
लाल किले की प्रयोगशाला में शब्दों का नया आविष्कार!
देश की राजनीति में शोध और अनुसंधान कभी रुकता नहीं। प्रयोगशाला में बैठकर नए-नए शब्द गढ़े जाते हैं, फिर हर 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से उन्हें राष्ट्र को उपहार स्वरूप दे दिया जाता है। 15 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री जी ने लाल किले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को “दुनिया का सबसे बड़ा NGO” घोषित किया था। और ठीक एक साल बाद, 15 अगस्त 2026 को शब्दकोश में एक और चमकदार शब्द जुड़ गया—“दिमागी नक्सल”।
यह कोई अचानक हुई खोज नहीं है। 2022 में ही प्रधानमंत्री मोदी ने “बंदूक वाले नक्सली” के साथ-साथ “कलम वाले नक्सली” की भी चर्चा की थी। उससे पहले “अर्बन नक्सल” शब्द भी काफी चल निकला था। अब “दिमागी नक्सल” आ गया है। लगता है नक्सलवाद की शब्दावली का विस्तार अब बंदूक से निकलकर कलम, शहर और दिमाग तक पहुँच चुका है। जिज्ञासा स्वाभाविक है—ये नए-नए शब्द प्रधानमंत्री जी के भाषणों में आते कहाँ से हैं? क्या लाल किले के पीछे कहीं कोई गुप्त “राजनीतिक शब्द अनुसंधान एवं आविष्कार केंद्र” चल रहा है, जहाँ हर साल स्वतंत्रता दिवस से पहले नई प्रजाति के “नक्सल” शब्दों का आविष्कार किया जाता है?
कल को शायद कोई सवाल पूछे तो वह “सवाल नक्सल”, सरकार की आलोचना करे तो “विचार नक्सल”, असहमति जताए तो “असहमति नक्सल”, और लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार इस्तेमाल करे तो “संवैधानिक नक्सल” घोषित कर दिया जाए!
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि देश में नक्सलवाद खत्म करने की घोषणाएँ लगातार हो रही हैं, हथियारबंद नक्सली लगभग समाप्त बताए जा रहे हैं, लेकिन शब्दकोश में नक्सलवाद की नई-नई प्रजातियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। जंगलों में नक्सलवाद भले घट रहा हो, भाषा और राजनीति में उसका विस्तार लगातार हो रहा है।शायद यही आधुनिक भारत की नई परिभाषा है—जहाँ नक्सलवाद को खत्म करने का दावा किया जाता है, वहीं उसके नाम पर शब्दों का कारोबार फलता-फूलता रहता है।
संदीप तिवारी
एडवोकेट, शहडोल

