
स्वतंत्र भारत में अनशन की कीमत: सोनम वांगचुक से जी.डी. अग्रवाल तक की अनसुनी आवाजें
स्वतंत्र भारत का संविधान मौलिक अधिकारों की रक्षा का प्रतीक है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पर्यावरण संरक्षण जैसे मूल्यों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। किंतु वास्तविकता इससे भिन्न चित्रण करती है। हालिया घटनाक्रम—लद्दाख के प्रसिद्ध जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी—एक बार फिर सवाल खड़ा करता है कि क्या आजादी के बाद भी नागरिकों के शांतिपूर्ण संघर्ष को कुचलने की प्रवृत्ति बरकरार है? वांगचुक, जो मेगसेसे अवॉर्ड प्राप्त इंजीनियर और पर्यावरणविद् हैं, को 26 सितंबर 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत गिरफ्तार कर राजस्थान के जोधपुर जेल भेज दिया गया। यह घटना लद्दाख में राज्य और संविधान की छठी अनुसूची के तहत आदिवासी क्षेत्रों की सुरक्षा की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के दो दिन बाद घटी, जिसमें पुलिस कार्रवाई के दौरान चार नागरिक मारे गए। यह गिरफ्तारी न केवल एक कार्यकर्ता की है, बल्कि पूरे लोकतंत्र की संवेदनशीलता पर सवाल उठाती है।
लद्दाख का संघर्ष: राज्य की मांग और हिंसा का चक्र
लद्दाख, हिमालय की गोद में बसा एक संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र, पर्यावरणीय संकट और सांस्कृतिक संरक्षण की जंग लड़ रहा है। 2019 में जम्मू-कश्मीर को पुनर्गठित कर लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद स्थानीय निवासियों की चिंताएं बढ़ गईं। वे नौकरियों, भूमि अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के लिए छठी अनुसूची की मांग कर रहे हैं, जो आदिवासी क्षेत्रों को स्वायत्तता प्रदान करती है। सोनम वांगचुक, जो ‘3 इडियट्स’ फिल्म के प्रेरणा स्रोत भी हैं, इस आंदोलन के प्रमुख चेहरे बने। उन्होंने 10 सितंबर 2025 से 14 दिवसीय अनशन शुरू किया, लेकिन प्रदर्शनों के दौरान दो अन्य अनशनकर्ताओं के स्वास्थ्य बिगड़ने पर युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा।24 सितंबर को लेह में हुए प्रदर्शनों में युवा काले झंडे लेकर सड़कों पर उतरे। स्थिति तब बिगड़ी जब प्रदर्शनकारियों ने भाजपा कार्यालय और पुलिस वाहनों पर हमला किया। पुलिस ने आंसू गैस, लाठीचार्ज और गोलीबारी की, जिसमें चार नागरिक मारे गए और 70 से अधिक घायल हुए।
लद्दाख डीजीपी एस.डी. जामवाल ने इसे ‘आत्मरक्षा’ बताया, लेकिन कार्यकर्ता इसे सरकारी दमन का प्रमाण मानते हैं। वांगचुक ने हिंसा की निंदा की और कहा कि यह युवाओं की हताशा का परिणाम है, न कि उनकी उकसावे का। फिर भी, केंद्र सरकार ने उन्हें ‘उत्तेजक भाषणों’ का दोषी ठहराया और उनके एनजीओ का लाइसेंस रद्द कर दिया। क्या यह संयोग है कि पाकिस्तान से जुड़े एक संदिग्ध की गिरफ्तारी के बाद वांगचुक को निशाना बनाया गया? या यह आंदोलन को बदनाम करने की रणनीति?लद्दाख जैसे क्षेत्र में, जहां चीन और पाकिस्तान की सीमाएं हैं, पर्यावरण और सांस्कृतिक संरक्षण राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं। वांगचुक ने हमेशा जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ विकास पर जोर दिया है। उनकी गिरफ्तारी न केवल स्थानीय असंतोष को दबाती है, बल्कि पूरे क्षेत्र की जैव विविधता को खतरे में डालती है।
इतिहास की पुनरावृत्ति:आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर
जी.डी. अग्रवाल का निधन/अनुयायियों ने इसे ‘सुनियोजित हत्या’ करार दिया
