
भगवान राम को समर्पित करोड़ों राम भक्तों का पवित्र समर्पण, और इस समर्पण दान पर डाका···? (एक रामभक्त की पीड़ा)
आज पुराने कागज़ों के बीच राम मंदिर निर्माण हेतु अपने परिवार द्वारा किए गए समर्पण की रसीदें देखीं, ₹100, ₹1000 और ₹11,000 की वे रसीदें केवल कागज़ के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि उस आस्था की गवाही हैं जिसे करोड़ों रामभक्तों ने अपने हृदय से सींचा था।किसी ने सौ रुपये दिए, किसी ने हजार, किसी ने लाख,किसी ने करोड़,रकम छोटी-बड़ी हो सकती है, लेकिन भावना सबकी एक ही थी—”यह धन भगवान श्रीराम के चरणों में समर्पित है।”जब दान दिया था, तब यह नहीं सोचा था कि कभी उस दान के उपयोग पर सवाल खड़े होंगे, यह भी नहीं सोचा था कि जिस मंदिर के लिए लाखों लोगों ने संघर्ष किया, बलिदान दिए, जेलें भरीं और वर्षों तक अपमान सहा, उसी मंदिर के चढ़ावे और भूमि सौदों को लेकर देश में चर्चा होगी।
यदि आरोप गलत हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि आरोप सही हैं तो दोषियों को कठोर दंड मिलना चाहिए, क्योंकि यहाँ मामला केवल पैसों का नहीं है, यह करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का प्रश्न है।रामभक्तों ने दान किसी नेता, अधिकारी या ट्रस्ट के नाम पर नहीं दिया था, उन्होंने दान भगवान राम के नाम पर दिया था, इसलिए दान के हर रुपये का हिसाब भी रामभक्तों को मिलना चाहिए।
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कितना पैसा आया और कितना खर्च हुआ,सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या उस आस्था का सम्मान हुआ, जिसके बल पर यह भव्य मंदिर खड़ा हुआ?रामराज्य की बात करने वालों को याद रखना चाहिए कि भगवान राम का सबसे बड़ा गुण सत्य और मर्यादा था, यदि राम के नाम पर एकत्रित धन में भी पारदर्शिता न हो, तो फिर रामराज्य का आदर्श केवल भाषणों तक ही सीमित है।

