालय ने कहा है कमिश्नर शहडोल को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। पीठ ने उमरिया कलेक्टर पर 25 हजार रुपए की कॉस्ट लगाने का आदेश दिया।
मामला उमरिया जिले का है। जहां कि निवासी मुन्नी उर्फ माधुरी तिवारी के खिलाफ 2024 में जिला बदर किए जाने का आदेश दिया गया था। इसके खिलाफ संभागायुक्त शहडोल के समक्ष अपील की लेकिन उन्होंने भी उमरिया कलेक्टर के आदेश को बरकरार रखा। जिसे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने पक्ष रखते हुए दलील दी कि उसके खिलाफ सिर्फ 6 अपराधिक प्रकरण दर्ज है।

बताया गया दो धारा 110 के तहत तथा दो मामूली मारपीट की धाराओं के है। इसके अलावा दो प्रकरण एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज किये गये है। उसे किसी भी अपराधिक प्रकरण में सजा नहीं हुई है। कोर्ट ने पाया कि कलेक्टर ने एसएचओ मदन लाल मरावी के बयान के आधार पर महिला के खिलाफ जिला बदर का आदेश पारित किया है। एसएचओ ने अपने बयान में स्वीकारा है कि एनडीपीएस के एक प्रकरण में आरोपी रमेश सिंह सेंगर के बयान के आधार पर याचिकाकर्ता महिला को आरोपी बनाया गया था। उसके पास से कोई प्रतिबंधित पदार्थ जब्त नहीं किया गया था। हाईकोर्ट ने जिला
बदर आदेश निरस्त करते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संभागीय आयुक्त शहडोल ने भी मामले के तथ्य और परिस्थितियों पर अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं किया।

इस तरह विभिन्न थाना  में आम आदमियों के खिलाफ अक्सर झूठी रिपोर्ट 107 साल 16 के रूप में दर्ज की जाती हैं ताकि मामला निचले स्तर पर निपटा जाए लेकिन कभी-कभी यह जिला बादल की फर्जी कार्यवाही बनाने के लिए भी कारण बनती हैंउच्च न्यायालय ने कलेक्टर उमरिया को जिस प्रकार से आर्थिक रूप से दंडित किया है उसे निश्चय ही ऐसे मामलों में गंभीरता बढ़ती जाएगी ऐसा माना जाना चाहिए किंतु इससे भी ज्यादा यह है कि थानों में गलत तरीके से मुकदमा दर्ज करने पर भी पुलिस अधीक्षकों को सतर्क रहना चाहिए क्योंकि यदि आपने समय रहते न्याय नहीं किया तो पछताने के अलावा कुछ नहीं होता…


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