सोनम वांगचुक की कहानी नई नहीं है। 2018 में आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर और पर्यावरण कार्यकर्ता जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) का निधन भी इसी तरह की सरकारी उदासीनता का शिकार हुआ। गंगा बचाओ आंदोलन के तहत उन्होंने 22 जून 2018 से अनशन शुरू किया, मांग की कि गंगा को अविरल बहने दिया जाए, बांधों पर रोक लगे और गंगा संरक्षण प्रबंधन अधिनियम बने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वादों की उपेक्षा करते हुए उन्होंने 112 दिनों तक केवल शहद-नींबू-पानी पर जीवन जिया, फिर पानी तक त्याग दिया। केंद्रीय मंत्री उमा भारती और अन्य ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। 11 अक्टूबर 2018 को हृदयाघात से उनका निधन हो गया। उनके अनुयायियों ने इसे ‘सुनियोजित हत्या’ करार दिया, क्योंकि अनशन के दौरान चिकित्सा सुविधा न दिए जाने का आरोप लगा। अग्रवाल ने पहले भी कई अनशन किए थे—2009 में दिल्ली में, 2010 में हरिद्वार में—और हर बार सरकार ने आंशिक प्रतिक्रिया दी, लेकिन गंगा सफाई का वादा अधूरा रहा। नमामी गंगे परियोजना के बावजूद, गंगा में 75-80% सीवेज अनुपचारित ही गिरता है।
ये दोनों मामले—वांगचुक और अग्रवाल—एक साझा धागे से जुड़े हैं: पर्यावरणविदों के अनशन को नजरअंदाज करना। स्वतंत्रता पूर्व आमरण अनशन शोषण के खिलाफ हथियार थे, लेकिन आजादी के बाद ये ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ या ‘कानून-व्यवस्था’ के नाम पर दबाए जाते हैं। दिल्ली का किसान आंदोलन जहां 700 किसानों की कथित हत्याओं का आरोप लगा, इसी कड़ी का हिस्सा है। ये दाग मोदी सरकार पर कलंक के रूप में चिपके हैं।
राष्ट्रपति की भूमिका: संवेदनशीलता की अपेक्षा
भारत के संविधान में राष्ट्रपति को ‘राज्य के प्रमुख’ का दर्जा है, जो विधेयकों को पुनर्विचार के लिए लौटाने की शक्ति रखते हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो स्वयं आदिवासी पृष्ठभूमि से हैं, ने पहले ऐसे मामलों में संवेदनशीलता दिखाई है। लेकिन वांगचुक या अग्रवाल जैसे मामलों में हस्तक्षेप क्यों नहीं? पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 के आपातकाल के दौरान भी आंदोलन को नजरअंदाज नहीं किया; वे मौके पर पहुंचीं। आज, जब सरकार गुप्तचर एजेंसियों के माध्यम से सब जानती है, तो अनशन को ‘नजरअंदाज’ क्यों? क्या यह अहंकार या निहित स्वार्थ है?अगर अनशन आत्महत्या है, तो कानून क्यों चुप? अग्रवाल का मामला इसका उदाहरण है—कोई जांच नहीं हुई। लद्दाख में चार मौतों को ‘आत्मरक्षा’ कहना ‘कानून-व्यवस्था’ की विफलता दर्शाता है। आदिवासी विशेष क्षेत्रों में लूट (जैसे खनन और पर्यटन) को वैध बनाना संविधान की भावना के विरुद्ध है। वांगचुक जैसे विद्वान राष्ट्र के हित में बोलते हैं, न कि उसके विरुद्ध।
नई गुलामी की ओर? उम्मीद की किरण
ये घटनाएं सवाल उठाती हैं: क्या स्वतंत्रता की लड़ाई व्यर्थ हो रही है? अंतिम व्यक्ति की आवाज अनसुनी हो तो लोकतंत्र कैसा? सरकार को लद्दाख के मुद्दों—पर्यावरण, रोजगार, स्वायत्तता—पर संवाद करना चाहिए। अगर झूठे आरोप लगाकर जेल भरती है, तो यह नई गुलामी का संकेत है।फिर भी, उम्मीद बाकी है। सोशल मीडिया पर अभियान तेज हो रहा है। लेह एपेक्स बॉडी दिल्ली भेज रही है। महामहिम राष्ट्रपति से अपील है कि वे हस्तक्षेप करें—संविधान की जिम्मेदारी निभाएं। सोनम वांगचुक जैसे नायक देश को दे सकते हैं, उन्हें दबाने से नहीं। स्वतंत्र भारत को इन दागों से मुक्त होना होगा, वरना आजादी का अर्थ खो जाएगा।
( त्रिलोकीनाथ; सहयोग से हालिया समाचार स्रोतों-ग्रोक ए आई-आधारित।)

