
पर्यावरण और परिस्थितकी अपने हिसाब सेअपना काम कर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को बार-बार प्रमाणित करती है लेकिन हम मानव अपनी छोटी बुद्धि के कारण इन्हें नजर अंदाज करते रहते हैं और फिर इसे प्रकृति का प्रकोप का करकेबहाना बनाते हैं .इस तरह दुर्घटनाएं होती हैंऔर होती चली जाती हैंइस बार जैसा कि जनसत्ता अखबार ने लिखा हैकी अरब सागर में हुए बदलाव के कारण वायनाड में 123 लोगोंपर प्रकृति का मौत का तांडव उमर पड़ा,करीब इतने लोग ही घायल हुए हैं.यह सरकारी सूचनाओंपर आधारित जानकारी है.मनुष्य के अलावा अन्य किस प्रकार की जीव जंतुओं का नुकसान हुआ है इसका कोई आकलन नहीं आयाहै इसके लिए हमारेआदिवासी वनांचल पर्वत श्रेणी विंध्य मेंकल क्षेत्र में हम कितना गंभीर हैं..इसे समझने के लिएहमें फुर्सत ही नहीं है.
क्योंकिहम नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की भाषा में समझे तो मध्य प्रदेश एक प्रयोगशाला है और तमाम प्रयोग पूंजीवाद के शोषण और दमन के भी होते रहते हैं.अन्यथा जब अमरकंटक क्षेत्र की पहाड़ियों पर भूस्खलन हुए थे उसकी संपूर्ण जानकारी प्रदेश या देश के शासन ने स्थानी लोगों को देने की जरूरत ही नहीं समझी…?
आज तक पता नहीं की इन सब के पीछे मूल कारण भौगोलिकक्या रहेहैं…? शहडोल में संभाग बनने के बाद नाम मात्र का एक प्रदूषण नियंत्रण विभाग है जिसका अधिकारी मेहरा सात पर्दों के अंदर रहता है..उसेपत्रकारों से बातचीत करने में शर्म आती है..लेकिन शहडोल जैसे पर्यावरण और परिस्थिति के मामले में संवेदनशील क्षेत्रजिस संवेदना का केंद्र यही एक विभाग है .बाकी जितने भी शासकीय विभाग हैं सब प्रशासनिक हैं..वह घटना घट जाने के बाद इस पर अपना क्रियान्वक करते रहते हैं…
थोड़ा बहुत जिम्मेदारी अध्ययन के मामलों में केंद्रीय विश्वविद्यालय अमरकंटक और शंभू नाथ विश्वविद्यालयअथवा अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालयकी हो जाती है.. किंतु उनकी तरफ से भी ऐसी कोई शोध पूर्ण कार्य नहीं आए हैं.अथवा शहडोल के लोगों को देने की जरूरतइन बुद्धिजीवियों ने नहीं समझी है.जिनको लेकर केशहडोल क्षेत्र में पर्यावरण और परिस्थितिकी को ले करके जो भी घटनाएं औद्योगिक विकास के पाखंड के कारण हो रहे हैं उन्हें चिन्हित किया जा सके.
शहडोल में स्थापित उद्योगपति मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज गैस निकालने का जो काम कर रही है वह तो पूरी तरह सेअवैध है..उसने बीते 16 साल में अनुबंध भी नहीं किया है खनिज विभाग से,कि अगर घटनाएं घटती हैं तो उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा…?क्योंकि गैस उत्खनन का कार्यमनमानी तरीके से चल रहा है उसे पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं है..अनुबंध से कम से कम यह सिद्ध हो जाता कि जो सीमाएं हैं क्या उसका पालन हो रहा है..इस तरह भूस्खलन की घटनाओं का सीधा संबंध के अमरकंटक पर्वत श्रेणियां से जुड़ा हुआ है.. किंतु क्या इसे हमारी कार्यपालिका अथवा विधायिका जरा भी गंभीरता से लेती है …यहएक बड़ा प्रश्न है..?राष्ट्रीय अखबारों नेअपने हिसाब से वायनाड की पीड़ा दायक घटना का चित्रण किया है.बेहतर होता अमरकंटक पर्वत श्रेणी में संभावित भूस्खलन को ले करके पहले से कोई अध्ययन पूर्ण रिपोर्ट आ जाती और उसे पर सतर्कता से काम प्रारंभ हो जाता किंतु लगता है अभी दिल्ली बहुत दूर है खासतौर से आदिवासी क्षेत्र के निवासियों के लिएयह एक सपना हैअथवाकीड़े मकोड़े की तरह जीवन जीनेके नजरिया के कारण उनका यह जानकारी देने की जरूरत भी नहीं समझी जाती है

